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“चारदीवारी के भीतर हुई कथित गाली ‘सार्वजनिक दृष्टि’ में नहीं” — SC/ST एक्ट पर राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला

“चारदीवारी के भीतर हुई कथित गाली ‘सार्वजनिक दृष्टि’ में नहीं” — SC/ST एक्ट पर राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला

         भारतीय आपराधिक कानून में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 एक विशेष और कठोर कानून है, जिसका उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को जातिगत अपमान, भेदभाव और हिंसा से सुरक्षा प्रदान करना है। लेकिन इस कानून के प्रभावी और न्यायसंगत प्रयोग के लिए इसके आवश्यक तत्वों (Essential Ingredients) का पूरा होना अनिवार्य है।
इसी सिद्धांत को दोहराते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई SC/ST एक्ट के तहत सजा को निरस्त कर दिया गया।

        यह फैसला न केवल कानून की सही व्याख्या को स्पष्ट करता है, बल्कि यह भी बताता है कि हर अपमान या विवाद अपने-आप में SC/ST एक्ट का अपराध नहीं बन जाता, जब तक कि कानून में निर्धारित शर्तें पूरी न हों।


मामला क्या था?

       यह मामला वर्ष 1994 का है और एक वाहन (मोटरसाइकिल) शोरूम संचालक से जुड़ा हुआ था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि—

  • उसने आरोपी के शोरूम से लोन पर मोटरसाइकिल खरीदी
  • भुगतान (डिमांड ड्राफ्ट स्वीकार न करने) को लेकर विवाद हुआ
  • इसी दौरान आरोपी ने कथित रूप से
    • जातिसूचक गाली-गलौज की
    • और मारपीट भी की

इस आधार पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(x) (पुरानी धारा) के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।


हाईकोर्ट में चुनौती

ट्रायल कोर्ट के इस निर्णय को आरोपी ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति फरजंद अली की एकल पीठ ने की।


हाईकोर्ट का निर्णायक प्रश्न

हाईकोर्ट के समक्ष सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न यह था—

क्या किसी बंद दुकान, शोरूम या चारदीवारी के भीतर हुई कथित जातिसूचक गाली को “सार्वजनिक दृष्टि” (Public View) में किया गया कृत्य माना जा सकता है?

क्योंकि SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(x) के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए यह आवश्यक है कि—

  • जातिसूचक अपमान
  • “सार्वजनिक दृष्टि” में किया गया हो

“सार्वजनिक दृष्टि” की कानूनी व्याख्या

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा—

‘सार्वजनिक दृष्टि’ का अर्थ केवल यह नहीं है कि वहां एक से अधिक लोग मौजूद हों, बल्कि यह आवश्यक है कि आरोपी और पीड़ित के अलावा आम जनता उस अपमान को देख या सुन सके।’

अदालत ने आगे कहा कि—

  • यदि कथित घटना
    • बंद शोरूम
    • निजी कार्यालय
    • या चारदीवारी के भीतर
      हुई हो
  • और वहां आम लोगों की
    • न दृश्यता हो
    • न श्रव्यता (audibility)

तो ऐसी स्थिति में SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(x) के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते


स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह का अभाव

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि—

  • घटना के समय
    • किसी स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह की मौजूदगी साबित नहीं हो सकी
  • पूरा विवाद
    • भुगतान और व्यवसायिक लेन-देन से जुड़ा था
  • मामला मूलतः
    • व्यावसायिक (Commercial) विवाद प्रतीत होता है

इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि—

  • SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(x) लागू नहीं होती
  • ट्रायल कोर्ट ने कानून की गलत व्याख्या करते हुए सजा सुनाई थी

ट्रायल कोर्ट का फैसला क्यों खारिज हुआ?

राजस्थान हाईकोर्ट ने निम्न आधारों पर ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया—

  1. ‘सार्वजनिक दृष्टि’ का तत्व सिद्ध नहीं
  2. कोई स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह नहीं
  3. घटना निजी/बंद स्थान में हुई
  4. विवाद का मूल स्वरूप व्यावसायिक था

इन कारणों से SC/ST एक्ट के तहत दोषसिद्धि को असंवैधानिक और कानून-विरुद्ध माना गया।


अन्य कानूनों के तहत कार्रवाई खुली

हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि—

  • SC/ST एक्ट के तहत सजा निरस्त करने का अर्थ यह नहीं है कि
    • आरोपी पूरी तरह निर्दोष घोषित हो गया

अदालत ने कहा कि—

“इस मामले में अन्य कानूनों के तहत कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।”

अर्थात—

  • यदि मारपीट
  • धमकी
  • या अन्य आपराधिक कृत्य
    सिद्ध होते हैं, तो
  • IPC या अन्य लागू कानूनों के तहत कार्रवाई संभव है।

SC/ST एक्ट की धारा 3 और “Public View” का महत्व

यह फैसला एक बार फिर स्पष्ट करता है कि—

  • SC/ST एक्ट की धारा 3
  • एक विशेष और दंडात्मक प्रावधान है
  • इसकी सख्त और सावधानीपूर्वक व्याख्या आवश्यक है

सिर्फ जातिसूचक शब्दों का आरोप पर्याप्त नहीं है, बल्कि—

  • स्थान
  • परिस्थितियां
  • और सार्वजनिक दृश्यता

सभी का प्रमाण होना अनिवार्य है।


निचली अदालतों के लिए संदेश

यह निर्णय मजिस्ट्रेट और ट्रायल कोर्ट्स के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शन है कि—

  • SC/ST एक्ट के मामलों में
  • यांत्रिक तरीके से सजा न दी जाए
  • हर आवश्यक तत्व की
    • गहन जांच
    • और कानूनी समीक्षा की जाए

वकीलों और अभियुक्तों के लिए महत्व

 बचाव पक्ष (Defence)

  • यदि कथित घटना
    • निजी स्थान में हुई हो
    • और सार्वजनिक गवाह न हों
      तो
  • SC/ST एक्ट के तहत
    • डिस्चार्ज
    • या अपील में राहत
      मिल सकती है।

 अभियोजन पक्ष (Prosecution)

  • अब यह आवश्यक होगा कि
    • “Public View” का ठोस प्रमाण
    • स्वतंत्र गवाहों के माध्यम से
      प्रस्तुत किया जाए।

सामाजिक और विधिक संतुलन

यह फैसला यह संदेश देता है कि—

  • सामाजिक न्याय के नाम पर
  • कानून का दुरुपयोग स्वीकार्य नहीं
  • लेकिन
  • वास्तविक अत्याचारों के मामलों में
    • कानून पूरी सख्ती से लागू रहेगा

निष्कर्ष

राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय कि “बंद शोरूम या चारदीवारी के भीतर हुई कथित जातिसूचक गाली को ‘सार्वजनिक दृष्टि’ नहीं माना जा सकता”, SC/ST एक्ट की व्याख्या में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

यह फैसला—

  • कानून की सीमाओं को स्पष्ट करता है
  • दुरुपयोग की संभावनाओं को रोकता है
  • और निर्दोष व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करता है

साथ ही, यह भी सुनिश्चित करता है कि—

SC/ST एक्ट का प्रयोग तभी हो, जब उसके सभी आवश्यक तत्व विधिसम्मत रूप से सिद्ध हों।

इस प्रकार, यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में न्याय, संतुलन और संवैधानिकता को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण न्यायिक उदाहरण बनकर उभरता है।