IndianLawNotes.com

ऑटिज़्म व बौद्धिक दिव्यांग व्यक्तियों के केयर होम्स में शोषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त — जनहित याचिका पर नोटिस जारी, नियमन की मांग

ऑटिज़्म व बौद्धिक दिव्यांग व्यक्तियों के केयर होम्स में शोषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त — जनहित याचिका पर नोटिस जारी, नियमन की मांग

       भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत संवेदनशील और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण मुद्दे पर संज्ञान लेते हुए उन आवासीय और संस्थागत केयर होम्स (Residential & Institutional Care Homes) से संबंधित जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया है, जहां ऑटिज़्म, विकासात्मक तथा बौद्धिक दिव्यांगता (Developmental & Intellectual Disabilities) से ग्रस्त व्यक्तियों को रखा जाता है। याचिका में इन केयर होम्स में दुर्व्यवहार, उपेक्षा, अमानवीय परिस्थितियों और व्यावसायिक शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए हैं तथा इनके प्रभावी नियमन (Regulation) की मांग की गई है।

         Supreme Court द्वारा इस याचिका पर नोटिस जारी किया जाना इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका अब दिव्यांगजनों के अधिकारों, गरिमा और जीवन की गुणवत्ता से जुड़े मुद्दों को केवल कल्याण का विषय नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों के रूप में देख रही है। यह मामला न केवल कानूनी दृष्टि से, बल्कि नैतिक, सामाजिक और संवैधानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


जनहित याचिका की पृष्ठभूमि

        यह जनहित याचिका सामाजिक कार्यकर्ताओं और अधिकार-आधारित संगठनों द्वारा दायर की गई है, जिनका दावा है कि देश के विभिन्न हिस्सों में संचालित कई निजी और अर्ध-सरकारी केयर होम्स में दिव्यांग व्यक्तियों को मानव गरिमा के विपरीत परिस्थितियों में रखा जा रहा है। याचिका में कहा गया है कि:

  • केयर होम्स में पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ नहीं है
  • शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक शोषण की घटनाएं आम हैं
  • दवाओं का अंधाधुंध और जबरन उपयोग किया जाता है
  • परिवारों से मोटी फीस वसूलकर भी न्यूनतम सुविधाएं नहीं दी जातीं
  • इन संस्थानों पर निगरानी और जवाबदेही की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है

        याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चूंकि ऑटिज़्म और बौद्धिक दिव्यांगता से ग्रस्त व्यक्ति स्वयं अपनी आवाज़ प्रभावी ढंग से नहीं उठा सकते, इसलिए राज्य का यह दायित्व है कि वह उनके संरक्षण के लिए कठोर कानूनी ढांचा विकसित करे।


सुप्रीम कोर्ट का प्रारंभिक रुख

        सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका पर प्रथम दृष्टया गंभीरता दिखाते हुए केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और संबंधित प्राधिकरणों को नोटिस जारी किया है। न्यायालय ने संकेत दिया कि यदि याचिका में लगाए गए आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार — का सीधा उल्लंघन होगा।

         अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दिव्यांग व्यक्ति केवल “देखभाल के पात्र” नहीं हैं, बल्कि वे अधिकारों के धारक नागरिक हैं, जिनके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव या शोषण अस्वीकार्य है।


ऑटिज़्म और बौद्धिक दिव्यांगता: एक संवेदनशील संदर्भ

         ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) और अन्य बौद्धिक व विकासात्मक दिव्यांगताएं ऐसी स्थितियां हैं, जिनमें व्यक्ति को जीवन भर विशेष देखभाल, समझ और सहारे की आवश्यकता होती है। इन व्यक्तियों के लिए:

  • स्थिर और सुरक्षित वातावरण
  • प्रशिक्षित केयरगिवर्स
  • सम्मानजनक व्यवहार
  • परिवार और समाज से जुड़ाव

       अत्यंत आवश्यक होता है। लेकिन जब इन्हें संस्थागत केयर होम्स में रखा जाता है और वहां शोषण या उपेक्षा होती है, तो इसका प्रभाव उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा और स्थायी होता है।


केयर होम्स में शोषण के आरोप

         जनहित याचिका में केयर होम्स के कामकाज को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जैसे:

1. शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न

        कई मामलों में दिव्यांग व्यक्तियों को बांधकर रखने, मारपीट करने, या डराने-धमकाने की शिकायतें सामने आई हैं।

2. चिकित्सकीय लापरवाही

        बिना उचित परामर्श के भारी मात्रा में सिडेटिव दवाएं दी जाती हैं, ताकि मरीज “शांत” रहें, जो उनके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।

3. व्यावसायिक शोषण

         परिवारों से ऊंची फीस वसूल की जाती है, लेकिन भोजन, साफ-सफाई और चिकित्सा सुविधाएं बेहद निम्न स्तर की होती हैं।

4. निगरानी तंत्र का अभाव

कई केयर होम्स बिना पंजीकरण या मानकों के काम कर रहे हैं और उन पर नियमित निरीक्षण नहीं होता।


मौजूदा कानूनी ढांचा और उसकी सीमाएं

भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act) लागू है। यह कानून सम्मान, समानता और समावेशन की बात करता है। इसके अलावा, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 भी कुछ हद तक संरक्षण प्रदान करता है।

लेकिन याचिका में यह तर्क दिया गया है कि:

  • इन कानूनों का जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो रहा
  • केयर होम्स के लिए कोई एकीकृत राष्ट्रीय नियामक ढांचा नहीं है
  • राज्यों में नियमों का अनुपालन असमान है

इसी कारण याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की है।


नियमन की मांग: याचिका में क्या चाहा गया?

जनहित याचिका में अदालत से निम्नलिखित निर्देश देने का अनुरोध किया गया है:

  • सभी केयर होम्स का अनिवार्य पंजीकरण
  • न्यूनतम मानकों (Minimum Standards) का निर्धारण
  • प्रशिक्षित और प्रमाणित स्टाफ की नियुक्ति
  • नियमित निरीक्षण और ऑडिट की व्यवस्था
  • शिकायत निवारण तंत्र और दंडात्मक प्रावधान

       याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जब तक स्पष्ट और कठोर नियम नहीं होंगे, तब तक इन संस्थानों में रहने वाले सबसे कमजोर वर्ग की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।


संवैधानिक और मानवाधिकार दृष्टिकोण

         यह मामला केवल प्रशासनिक या नीतिगत नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकार और संवैधानिक नैतिकता से भी जुड़ा है। अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (सम्मानपूर्वक जीवन) — सभी का सीधा संबंध इस मुद्दे से है।

        सुप्रीम कोर्ट पूर्व में भी यह कह चुका है कि “सम्मान के साथ जीने का अधिकार” केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि गरिमा, सुरक्षा और आत्मसम्मान को भी शामिल करता है।


समाज और सरकार के लिए संदेश

        इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप समाज और सरकार दोनों के लिए एक कड़ा संदेश है कि दिव्यांग व्यक्तियों को अनदेखा और अदृश्य नागरिक नहीं माना जा सकता। राज्य का कर्तव्य है कि वह केवल कानून बनाए नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि वे प्रभावी रूप से लागू हों।

       यह मामला यह भी दर्शाता है कि जनहित याचिकाएं आज भी उन वर्गों की आवाज़ बन सकती हैं, जो स्वयं अपनी पीड़ा व्यक्त करने में सक्षम नहीं हैं।


संभावित प्रभाव और भविष्य की दिशा

       यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में विस्तृत दिशानिर्देश जारी करता है, तो इसके दूरगामी प्रभाव होंगे:

  • केयर होम्स के संचालन में पारदर्शिता आएगी
  • शोषण की घटनाओं पर अंकुश लगेगा
  • परिवारों का विश्वास बढ़ेगा
  • दिव्यांग व्यक्तियों को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन मिलेगा

यह फैसला भविष्य में दिव्यांग अधिकारों से जुड़े मामलों के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।


निष्कर्ष

       ऑटिज़्म और अन्य बौद्धिक व विकासात्मक दिव्यांग व्यक्तियों के केयर होम्स में शोषण और उपेक्षा पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किया जाना भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह मामला यह याद दिलाता है कि किसी समाज की प्रगति का वास्तविक पैमाना यह नहीं कि वह कितनी ऊंची इमारतें बनाता है, बल्कि यह है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है।

       अब यह उम्मीद की जा रही है कि सर्वोच्च न्यायालय इस जनहित याचिका के माध्यम से ऐसा कानूनी और नीतिगत ढांचा विकसित करेगा, जिससे दिव्यांग व्यक्तियों को केवल संरक्षण ही नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और न्याय भी सुनिश्चित हो सके।