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“क्या इंतज़ार है अगली दुर्घटना का?” — दिल्ली हाईकोर्ट ने भारतीय रेल पर साल भर की देरी और लापरवाही पर कड़ी फटकार

“क्या इंतज़ार है अगली दुर्घटना का?” — दिल्ली हाईकोर्ट ने भारतीय रेल पर साल भर की देरी और लापरवाही पर कड़ी फटकार

परिचय

      7 जनवरी 2026 को दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने भारतीय रेल (Indian Railways) पर कड़ी नाराज़गी जताई और उसकी निष्क्रियता के लिए तीखी फटकार लगाई। यह मामला नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर 15 फरवरी 2025 को हुई भीड़ भगदड़ (crowd crush) से जुड़ी जनहित याचिका (PIL) से संबंधित है। न्यायालय ने रेलवे प्रबंधन से अपेक्षित जवाब और हलफनामा दाखिल न करने पर गंभीर चिंता जताई, यह सवाल उठाते हुए कि क्या विभाग “किसी और पहाड़ी दुर्घटना” का इंतज़ार कर रहा है। यह घटना न केवल यात्रियों की सुरक्षा पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि प्रशासन गंभीर सुरक्षा मुद्दों को समय पर संबोधित करने में विफल क्यों रहा है।


1. भीड़ भगदड़: एक दर्दनाक पृष्ठभूमि

      15 फरवरी 2025 को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन प्लेटफ़ॉर्म 14 और 15 पर भारी भीड़ की वजह से भीड़ भगदड़ की घटना घटी। इस घटना के कारण कम से कम 18 लोगों की मौत और दर्जनों यात्री घायल हुए। यह भारी भीड़ महाराष्ट्र प्रयागराज महा कुंभ (Maha Kumbh) से लौटने वाले यात्रियों की थी, जिसने स्टेशन पर नियंत्रण खो दिया। भीड़ की अचानक बढ़ोतरी, टिकटों की अंधाधुंध बिक्री और ट्रेन के विलंब के कारण स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई, जिससे भगदड़ की भयानक घटना हुई।

       इस भगदड़ के बाद कोर्ट ने भारतीय रेल प्रबंधन तथा केन्द्र सरकार को नोटिस जारी किया और संभावित सुधारों पर कार्रवाई के निर्देश दिए। न्यायालय ने विशेषकर यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने की ज़रूरत पर बल दिया।


2. PIL और कोर्ट के निर्देश

      भीड़ भगदड़ की घटना के बाद एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई थी, जिसमें रेलवे प्रशासन से कई सुरक्षा उपायों और भीड़ नियंत्रण के उपायों को लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई। इस याचिका में मुख्य रूप से निम्न बिंदुओं पर ध्यान देने को कहा गया था:

(क) यात्रियों की अधिकतम संख्या

        रेलवे एक्ट की धारा 57 के तहत प्रत्येक डिब्बे में अधिकतम यात्रियों की संख्या निर्धारित करने और उसे कोच पर स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने की आवश्यकता होती है, जिससे भीड़ नियंत्रण को सुनिश्चित किया जा सके।

(ख) गैरकानूनी प्रवेश पर दंड

        धारा147 के अंतर्गत बिना वैध अधिकार के किसी भी रेलवे परिसर में प्रवेश करने वाले लोगों को दंडित किया जा सकता है, जिसमें जेल की सजा या जुर्माना शामिल है।

(ग) ओवरबुकिंग और टिकट नियंत्रण

        कोर्ट ने रेलवे से यह भी पूछा कि अगर कोच में यात्रियों की एक निश्चित सीमा है, तो रेल प्रशासन अधिक टिकट क्यों बेचता है, जिससे डिब्बों में क्षमता से ज़्यादा लोग सवार होते हैं और भीड़ नियंत्रण मुश्किल हो जाता है।


3. साल भर बाद भी हलफनामा नहीं

        दिल्ली उच्च न्यायालय ने रेलवे को 26 मार्च 2025 तक एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था, जिसमें दुर्घटना के बाद उठाए गए कदमों, भीड़ नियंत्रण रणनीतियों और सुधारों का विवरण होना चाहिए था।

      हालाँकि, करीब एक साल बाद भी वह हलफनामा दाखिल नहीं किया गया। कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई और पूछा कि क्या रेल प्रशासन इतना “उदासीन” है कि वह आवश्यक जवाब देने में विफल है। मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया ने टिप्पणी की कि क्या अधिकारी “किसी और गंभीर हादसे का इंतज़ार” कर रहे हैं। इस टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि कोर्ट रेल प्रशासन की धीमी गति और उत्तरदायित्वों की अनदेखी को गंभीरता से ले रहा है।


4. रेलवे प्रशासन का जवाब और कोर्ट की प्रतिक्रिया

         रेलवे के वकील ने कोर्ट को बताया कि कई उपायों पर काम चल रहा है और रेलवे बोर्ड ने ओवरक crowdिंग और टिकटों की अधिक बिक्री को रोकने के उपायों पर विचार किया है। उन्होंने कहा कि विस्तृत हलफनामा चार सप्ताह के भीतर दाखिल किया जाएगा। अदालत ने यह अतिरिक्त समय दिया, लेकिन यह स्पष्ट किया कि इसमें सिर्फ़ सामान्य उपायों का उल्लेख नहीं, बल्कि ठोस, तिथि-आधारित सुधारों का विवरण होना चाहिए

          कोर्ट ने रेलवे प्रशासन पर यह भी ज़ोर दिया कि अब समय सीमा दी जा चुकी है और उसे इसे गंभीरता से लेना चाहिए। यदि सुरक्षा उपायों को प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया, तो यह प्रश्न खड़ा होता है कि क्या यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है या नहीं।


5. सुरक्षा उपाय और प्रशासनिक सुधार

भगदड़ के बाद रेल प्रशासन ने कुछ तत्काल उपाय लागू करने की कोशिश की थी। उदाहरणतः:

विशेष होल्डिंग क्षेत्र बनाए गए

कुछ रिपोर्टों के अनुसार नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर यात्रियों के लिए विशेष होल्डिंग ज़ोन बनाए गए ताकि प्लेटफ़ॉर्म पर भीड़ को नियंत्रित किया जा सके। इस क्षेत्र में लोग टिकट दिखाकर ही प्रवेश कर सकते थे और अलग-अलग यात्रियों के लिए अलग प्रवेश मार्ग बनाए गए थे।

भीड़ नियंत्रण के लिए अतिरिक्त स्टाफ

अतिरिक्त रेलवे पुलिस बल और सुरक्षा कर्मियों को तैनात किया गया ताकि भीड़ का बेहतर तरीके से प्रबंधन किया जा सके। साथ ही यात्रियों को टिकट के बिना प्लेटफ़ॉर्म पर प्रवेश न करने दिया गया।

इन मामलों के बावजूद, असली चुनौती यह है कि क्या ये उपाय स्थायी और प्रभावी हैं, और क्या रेल प्रशासन भविष्य में भीड़ से जुड़े खतरों को रोकने में सक्षम होगा।


6. यात्रियों की सुरक्षा: क्यों महत्वपूर्ण?

भारतीय रेल दुनिया की सबसे बड़ी रेल व्यवस्था में से एक है और प्रतिदिन लाखों लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण का संबंध सिर्फ़ कानूनी दायित्व से नहीं है—यह मानव जीवन की रक्षा और यात्रियों के भरोसे से जुड़ा है। रेल प्रशासन क़ानूनी प्रावधानों को लागू करने में विफल रहा तो चाहे वह धारा 57, 147 या अन्य प्रावधान हों—इसका सीधा असर यात्रियों पर पड़ेगा।


7. निष्कर्ष: जिम्मेदारी बनाम लापरवाही

दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा भारतीय रेल पर लगाई गई कड़ी टिप्पणी केवल एक अदालती आदेश नहीं है—यह एक सार्वजनिक चेतावनी है कि सरकारी संस्थाओं की जवाबदेही, विशेष रूप से यात्रियों की सुरक्षा के मामलों में, सर्वोपरि होनी चाहिए। अगर प्रशासन समय पर जवाब न दे और आवश्यक सुधार लागू न करे, तो भविष्य में इसी तरह की ट्रैजिक दुर्घटनाएँ दोहराई जा सकती हैं।

उम्मीद है कि अब रेल प्रशासन न केवल हलफनामा दाखिल करेगा, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाएगा और सुनिश्चित करेगा कि रेल यातायात किसी भी तरह की भीड़ भगदड़ जैसी घटनाओं का सामना करने के लिए तैयार रहे।