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“घर सिर्फ छत नहीं, गरिमा और सुरक्षा का अधिकार” — 12 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय और भारत में आवास अधिकार का संवैधानिक विस्तार

“घर सिर्फ छत नहीं, गरिमा और सुरक्षा का अधिकार” — 12 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय और भारत में आवास अधिकार का संवैधानिक विस्तार

प्रस्तावना

      12 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे प्रश्न पर निर्णायक टिप्पणी की, जो करोड़ों भारतीयों के जीवन से सीधे जुड़ा है—क्या घर होना केवल एक सामाजिक-आर्थिक सुविधा है या यह नागरिक का मौलिक अधिकार है?
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि घर का अधिकार (Right to Housing), संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के अंतर्गत निहित है। कोर्ट के अनुसार, बिना सुरक्षित और सम्मानजनक आवास के व्यक्ति गरिमापूर्ण जीवन नहीं जी सकता।

      इस फैसले में न केवल सरकारों को सस्ती आवास योजनाओं (Affordable Housing) में निवेश बढ़ाने का निर्देश दिया गया, बल्कि रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 – RERA को और अधिक सख़्ती से लागू करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।


मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला उन याचिकाओं से जुड़ा था जिनमें—

  • बिल्डरों द्वारा परियोजनाओं में अत्यधिक देरी
  • घर खरीदारों की जीवनभर की जमा पूंजी का फँसना
  • झुग्गी-झोपड़ी और शहरी गरीबों का बिना पुनर्वास के विस्थापन
  • सरकारी आवास योजनाओं के अपर्याप्त क्रियान्वयन

जैसे मुद्दे उठाए गए थे। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि आवास की अनुपलब्धता सीधे जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के अधिकार को प्रभावित करती है।


सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“घर केवल ईंट-पत्थर की संरचना नहीं है; यह व्यक्ति की सुरक्षा, निजता, स्वास्थ्य और मानवीय गरिमा का आधार है। राज्य का दायित्व है कि वह हर नागरिक को न्यूनतम आवास सुविधा उपलब्ध कराए।”

कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि अगर भोजन और स्वच्छ पर्यावरण जीवन के अधिकार का हिस्सा हो सकते हैं, तो सुरक्षित आवास उससे अलग नहीं हो सकता।


अनुच्छेद 21 और आवास का अधिकार

अनुच्छेद 21 की व्याख्या समय-समय पर विस्तृत होती रही है। पहले इसमें केवल “जीवन” को शारीरिक अस्तित्व तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब इसमें शामिल हैं—

  • स्वच्छ पर्यावरण
  • स्वास्थ्य
  • शिक्षा
  • आजीविका
  • और अब आवास (Housing)

कोर्ट ने कहा कि बेघर व्यक्ति न तो अपने बच्चों को स्थिर शिक्षा दे सकता है, न ही सम्मानजनक रोजगार कर सकता है। इस प्रकार, आवास की कमी कई अन्य मौलिक अधिकारों को भी अप्रभावी बना देती है।


सरकार की जिम्मेदारी: सस्ती आवास योजनाएँ

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि—

  1. Affordable Housing को केवल नीति-घोषणा तक सीमित न रखा जाए।
  2. बजट में ठोस और पर्याप्त आवंटन किया जाए।
  3. शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में कम-आय वर्ग (EWS), निम्न-आय वर्ग (LIG) के लिए योजनाएँ प्रभावी हों।

कोर्ट ने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) जैसी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए, न कि कागज़ी आँकड़ों तक सीमित रहना चाहिए।


RERA को सख़्त करने की आवश्यकता

फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा RERA से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि—

  • कई राज्यों में RERA का क्रियान्वयन ढीला और औपचारिक बनकर रह गया है।
  • बिल्डर नियमों का उल्लंघन कर भी आसानी से बच निकलते हैं।
  • घर खरीदार वर्षों तक न्याय के लिए भटकते रहते हैं।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि—

  • RERA प्राधिकरणों को स्वतंत्र और सशक्त बनाया जाए।
  • परियोजना देरी पर स्वतः दंडात्मक कार्रवाई हो।
  • घर खरीदारों को त्वरित मुआवज़ा और ब्याज मिले।

बिल्डर-खरीदार असंतुलन पर टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट सेक्टर में व्याप्त शक्ति-असंतुलन को भी रेखांकित किया। कोर्ट ने कहा कि—

“घर खरीदार अपनी जीवनभर की कमाई लगाता है, जबकि बिल्डर व्यावसायिक जोखिम उठाकर भी नियम तोड़ने पर दंड से बच जाता है। यह असमानता संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है।”

इसलिए, घर खरीदार को उपभोक्ता ही नहीं, बल्कि अधिकारधारी नागरिक माना जाना चाहिए।


झुग्गी-झोपड़ी और पुनर्वास का प्रश्न

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि—

  • बिना वैकल्पिक व्यवस्था के झुग्गी-झोपड़ी हटाना असंवैधानिक है।
  • पुनर्वास केवल औपचारिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक और सम्मानजनक होना चाहिए।

यह टिप्पणी विशेष रूप से शहरी विकास परियोजनाओं में गरीब वर्ग के अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का भी उल्लेख किया, जैसे—

  • Universal Declaration of Human Rights (UDHR)
  • International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights (ICESCR)

इन दस्तावेज़ों में आवास को मानवाधिकार के रूप में मान्यता दी गई है। कोर्ट ने कहा कि भारत, एक संवैधानिक लोकतंत्र होने के नाते, इन मूल्यों से पीछे नहीं रह सकता।


संघीय ढाँचा और राज्यों की भूमिका

हालाँकि आवास एक ऐसा विषय है जिसमें केंद्र और राज्य दोनों की भूमिका होती है, कोर्ट ने कहा कि—

  • राज्य सरकारें जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं
  • केवल केंद्र सरकार पर दोष मढ़ना स्वीकार्य नहीं है।

हर राज्य को अपनी शहरी और ग्रामीण परिस्थितियों के अनुसार स्थानीय आवास नीति विकसित करनी होगी।


आलोचना और व्यावहारिक चुनौतियाँ

कुछ आलोचकों का कहना है कि—

  • इस निर्णय का क्रियान्वयन आसान नहीं होगा।
  • भूमि की कमी, शहरी भीड़, और वित्तीय सीमाएँ बड़ी बाधाएँ हैं।

लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक अधिकारों को प्रशासनिक कठिनाइयों के नाम पर टाला नहीं जा सकता।


इस फैसले का दूरगामी प्रभाव

इस ऐतिहासिक निर्णय के संभावित प्रभाव—

  • भविष्य में आवास से जुड़े मामलों में न्यायिक सक्रियता बढ़ेगी।
  • सरकारों पर नीति और बजट स्तर पर दबाव बनेगा।
  • रियल एस्टेट सेक्टर में जवाबदेही और पारदर्शिता आएगी।

सबसे महत्वपूर्ण, आम नागरिक को यह एहसास होगा कि घर माँगना कोई कृपा नहीं, बल्कि अधिकार है।


निष्कर्ष

     12 सितंबर 2025 का यह फैसला केवल एक कानूनी घोषणा नहीं, बल्कि संवैधानिक दर्शन का विस्तार है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि—

“जिस देश में नागरिक को छत तक का भरोसा न हो, वहाँ स्वतंत्रता और गरिमा अधूरी रह जाती है।”

यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक न्याय की अवधारणा को और मजबूत करता है और आने वाले वर्षों में आवास नीति, शहरी विकास और नागरिक अधिकारों की दिशा तय करेगा।