“क्या इसे अनुमति दी जानी चाहिए?” — टेट्रा पैक में शराब बेचने पर सुप्रीम कोर्ट की गंभीर टिप्पणी, कहा: स्कूल के बच्चे भी आसानी से पहुँच सकते हैं
परिचय : सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी और टेट्रा पैक विवाद
शराब को टेट्रा-पैक (Tetra Packs) में बेचने की अनुमति पर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा—
“Should this be permitted?”
यानी “क्या इस तरह शराब बेचना उचित है?”
अदालत ने कहा कि टेट्रा‐पैक में शराब को रखना “खतरनाक” हो सकता है, क्योंकि यह स्कूल और कॉलेज पढ़ने वाले नाबालिग बच्चों के लिए आसानी से उपलब्ध, छिपाने योग्य और कम संदेह पैदा करने वाला विकल्प बन जाता है। यह अवलोकन देश में शराब की आसान उपलब्धता, नाबालिगों की सुरक्षा और राज्य सरकारों के नियामक दायित्व से जुड़े गंभीर प्रश्नों को उजागर करता है।
यह मुद्दा केवल शराब बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, नीति निर्माण, बच्चों की सुरक्षा, समाज में शराब की संस्कृति और राज्यों के राजस्व मॉडल जैसे कई गहरे मुद्दों से जुड़ा हुआ है। इस लेख में हम इस पूरे विवाद को विस्तार से समझेंगे, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का विश्लेषण करेंगे और आगे की संभावित स्थिति पर प्रकाश डालेंगे।
1. मामला क्या है? : टेट्रा पैक में शराब बेचने की अनुमति पर प्रश्न
कुछ राज्यों ने शराब को टेट्रा पैक में बेचने की अनुमति दी है। यह पैकिंग उसी तरह का होता है जैसे दूध, जूस या सॉफ्ट ड्रिंक के पैक होते हैं।
इससे शराब की पैकेजिंग:
- हल्की
- सस्ती
- आसानी से ले जाने योग्य
- कम पहचान योग्य
हो जाती है।
इसी मुद्दे पर एक याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि यह व्यवस्था नाबालिगों और स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए शराब की उपलब्धता बेहद आसान बना देती है।
याचिका के मुख्य तर्क:
- टेट्रा पैक को बैग में छिपाना आसान है
- दिखने में यह अन्य पेय पदार्थों जैसा लगता है
- दुकानदार भी इसे आसानी से बेच देते हैं
- कई राज्यों में नियमों की निगरानी कमजोर है
- बच्चों में शराब की लत बढ़ने का खतरा
सुप्रीम कोर्ट ने इन चिंताओं को गंभीर बताते हुए अपनी नाराजगी और आशंका दर्ज की।
2. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी : “बच्चे आसानी से ले जा सकते हैं”
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि—
“टेट्रा पैक में शराब बेचना क्यों अनुमति दी जा रही है? कोई भी बच्चा इसे अपने बैग में रखकर स्कूल ले जा सकता है। एक आम नजर में यह दूध या जूस के पैक जैसा दिखता है। क्या यह वाकई उचित है?”
अदालत की यह टिप्पणी दर्शाती है कि नीति बनाते समय राज्यों ने बाल सुरक्षा और सामाजिक प्रभाव पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
Supreme Court की मुख्य चिंताएँ:
- टेट्रा-पैक की खासियतों को गलत तरीके से उपयोग किया जा सकता है
- यह “गुप्त शराबखोरी” को बढ़ावा दे सकता है
- ये पैक “कम संदेहास्पद” होते हैं
- नाबालिग बच्चे, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों या छोटे शहरों में, इसे आसानी से खरीद सकते हैं
- दुकानदारों द्वारा उम्र की जांच सुनिश्चित करना मुश्किल है
कानूनी रूप से नाबालिगों को शराब बेचना अपराध है (कई राज्यों में यह कड़ी कार्रवाई के दायरे में है), लेकिन ग्राउंड-लेवल पर निगरानी की स्थिति कमजोर है।
3. टेट्रा पैक बनाम बोतल : पैकेजिंग का विवाद
टेट्रा पैक के फायदे (सरकार और शराब कंपनियों के अनुसार):
- उत्पादन की लागत कम
- टूट-फूट की समस्या नहीं
- परिवहन में आसान
- प्लास्टिक और कांच की तुलना में पर्यावरण के अनुकूल
- कर राजस्व में नुकसान नहीं
टेट्रा पैक के खतरे (सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार):
- बच्चों के लिए पहचान में कठिनाई
- ज्यादा छुपाने योग्य
- अवैध या अनियमित बिक्री को बढ़ावा
- मात्रा नियंत्रण की समस्या
- नशे की ओर झुकाव रखने वाले लोगों में खपत बढ़ सकती है
सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं खतरों को आधार बनाकर सवाल उठाया कि राज्य सरकारों ने “सुविधा” के नाम पर बच्चों की सुरक्षा को कैसे अनदेखा कर दिया।
4. विभिन्न राज्यों में शराब नीति और टेट्रा पैक की स्थिति
भारत में शराब पर कोई केंद्रीय कानून नहीं है। हर राज्य अपनी शराब नीति (Excise Policy) बनाता है। कई राज्यों में टेट्रा पैक का उपयोग सामान्य है, जैसे:
- हरियाणा
- पंजाब
- राजस्थान
- छत्तीसगढ़
- कर्नाटक
- महाराष्ट्र
- उत्तर प्रदेश (कुछ ब्रांडों में)
लेकिन कुछ राज्यों में इसे अनैतिक और सामाजिक दृष्टि से गलत मानकर सीमित उपयोग दिया जाता है।
5. क्या राज्यों ने बाल संरक्षण नीति का उल्लंघन किया?
भारत में Juvenile Justice Act, Pocso, National Policy for Children, और Right to Protection from Substance Abuse जैसी नीतियाँ राज्यों को बच्चों को नशे से दूर रखने की जिम्मेदारी देती हैं।
अगर पैकिंग ऐसी बन जाए, जो बच्चों को शराब खरीदने में आसानी प्रदान करे, तो यह राज्य सरकारों की नीति पर गंभीर सवाल उठाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि—
“राजस्व बढ़ाने के लिए बच्चों की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता।”
6. नाबालिगों में शराब की बढ़ती पहुंच: राष्ट्रीय चिंता
कई अध्ययन बताते हैं कि भारत में:
- 14–17 वर्ष के छात्रों में शराब प्रयोग का प्रतिशत पिछले दशक में काफी बढ़ा है
- छोटे पैक, कम कीमत और छुपाने योग्य पैकेजिंग इस समस्या को बढ़ाते हैं
- ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में दुकानदार उम्र की जांच नहीं करते
- बच्चों में नशे की शुरुआत आमतौर पर 14–16 वर्ष के बीच हो रही है
टेट्रा-पैक को आसानी से स्कूल बैग, साइकल के कैरियर, या पॉकेट में रखा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी जोखिम को “बहुत गंभीर” बताते हुए नीति की समीक्षा की मांग की है।
7. कानूनी प्रश्न : क्या टेट्रा पैक प्रतिबंधित किया जा सकता है?
यहाँ कई कानूनी प्रश्न उठते हैं—
(1) क्या सुप्रीम कोर्ट पैकेजिंग पर सीधे आदेश जारी कर सकता है?
हाँ, यदि यह पाया जाए कि पैकिंग सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरे में डालती है, तो सुप्रीम कोर्ट निर्देश दे सकता है।
(2) क्या राज्य सरकारें इसे बंद कर सकती हैं?
बिल्कुल — Excise Policy में संशोधन करके।
(3) क्या शराब कंपनियाँ इसका विरोध करेंगी?
संभव है, क्योंकि टेट्रा-पैक सस्ता और लाभकारी है।
(4) क्या यह संविधान के तहत राज्य की शक्ति (State List Entry 51) में आता है?
हाँ — शराब पर कानून बनाना पूर्णतः राज्यों का अधिकार है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट जनहित और बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए हस्तक्षेप कर सकता है।
8. सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप का महत्व
सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश सिर्फ सुनवाई स्थगित करते हुए नहीं दिया। बल्कि उसने स्पष्ट किया कि:
- राज्य सरकारों को इस मुद्दे पर जवाब देना होगा
- क्यों टेट्रा पैक में शराब को व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराया गया
- क्या इसके सामाजिक प्रभाव का अध्ययन किया गया?
- क्या बाल संरक्षण पर कोई शोध रिपोर्ट मौजूद है?
अदालत के इस हस्तक्षेप से राज्यों पर दबाव बढ़ सकता है कि वे अपनी शराब नीति में संशोधन करें।
9. शराब कंपनियों के तर्क : उद्योग की दृष्टि से मामला
शराब कंपनियाँ टेट्रा पैक के समर्थन में कहती हैं—
- दुनिया के कई देशों में शराब टेट्रा पैक में बिकती है
- यह Eco-Friendly है
- पैकिंग किफायती है
- टैक्स चोरी की संभावना कम होती है
- गरीब या मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं के लिए सस्ती पैकेजिंग उपलब्ध होती है
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने इस समय उपभोक्ता नहीं, नाबालिग बच्चों की सुरक्षा मुख्य मुद्दा है।
10. सामाजिक दृष्टिकोण : क्या शराब और स्कूल एक ही दिशा में जा रहे हैं?
शराब की उपलब्धता बढ़ने और पैकिंग के हल्के रूप (जैसे टेट्रा पैक) के चलते स्कूल के बच्चों तक नशे की पहुंच एक राष्ट्रीय समस्या बन चुकी है।
- बच्चे इसे सामान्य पेय पदार्थ समझ सकते हैं
- साथी दबाव में इसे छिपाकर पी सकते हैं
- माता-पिता पहचान नहीं कर पाते
- स्कूलों में निगरानी असंभव हो जाती है
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी समाज में इस छिपी हुई समस्या को सामने लाती है।
11. आगे क्या? सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई में क्या होगा
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से विस्तृत जवाब मांगा है।
अगली सुनवाई में न्यायालय यह देखेगा—
- राज्यों ने नीति कैसे बनाई?
- बच्चों की सुरक्षा पर अध्ययन क्यों नहीं किया गया?
- क्या टेट्रा पैक को सीमित या प्रतिबंधित किया जा सकता है?
- क्या शराब कंपनियों को वैकल्पिक पैकेजिंग अपनाने का निर्देश दिया जा सकता है?
संभावना है कि अदालत इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर की गाइडलाइन जारी करे।
निष्कर्ष : सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और सामाजिक जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी —
“Should this be permitted?”
— केवल एक प्रश्न नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि सरकारें राजस्व के मोह में बच्चों की सुरक्षा को पीछे न करें।
टेट्रा पैक में शराब की उपलब्धता एक आसान, सस्ता और छुपाने योग्य साधन है, और इससे बच्चों के नशे में लिप्त होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
अदालत का हस्तक्षेप इस समस्या को गंभीरता से देखने की दिशा में पहला कदम है।
आने वाले दिनों में यह मामला:
- नीति निर्माण
- सार्वजनिक स्वास्थ्य
- शराब बाजार
- और बच्चों की सुरक्षा
— इन सभी क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है।