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“कानून लागू ही नहीं, तो वसूली कैसे?” — नागालैंड में SARFAESI कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट की सख़्त रोक 

“कानून लागू ही नहीं, तो वसूली कैसे?” — नागालैंड में SARFAESI कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट की सख़्त रोक

केंद्रीय कानून के प्रवर्तन के बिना सरफेसी अधिनियम के तहत वसूली अस्वीकार्य: संघीय ढाँचे और संवैधानिक मर्यादा पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय


       भारत के संघीय ढाँचे (Federal Structure), संवैधानिक मर्यादाओं और केंद्रीय कानूनों के क्षेत्रीय प्रवर्तन से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय में Supreme Court ने मंगलवार (16 दिसंबर) को नागालैंड से जुड़े एक मामले में स्पष्ट शब्दों में कहा कि—

जब तक कोई केंद्रीय कानून किसी राज्य में लागू (Operational) नहीं होता, तब तक उसके आधार पर किसी नागरिक या उधारकर्ता के विरुद्ध दमनकारी या वसूली की कार्रवाई नहीं की जा सकती।

     इसी सिद्धांत के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने SARFAESI अधिनियम के तहत नागालैंड में एक उधारकर्ता के विरुद्ध वसूली कार्यवाही शुरू करने की सुरक्षित लेनदार (Secured Creditor) की याचिका को खारिज कर दिया।

         यह निर्णय न केवल बैंकिंग और वित्तीय कानून के क्षेत्र में दूरगामी प्रभाव डालता है, बल्कि यह राज्य की स्वायत्तता, संवैधानिक अनुच्छेद 371A और कानून के शासन (Rule of Law) की पुनः पुष्टि भी करता है।


1. मामला क्या था? — संक्षिप्त पृष्ठभूमि

मामले के तथ्य इस प्रकार थे—

  • एक सुरक्षित लेनदार (बैंक/वित्तीय संस्था) ने
  • नागालैंड राज्य में स्थित एक उधारकर्ता के विरुद्ध
  • SARFAESI अधिनियम, 2002 के अंतर्गत
  • संपत्ति की जब्ती और वसूली की कार्रवाई शुरू करने का प्रयास किया

उधारकर्ता ने इस कार्रवाई को यह कहते हुए चुनौती दी कि—

  • SARFAESI अधिनियम उस समय नागालैंड में प्रभावी रूप से लागू ही नहीं था
  • इसलिए उसके तहत की गई कोई भी वसूली कार्रवाई असंवैधानिक और अवैध है

मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।


2. सुप्रीम कोर्ट का केंद्रीय प्रश्न

अदालत के समक्ष मूल प्रश्न यह था—

क्या किसी राज्य में केंद्रीय कानून के प्रभावी प्रवर्तन के बिना, उसके आधार पर नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित करने वाली कार्रवाई की जा सकती है?

विशेष रूप से—

  • क्या SARFAESI अधिनियम को नागालैंड में
  • बिना विधिवत अधिसूचना/प्रवर्तन
  • लागू माना जा सकता है?

3. सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट उत्तर

सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रश्न का स्पष्ट और दो-टूक उत्तर “नहीं” में दिया।

अदालत ने कहा—

“किसी केंद्रीय अधिनियम के नाम पर की गई वसूली तब तक वैध नहीं हो सकती, जब तक वह अधिनियम संबंधित राज्य में प्रभावी रूप से लागू न हो।”

अदालत ने आगे कहा कि—

  • कानून का अस्तित्व (Existence) और
  • कानून का प्रवर्तन (Enforcement)

दो अलग-अलग बातें हैं।
केवल संसद द्वारा कानून पारित कर दिया जाना पर्याप्त नहीं है।


4. नागालैंड और विशेष संवैधानिक संरक्षण

सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय में विशेष रूप से नागालैंड की संवैधानिक स्थिति पर प्रकाश डाला।

अनुच्छेद 371A का महत्व

नागालैंड को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371A के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त है, जिसके अनुसार—

  • भूमि
  • संसाधन
  • प्रथाएँ
  • और कुछ केंद्रीय कानून

तब तक लागू नहीं होते, जब तक राज्य सरकार की सहमति या विधिवत प्रक्रिया न हो।

अदालत ने कहा कि—

नागालैंड में केंद्रीय कानूनों के यांत्रिक (Mechanical) प्रवर्तन से बचना संविधान की मूल भावना है।


5. SARFAESI अधिनियम: उद्देश्य और सीमाएँ

SARFAESI अधिनियम का उद्देश्य—

  • बैंकों और वित्तीय संस्थानों को
  • बिना लंबी न्यायिक प्रक्रिया के
  • गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) की वसूली की शक्ति देना

है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

यह शक्ति निरंकुश नहीं है और इसे संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही प्रयोग किया जा सकता है।

यदि कानून लागू ही नहीं है, तो उसकी “शक्ति” का प्रश्न ही नहीं उठता।


6. बैंक और वित्तीय संस्थानों को कड़ा संदेश

यह निर्णय बैंकों और सुरक्षित लेनदारों के लिए एक कड़ा चेतावनी संदेश है कि—

  • वे हर राज्य में
  • बिना कानूनी स्थिति की जाँच किए
  • SARFAESI जैसी कठोर कार्रवाई शुरू न करें

अदालत ने संकेत दिया कि—

“वसूली की जल्दबाज़ी संवैधानिक उल्लंघन का कारण बन सकती है।”


7. उधारकर्ता के अधिकार और अनुच्छेद 300A

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि—

  • किसी व्यक्ति की संपत्ति
  • अनुच्छेद 300A के तहत संरक्षित है

और—

कानून के अधिकार के बिना किसी की संपत्ति छीनी नहीं जा सकती।

जब SARFAESI अधिनियम नागालैंड में लागू नहीं था, तो—

  • संपत्ति जब्ती
  • कब्जा
  • या नीलामी

कानून के अधिकार के बिना की गई कार्रवाई मानी जाएगी।


8. संघीय ढाँचे की पुनः पुष्टि

यह निर्णय भारत के संघीय ढाँचे को मज़बूत करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

  • संसद की विधायी शक्ति
  • और राज्यों की स्वायत्तता

के बीच संतुलन आवश्यक है।

केंद्रीय कानूनों को राज्यों पर बलपूर्वक थोपना संघीय भावना के विपरीत है।


9. निचली अदालतों और DRTs के लिए मार्गदर्शन

इस फैसले का प्रभाव—

  • ऋण वसूली अधिकरण (DRT)
  • उच्च न्यायालय
  • और बैंकिंग ट्रिब्यूनल

पर भी पड़ेगा।

अब यह आवश्यक होगा कि—

  • वे यह जाँच करें कि
  • संबंधित कानून उस क्षेत्र में लागू है या नहीं

इसके बिना वसूली आदेश पारित करना कानूनी त्रुटि माना जाएगा।


10. व्यावहारिक प्रभाव: क्या बदलेगा?

इस निर्णय के बाद—

  • नागालैंड और अन्य विशेष राज्यों में
  • SARFAESI के तहत वसूली से पहले
  • विधिक स्थिति की स्पष्टता आवश्यक होगी

बैंक संभवतः—

  • वैकल्पिक कानूनी उपाय
  • दीवानी वाद
  • या राज्य-विशेष कानूनों

का सहारा लेने को विवश होंगे।


11. व्यापक संदेश: कानून पहले, कार्रवाई बाद में

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक व्यापक सिद्धांत स्थापित करता है—

“पहले कानून लागू हो, फिर कार्रवाई।”

कोई भी प्रशासनिक या वित्तीय सुविधा—

  • संवैधानिक प्रक्रिया से ऊपर नहीं हो सकती।

12. निष्कर्ष: संवैधानिक मर्यादा की जीत

नागालैंड में SARFAESI कार्रवाई को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि—

  • कानून का शासन
  • संवैधानिक संतुलन
  • और नागरिक अधिकार

किसी भी वित्तीय हित से ऊपर हैं।

यह फैसला—

  • उधारकर्ताओं के अधिकारों की रक्षा करता है
  • राज्यों की स्वायत्तता को सम्मान देता है
  • और बैंकों को संवैधानिक सीमाओं की याद दिलाता है

न्यायालय का संदेश साफ़ है—

जहाँ कानून लागू नहीं, वहाँ कानून के नाम पर कार्रवाई नहीं।

यही एक संवैधानिक, न्यायपूर्ण और संघीय भारत की पहचान है।