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कारागारों के भीतर भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त नजर: मध्य प्रदेश जेल कानून और पुलिस नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर ऐतिहासिक सुनवाई

कारागारों के भीतर भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त नजर: मध्य प्रदेश जेल कानून और पुलिस नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर ऐतिहासिक सुनवाई

 भूमिका

          भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, गरिमा और मानवाधिकार की गारंटी देता है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या ये अधिकार कारागार की दीवारों के भीतर भी उतने ही प्रभावी रूप से लागू होते हैं? क्या जेल में बंद व्यक्ति केवल अपनी स्वतंत्रता खोता है या फिर उससे मानवीय गरिमा और समानता का अधिकार भी छिन जाता है?

        इन्हीं गंभीर संवैधानिक प्रश्नों के केंद्र में 15 दिसंबर को Supreme Court of India के समक्ष एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया, जब न्यायालय ने एक चल रहे स्वप्रेरित (Suo Motu) मामले में दायर अंतरिम आवेदन (Interlocutory Application) पर विचार किया। इस आवेदन में मध्य प्रदेश के जेल कानून और पुलिस नियमों के कुछ प्रावधानों को भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताते हुए उन्हें निरस्त करने की मांग की गई है।

        यह मामला केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे भारत की जेल व्यवस्था में व्याप्त संरचनात्मक भेदभाव और अमानवीय प्रथाओं पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाता है।


सुओ मोटो मामला: पृष्ठभूमि और उद्देश्य

        सुप्रीम कोर्ट ने कुछ समय पूर्व देशभर की जेलों में भेदभाव से संबंधित रिपोर्टों, मीडिया समाचारों और याचिकाओं को संज्ञान में लेते हुए स्वप्रेरित कार्यवाही प्रारंभ की थी।

इस Suo Motu मामले का उद्देश्य है—

  • जेलों के भीतर जाति, धर्म, वर्ग और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर होने वाले भेदभाव की जांच
  • जेल नियमों और मैनुअलों में निहित औपनिवेशिक और असमान प्रावधानों की समीक्षा
  • यह सुनिश्चित करना कि कारावास केवल स्वतंत्रता का प्रतिबंध हो, न कि मानव गरिमा का हनन

इसी व्यापक कार्यवाही के अंतर्गत यह अंतरिम आवेदन दायर किया गया।


अंतरिम आवेदन (Interlocutory Application) में क्या मांग की गई?

इस आवेदन में आरोप लगाया गया है कि—

  • मध्य प्रदेश जेल कानून और
  • पुलिस नियमावली के कुछ प्रावधान

आज भी ऐसे शब्दों, वर्गीकरणों और प्रक्रियाओं को बनाए हुए हैं, जो—

  • कुछ कैदियों को स्वभावतः अपराधी मानते हैं
  • सामाजिक पहचान के आधार पर अलग व्यवहार को वैध ठहराते हैं
  • और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत गरिमा) का उल्लंघन करते हैं

याचिकाकर्ता का कहना है कि ये प्रावधान औपनिवेशिक मानसिकता से प्रेरित हैं और आधुनिक संवैधानिक मूल्यों से मेल नहीं खाते।


भेदभाव के आरोप: जेल के भीतर समानता का प्रश्न

अंतरिम आवेदन में विशेष रूप से यह तर्क दिया गया कि—

  • कुछ जेल नियमों में कैदियों का वर्गीकरण उनकी जाति, आदतों या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर किया जाता है
  • कुछ कार्य (जैसे सफाई या मैला उठाने जैसे कार्य) अप्रत्यक्ष रूप से विशेष समुदायों से जोड़े जाते हैं
  • यह वर्गीकरण केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि अपमानजनक और कलंकित करने वाला है

यह स्थिति सीधे-सीधे संविधान के उस सिद्धांत के विरुद्ध है, जो कहता है कि कानून के समक्ष सभी समान हैं, चाहे वे स्वतंत्र हों या कारागार में बंद।


सुप्रीम कोर्ट की प्रारंभिक टिप्पणियाँ और दृष्टिकोण

15 दिसंबर की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय की गंभीरता और संवेदनशीलता को स्वीकार किया। न्यायालय ने संकेत दिया कि—

  • कारागार में बंद व्यक्ति भी संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं होते
  • केवल सजा का उद्देश्य सुधार (Reformation) है, न कि अपमान या भेदभाव
  • यदि कोई जेल कानून या नियम मौलिक अधिकारों के विपरीत है, तो उसका पुनरीक्षण आवश्यक है

हालाँकि अदालत ने अंतिम निर्णय सुरक्षित रखा, लेकिन यह स्पष्ट किया कि वह इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर देख रही है, न कि केवल किसी एक राज्य तक सीमित मानकर।


संवैधानिक परिप्रेक्ष्य: अनुच्छेद 14 और 21 की भूमिका

अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार

यह अनुच्छेद राज्य को मनमाने और भेदभावपूर्ण व्यवहार से रोकता है। जेल प्रशासन भी “राज्य” की परिभाषा में आता है, इसलिए—

  • कैदियों के साथ असमान व्यवहार
  • बिना तार्किक आधार के वर्गीकरण

असंवैधानिक ठहराया जा सकता है।

 अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत गरिमा

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि—

कारावास केवल स्वतंत्रता का प्रतिबंध है, जीवन और गरिमा का नहीं।

यदि जेल नियम किसी कैदी को अपमानित, कलंकित या अमानवीय स्थिति में रखते हैं, तो वे अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करते हैं।


जेल सुधार और औपनिवेशिक विरासत

भारत की अधिकांश जेल नियमावलियाँ—

  • ब्रिटिश काल की सोच से प्रभावित हैं
  • “अपराधी वर्ग” जैसी अवधारणाओं पर आधारित हैं

स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी यदि ऐसे प्रावधान बने हुए हैं, तो यह कानूनी और नैतिक विफलता का संकेत है। सुप्रीम कोर्ट की यह कार्यवाही उसी विरासत को तोड़ने का प्रयास मानी जा रही है।


मध्य प्रदेश के संदर्भ से राष्ट्रीय बहस तक

यद्यपि अंतरिम आवेदन मध्य प्रदेश के कानूनों और नियमों को चुनौती देता है, लेकिन इसके परिणाम—

  • अन्य राज्यों की जेल नियमावलियों की समीक्षा
  • केंद्रीय मॉडल प्रिजन मैनुअल में संशोधन
  • और जेल सुधारों की नई दिशा

तय कर सकते हैं। इसीलिए यह मामला राष्ट्रीय महत्व रखता है।


मानवाधिकार और सुधारात्मक न्याय का सिद्धांत

आधुनिक आपराधिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य—

  • प्रतिशोध नहीं, बल्कि सुधार
  • बहिष्कार नहीं, बल्कि पुनर्वास

है। यदि जेल के भीतर ही भेदभाव जारी रहेगा, तो कैदी समाज में पुनः सम्मानजनक जीवन कैसे जी पाएगा? सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यही मूल प्रश्न है।


निष्कर्ष (Conclusion)

        15 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा मध्य प्रदेश जेल कानून और पुलिस नियमों में कथित भेदभावपूर्ण प्रावधानों को चुनौती देने वाले अंतरिम आवेदन पर विचार करना, भारतीय कारागार सुधार इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

यह कार्यवाही स्पष्ट संकेत देती है कि—

संविधान की पहुंच जेल की दीवारों पर समाप्त नहीं होती।

        यदि यह मामला व्यापक सुधारों की ओर ले जाता है, तो यह न केवल कैदियों के अधिकारों की जीत होगी, बल्कि संवैधानिक नैतिकता और मानव गरिमा की भी विजय होगी।