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चेक अनादरण, कॉर्पोरेट आपराधिकता और धारा 148: निदेशक की व्यक्तिगत देयता पर सुप्रीम कोर्ट का संदर्भ

चेक अनादरण और निदेशक की व्यक्तिगत देयता:
क्या धारा 138 एन.आई. एक्ट के तहत दोषसिद्ध निदेशक से धारा 148 के अंतर्गत 20% राशि जमा कराई जा सकती है, जब कंपनी कानूनी बाधा के कारण अभियोजित नहीं हो सकती? — इस महत्वपूर्ण प्रश्न को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी पीठ को संदर्भित किया


प्रस्तावना

      व्यावसायिक लेन–देन में चेक एक अत्यंत महत्वपूर्ण साधन है। चेक के माध्यम से भुगतान न केवल सुविधा प्रदान करता है, बल्कि व्यापारिक विश्वास (Commercial Trust) की नींव भी रखता है। इसी विश्वास की रक्षा के लिए परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) में धारा 138 जोड़ी गई, जिसके अंतर्गत चेक के अनादरण (Dishonour of Cheque) को आपराधिक अपराध घोषित किया गया।

       समय के साथ यह देखा गया कि धारा 138 के मामलों में मुकदमे लंबे समय तक चलते हैं और शिकायतकर्ता को वर्षों तक राहत नहीं मिलती। इसी समस्या के समाधान हेतु धारा 148 को अधिनियम में जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत अपील के दौरान दोषसिद्ध व्यक्ति को कम से कम 20% राशि जमा करने का अधिकार न्यायालय को दिया गया।

      हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल प्रश्न आया—
जब कंपनी किसी कानूनी बाधा के कारण अभियोजित नहीं हो सकती, तो क्या उसके निदेशक, जो धारा 138 के अंतर्गत दोषसिद्ध है, उससे धारा 148 के तहत 20% राशि जमा कराई जा सकती है?

      इस प्रश्न की गंभीरता और दूरगामी प्रभावों को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को बड़ी पीठ (Larger Bench) के पास संदर्भित कर दिया है।


कानूनी पृष्ठभूमि

1. धारा 138, परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881

धारा 138 के अंतर्गत, यदि—

  • किसी व्यक्ति द्वारा जारी किया गया चेक
  • विधिक रूप से देय ऋण या देनदारी के निर्वहन हेतु हो,
  • और वह बैंक द्वारा अनादरित (Dishonoured) कर दिया जाए,
  • तथा विधिक नोटिस के बावजूद भुगतान न किया जाए,

तो चेक जारीकर्ता को आपराधिक दायित्व का सामना करना पड़ता है।


2. कंपनी और निदेशक की देयता — धारा 141

जब चेक किसी कंपनी द्वारा जारी किया जाता है, तो—

  • कंपनी प्रमुख अभियुक्त (Principal Accused) होती है, और
  • उसके निदेशक/प्रबंधक विकारीय देयता (Vicarious Liability) के आधार पर अभियोजित किए जाते हैं।

सामान्य सिद्धांत यह है कि
कंपनी के बिना अभियोजन के निदेशक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि निदेशक की देयता कंपनी से उत्पन्न होती है।


3. धारा 148 — अपील के दौरान 20% राशि जमा

धारा 148 यह प्रावधान करती है कि—

  • यदि धारा 138 के अंतर्गत दोषसिद्ध व्यक्ति अपील दायर करता है,
  • तो अपीलीय न्यायालय उसे
    • चेक राशि का न्यूनतम 20% जमा करने का आदेश दे सकता है।

इसका उद्देश्य है—

  • अपील को केवल विलंब का साधन बनने से रोकना, और
  • शिकायतकर्ता को त्वरित राहत प्रदान करना।

विवाद का मूल प्रश्न

इस मामले में उत्पन्न मुख्य विवाद यह था—

यदि कंपनी किसी कानूनी बाधा (जैसे दिवालियापन प्रक्रिया, परिसमापन, या अन्य वैधानिक निषेध) के कारण अभियोजित नहीं हो सकती, लेकिन निदेशक को धारा 138 के अंतर्गत दोषसिद्ध कर दिया गया है, तो क्या ऐसे निदेशक को धारा 148 के तहत 20% राशि जमा करने के लिए बाध्य किया जा सकता है?


कानूनी बाधा (Legal Impediment) का अर्थ

कई परिस्थितियों में कंपनी के विरुद्ध अभियोजन संभव नहीं होता, जैसे—

  1. कंपनी दिवालियापन प्रक्रिया (IBC) में हो और उस पर मोराटोरियम लागू हो।
  2. कंपनी का परिसमापन (Liquidation) हो चुका हो।
  3. किसी विशेष अधिनियम के अंतर्गत कंपनी पर अभियोजन निषिद्ध हो।

ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि—

  • क्या निदेशक की व्यक्तिगत दोषसिद्धि वैध है?
  • और यदि है, तो क्या उससे 20% राशि जमा कराना न्यायसंगत होगा?

परस्पर विरोधी न्यायिक दृष्टिकोण

1. निदेशक के पक्ष में तर्क

निदेशक की ओर से आमतौर पर निम्न तर्क दिए जाते हैं—

  • धारा 141 के अनुसार, निदेशक की देयता कंपनी पर आधारित है।
  • यदि कंपनी अभियोजित ही नहीं हो सकती, तो निदेशक की देयता कमजोर हो जाती है।
  • धारा 148 का उद्देश्य चेक जारीकर्ता से राशि जमा कराना है, न कि ऐसे व्यक्ति से जो केवल विकारीय रूप से उत्तरदायी हो।
  • यदि कंपनी भुगतान करने में असमर्थ है, तो निदेशक से 20% राशि जमा कराना अनुचित और दंडात्मक होगा।

2. शिकायतकर्ता के पक्ष में तर्क

वहीं शिकायतकर्ता की ओर से यह तर्क दिया जाता है कि—

  • यदि निदेशक को दोषसिद्ध कर दिया गया है, तो वह “दोषसिद्ध व्यक्ति” की श्रेणी में आता है।
  • धारा 148 का पाठ (Text) यह नहीं कहता कि केवल कंपनी से ही राशि जमा कराई जा सकती है।
  • यदि निदेशक अपील का लाभ उठाता है, तो उसे भी 20% राशि जमा करनी चाहिए।
  • अन्यथा, निदेशक कंपनी के पीछे छिपकर शिकायतकर्ता को राहत से वंचित कर देगा।

सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि—

  • इस प्रश्न पर विभिन्न उच्च न्यायालयों में भिन्न–भिन्न मत हैं।
  • कुछ निर्णयों में निदेशक से 20% जमा कराने को वैध माना गया है,
  • जबकि कुछ निर्णयों में इसे अनुचित ठहराया गया है।

न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि—

यह प्रश्न न केवल तकनीकी है, बल्कि निदेशकों की व्यक्तिगत देयता, कॉर्पोरेट व्यक्तित्व, और आपराधिक न्याय के सिद्धांतों से गहराई से जुड़ा हुआ है।

इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—

यह विषय व्यापक और प्रामाणिक व्याख्या की मांग करता है,
अतः इसे बड़ी पीठ (Larger Bench) के पास संदर्भित किया जाना आवश्यक है।


संभावित कानूनी प्रभाव

इस संदर्भ के निर्णय के कई दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं—

1. कॉर्पोरेट निदेशकों की देयता

यदि बड़ी पीठ यह निर्णय देती है कि—

  • निदेशक से 20% राशि जमा कराई जा सकती है,

तो इससे निदेशकों की व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी काफी बढ़ जाएगी।


2. शिकायतकर्ताओं को राहत

ऐसा निर्णय शिकायतकर्ताओं के लिए सकारात्मक होगा, क्योंकि—

  • उन्हें अपील के दौरान भी कुछ राशि प्राप्त होगी,
  • और मुकदमेबाजी की प्रवृत्ति कम होगी।

3. कॉर्पोरेट दिवालियापन और चेक बाउंस मामलों का समन्वय

यह निर्णय IBC और NI Act के बीच संतुलन स्थापित करने में भी सहायक होगा।


निष्कर्ष

       चेक अनादरण से जुड़े मामलों में धारा 138 और धारा 148 का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि व्यावसायिक विश्वास को संरक्षित करना है। किंतु जब कंपनी कानूनी बाधाओं के कारण अभियोजित नहीं हो सकती और केवल निदेशक दोषसिद्ध होता है, तब 20% राशि जमा कराने का प्रश्न गंभीर संवैधानिक और विधिक विचार मांगता है।

       सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मुद्दे को बड़ी पीठ को संदर्भित करना यह दर्शाता है कि—

  • यह प्रश्न साधारण नहीं,
  • बल्कि कॉर्पोरेट आपराधिक देयता के भविष्य को प्रभावित करने वाला है।

अब सभी की निगाहें बड़ी पीठ के निर्णय पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि
क्या दोषसिद्ध निदेशक, कंपनी के बिना, धारा 148 के तहत 20% राशि जमा करने के लिए बाध्य किया जा सकता है या नहीं।

यह निर्णय निश्चय ही भारतीय वाणिज्यिक और आपराधिक कानून में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगा।