चूहों की सुपर चाल या सिस्टम की बड़ी चूक? 200 किलो गांजा ‘गायब’, सबूत नष्ट और आरोपी बरी — झारखंड से आपराधिक न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली कभी–कभी ऐसे मामलों से रू-बरू होती है जो केवल चौंकाने वाले ही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर कठोर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं। झारखंड के रांची से सामने आया 200 किलो गांजा वाला मामला भी ऐसा ही है—जहाँ अदालत में यह कहा गया कि जब्त किया गया गांजा चूहों ने खा लिया, और चूँकि मूल सबूत मौजूद नहीं है, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
यह कहानी केवल “चूहों की चाल” तक सीमित नहीं है; यह सबूतों की सुरक्षा, पुलिस की जवाबदेही, NDPS Act की सख़्ती और न्यायिक मानकों की कसौटी पर खरा उतरने की परीक्षा है।
1. घटना की शुरुआत: जब हाईवे पर रुकी एक कार
मामला जनवरी 2022 का है। रांची के पास राष्ट्रीय राजमार्ग पर पुलिस ने एक कार को रोका। तलाशी के दौरान पुलिस का दावा था कि कार से लगभग 200 किलो गांजा बरामद हुआ।
कार में बैठे युवक इंद्रजीत राय को मौके पर ही गिरफ़्तार कर लिया गया और उस पर NDPS Act के तहत मामला दर्ज किया गया।
NDPS मामलों में बरामदगी का दावा ही अभियोजन की रीढ़ होता है, क्योंकि इन्हीं पर आगे पूरी कार्यवाही निर्भर करती है।
2. NDPS Act: सख़्त कानून, सख़्त जिम्मेदारी
NDPS Act भारत के सबसे कठोर आपराधिक कानूनों में से एक है।
इसमें:
- लंबी कैद
- भारी जुर्माना
- और जमानत की सख़्त शर्तें
निर्धारित हैं।
लेकिन इसी सख़्ती के साथ कानून जांच एजेंसियों पर भी उच्च स्तर की जिम्मेदारी डालता है—खासकर सबूतों के संरक्षण को लेकर।
3. मालखाना: जहाँ से कहानी ने लिया अजीब मोड़
पुलिस के अनुसार, जब्त गांजे को थाने के मालखाने (Evidence Storeroom) में सुरक्षित रखा गया।
आमतौर पर NDPS मामलों में:
- सीलबंद पैकेट
- रजिस्टर में एंट्री
- और समय-समय पर निरीक्षण
अनिवार्य माना जाता है।
लेकिन अदालत में पुलिस की ओर से जो कहा गया, उसने पूरे केस की दिशा ही बदल दी—
“मालखाने में रखे गए गांजे को चूहों ने खा लिया, अब हमारे पास कोई मूल सबूत नहीं है।”
4. अदालत में खड़े हुए सवाल
यह बयान सुनते ही कई सवाल उठ खड़े हुए:
- क्या चूहे 200 किलो गांजा पूरी तरह खा सकते हैं?
- क्या मालखाने में कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी?
- नुकसान कब हुआ, और इसकी सूचना समय पर क्यों नहीं दी गई?
इन सवालों का स्पष्ट और संतोषजनक उत्तर पुलिस के पास नहीं था।
5. गवाहों के बयान और विरोधाभास
अदालत ने पाया कि:
- पुलिस गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते
- किसी ने कहा कि गांजा धीरे-धीरे नष्ट हुआ
- किसी ने कहा कि एक साथ पूरा गायब हो गया
ऐसे विरोधाभासों ने अभियोजन की विश्वसनीयता को और कमजोर कर दिया।
6. सबूतों की सुरक्षा: किसकी जिम्मेदारी?
भारतीय कानून में यह स्थापित सिद्धांत है कि:
जब कोई वस्तु जब्त की जाती है, तो उसकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी राज्य और पुलिस की होती है।
अगर सबूत नष्ट हो जाए, तो:
- उसका नुकसान आरोपी को नहीं,
- बल्कि अभियोजन पक्ष को उठाना पड़ता है।
7. Benefit of Doubt: आपराधिक कानून की आत्मा
आपराधिक न्याय का मूल सिद्धांत है:
“संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाएगा।”
यह सिद्धांत इसलिए है ताकि:
- निर्दोष को सज़ा न हो
- और राज्य अपनी शक्ति का दुरुपयोग न करे
जब:
- मूल सबूत मौजूद न हो
- गवाहों की कहानी असंगत हो
- और जांच में लापरवाही दिखे
तो अदालत के पास आरोपी को बरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
8. न्यायिक निर्णय और उसका आधार
इन सभी तथ्यों के आधार पर अदालत ने माना कि:
- अभियोजन दोष को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा
- सबूतों की सुरक्षा में घोर लापरवाही हुई
इसलिए आरोपी इंद्रजीत राय को बरी कर दिया गया।
यह निर्णय झारखंड हाईकोर्ट के न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप माना गया।
9. क्या सच में चूहे ही दोषी हैं?
यह प्रश्न आज भी चर्चा में है।
आलोचकों का कहना है:
- यह तर्क अविश्वसनीय लगता है
- यह प्रशासनिक अक्षमता या संभावित गड़बड़ी को छुपाने का तरीका भी हो सकता है
हालाँकि अदालत ने अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों की कमी के आधार पर फैसला दिया।
10. इस फैसले का व्यापक प्रभाव
इस मामले ने कई बड़े सवाल खड़े किए:
पुलिस व्यवस्था पर
- क्या मालखानों की हालत सुधारी जानी चाहिए?
- क्या अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए?
न्याय व्यवस्था पर
- क्या सख़्त कानून भी लापरवाही के आगे बेबस हो सकते हैं?
समाज पर
- क्या ऐसे मामलों से अपराधियों को गलत संदेश जाता है?
अन्य मामलों से तुलना
भारत में पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ:
- शराब या मादक पदार्थ नष्ट हो गए
- या अदालत में पेश नहीं किए जा सके
हर बार अदालतों ने यही कहा:
“कानून की सख़्ती, जांच की सख़्ती से ही सार्थक होती है।”
सुधार की ज़रूरत
इस मामले से कुछ ठोस सबक मिलते हैं:
- आधुनिक, कीट-रोधी मालखाने
- डिजिटल रिकॉर्ड और CCTV निगरानी
- नियमित ऑडिट
- और लापरवाही पर सख़्त कार्रवाई
जब तक ये सुधार नहीं होंगे, तब तक “चूहे” जैसे बहाने कानून को कमजोर करते रहेंगे।
निष्कर्ष: चूहे नहीं, जिम्मेदारी का संकट
यह मामला हमें याद दिलाता है कि:
- अपराध चाहे कितना भी बड़ा हो
- अगर राज्य अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएगा
- तो कानून भी असहाय हो जाएगा
चूहे प्रतीक हो सकते हैं, लेकिन असली समस्या सिस्टम की है।
जब तक सबूतों की सुरक्षा को गंभीरता से नहीं लिया जाएगा, तब तक ऐसे फैसले आते रहेंगे—जहाँ
सबूत गायब होंगे, और आरोपी छूट जाएगा।