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क्या भर्ती के बीच में बदले जा सकते हैं नियम? सुप्रीम कोर्ट के ‘Rules of the Game’ सिद्धांत पर ऐतिहासिक फैसला

क्या भर्ती के बीच में बदले जा सकते हैं नियम? सुप्रीम कोर्ट के ‘Rules of the Game’ सिद्धांत पर ऐतिहासिक फैसला

प्रस्तावना: भर्ती प्रक्रिया और न्याय की उम्मीद

      भारत में सरकारी नौकरी केवल एक रोजगार नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, सम्मान और स्थिर भविष्य का प्रतीक मानी जाती है। यही कारण है कि हर वर्ष करोड़ों युवा विभिन्न सरकारी भर्तियों के लिए कठिन परिश्रम करते हैं। कोई वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है, तो कोई सीमित संसाधनों में रहकर अपने सपनों को साकार करने का प्रयास करता है।

      लेकिन इन प्रयासों के बीच एक बड़ी समस्या बार-बार सामने आती रही है—भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियमों में बदलाव। कभी कट-ऑफ बढ़ा दी जाती है, कभी इंटरव्यू का वेटेज बदल दिया जाता है, तो कभी नई योग्यता जोड़ दी जाती है। इसका सीधा असर उन उम्मीदवारों पर पड़ता है जिन्होंने पहले से घोषित नियमों के आधार पर तैयारी की होती है।

      इसी पृष्ठभूमि में भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भर्ती प्रक्रिया में नियम बदलने के प्रश्न पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। यह फैसला केवल कानूनी दृष्टि से ही नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के भरोसे और उम्मीदों के लिहाज से भी ऐतिहासिक माना जा रहा है।


‘Rules of the Game’ सिद्धांत क्या है?

      ‘Rules of the Game’ सिद्धांत प्रशासनिक कानून (Administrative Law) का एक सुव्यवस्थित और स्थापित सिद्धांत है। इसका मूल भाव अत्यंत सरल है—जब खेल शुरू हो जाए, तो उसके नियम नहीं बदले जा सकते।

कानूनी संदर्भ में इसका अर्थ यह है कि:

  • जब किसी पद के लिए विज्ञापन जारी हो जाता है
  • और उम्मीदवार उस विज्ञापन के आधार पर आवेदन कर देते हैं
  • तब चयन प्रक्रिया के दौरान नियमों में ऐसा बदलाव नहीं किया जा सकता, जिससे उम्मीदवारों की पात्रता या चयन की संभावना प्रभावित हो

यह सिद्धांत प्रशासन की मनमानी पर रोक लगाने के लिए विकसित हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने अनेक फैसलों में यह दोहराया है कि राज्य या उसके अधीन संस्थान चयन प्रक्रिया के दौरान “गोलपोस्ट” नहीं बदल सकते।


यह मुद्दा बार-बार क्यों उठता है?

व्यवहार में अक्सर यह देखने को मिलता है कि:

  • परीक्षा हो जाने के बाद पासिंग मार्क्स बढ़ा दिए जाते हैं
  • इंटरव्यू का महत्व अचानक बढ़ा दिया जाता है
  • या लिखित परीक्षा के वेटेज को घटा दिया जाता है

इन परिवर्तनों का सीधा नुकसान उन उम्मीदवारों को होता है जो पहले से घोषित नियमों पर भरोसा करके तैयारी कर चुके होते हैं। इससे न केवल असमानता पैदा होती है, बल्कि चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठते हैं।


सुप्रीम कोर्ट का ताजा ऐतिहासिक फैसला (2024–25 संदर्भ)

हाल के वर्षों में इस सिद्धांत पर सबसे महत्वपूर्ण फैसला पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा दिया गया, जिसमें तेज प्रकाश पाठक बनाम राजस्थान उच्च न्यायालय सहित कई मामलों पर विचार किया गया।

इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट और दो टूक शब्दों में कहा कि:

1. प्रक्रिया के बीच बदलाव सामान्यतः असंवैधानिक है

यदि भर्ती विज्ञापन या नियमों में पहले से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि चयन प्रक्रिया के दौरान नियम बदले जा सकते हैं, तो बाद में योग्यता या चयन मानदंड में बदलाव करना अवैध होगा।

2. अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन

कोर्ट ने कहा कि भर्ती के बीच नियम बदलना:

  • अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार)
  • अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन में अवसर की समानता)

का उल्लंघन है। ऐसा आचरण मनमाना (Arbitrary) और अनुचित (Unfair) माना जाएगा।

3. Legitimate Expectation का सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि उम्मीदवारों को यह वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation) होती है कि उनका चयन उसी नियमावली के आधार पर होगा, जो आवेदन के समय प्रभावी थी।

यह अपेक्षा केवल नैतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक संरक्षण प्राप्त अपेक्षा है।


पहले के महत्वपूर्ण निर्णय: न्यायिक निरंतरता

यह फैसला कोई अपवाद नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की पहले से चली आ रही न्यायिक सोच का विस्तार है।

के. मंजुश्री बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2008)

इस मामले में इंटरव्यू के लिए न्यूनतम अंक लिखित परीक्षा के बाद तय किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि:

“Once the selection process has started, the rules of the game cannot be changed.”

अन्य प्रासंगिक निर्णय

  • हेमानी मल्होत्रा बनाम हाई कोर्ट ऑफ दिल्ली
  • पवन प्रताप सिंह बनाम राज्य उत्तर प्रदेश

इन सभी मामलों में न्यायालय ने चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और पूर्व-निश्चित नियमों पर जोर दिया।


किन परिस्थितियों में नियमों में बदलाव संभव है?

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नियमों में बदलाव पूरी तरह निषिद्ध नहीं है, लेकिन इसके लिए सख्त शर्तें हैं:

1. यदि विज्ञापन में पहले से प्रावधान हो

यदि भर्ती विज्ञापन या नियमों में यह स्पष्ट रूप से लिखा हो कि आवश्यकता पड़ने पर नियम बदले जा सकते हैं, तो सीमित परिस्थितियों में बदलाव संभव है।

2. वैधानिक संशोधन के कारण

यदि संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा किसी कानून में संशोधन किया गया हो, जिससे नियम बदलना अनिवार्य हो जाए, तो चयन प्रक्रिया को उस कानून के अनुरूप ढालना पड़ेगा।

3. बदलाव निष्पक्ष और सार्वभौमिक हो

कोई भी परिवर्तन:

  • सभी उम्मीदवारों पर समान रूप से लागू होना चाहिए
  • किसी विशेष वर्ग या व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से नहीं होना चाहिए

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों पर प्रभाव

यह फैसला विशेष रूप से उन छात्रों के लिए राहत लेकर आया है जो वर्षों से चयन प्रक्रियाओं की अनिश्चितता से जूझ रहे थे। अब भर्ती करने वाले निकाय:

  • परीक्षा के बाद कट-ऑफ नहीं बढ़ा सकते
  • इंटरव्यू का वेटेज मनमाने ढंग से नहीं बदल सकते
  • चयन प्रक्रिया के बीच नई योग्यता नहीं जोड़ सकते

इससे तैयारी करने वाले छात्रों को मानसिक सुरक्षा और स्थिरता मिलेगी।


प्रशासन और भर्ती संस्थाओं के लिए संदेश

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि:

  • प्रशासनिक सुविधा न्याय से ऊपर नहीं हो सकती
  • पारदर्शिता और पूर्व-निर्धारित नियम अनिवार्य हैं
  • सत्ता का प्रयोग विवेकपूर्ण और संवैधानिक सीमाओं में होना चाहिए

भर्ती संस्थाओं को अब विज्ञापन जारी करते समय अत्यधिक सावधानी बरतनी होगी।


निष्कर्ष: पारदर्शिता और निष्पक्षता की जीत

‘Rules of the Game’ सिद्धांत पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय प्रशासनिक कानून में एक मील का पत्थर है। यह निर्णय न केवल उम्मीदवारों के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि चयन प्रक्रियाओं में जनता के विश्वास को भी मजबूत करता है।

यह फैसला याद दिलाता है कि न्याय केवल परिणाम में नहीं, बल्कि प्रक्रिया में भी होना चाहिए। जब नियम स्पष्ट, स्थिर और निष्पक्ष होंगे, तभी वास्तव में समान अवसर की अवधारणा साकार हो सकेगी।


महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु (Exam-Oriented Summary)

  • सिद्धांत: चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियम नहीं बदले जा सकते
  • संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 14 और 16
  • प्रमुख वाद:
    • K. Manjusree v. State of Andhra Pradesh (2008)
    • Tej Prakash Pathak v. Rajasthan High Court

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