एडहॉक जजों पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी स्पष्टता: एकल पीठ या खंडपीठ में बैठ सकते हैं कार्यरत न्यायाधीशों के साथ
भारतीय न्यायपालिका में लंबित मामलों (pendency of cases) की समस्या लंबे समय से एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के रिक्त पद, बढ़ते मुकदमे और न्याय में हो रही देरी को देखते हुए समय-समय पर विभिन्न संवैधानिक और प्रशासनिक उपाय अपनाए गए हैं। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने एडहॉक जजों (Ad hoc Judges) को लेकर एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट व्याख्या प्रस्तुत की है, जिसने न्यायिक प्रशासन से जुड़े कई भ्रमों को दूर कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि एडहॉक जज न केवल एकल पीठ (Single Bench) में बैठ सकते हैं, बल्कि वे उच्च न्यायालय के कार्यरत (Sitting) न्यायाधीशों के साथ मिलकर खंडपीठ (Division Bench) में भी न्यायिक कार्य कर सकते हैं। यह स्पष्टता भारतीय न्यायिक प्रणाली के लिए दूरगामी प्रभाव रखने वाली है।
एडहॉक जज कौन होते हैं?
एडहॉक जज वे न्यायाधीश होते हैं जिन्हें अस्थायी रूप से नियुक्त किया जाता है, सामान्यतः—
- सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीश
- या कभी-कभी सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश
संविधान के अनुच्छेद 224A के तहत, राष्ट्रपति की स्वीकृति से किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को उच्च न्यायालय में एडहॉक जज के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य—
- लंबित मामलों को तेजी से निपटाना
- न्यायालयों पर बढ़ते बोझ को कम करना
- न्याय में देरी को रोकना
है।
भ्रम की स्थिति क्यों बनी थी?
व्यवहार में एक बड़ा सवाल यह था कि—
- क्या एडहॉक जज केवल अलग-अलग बेंच में बैठ सकते हैं?
- क्या वे कार्यरत न्यायाधीशों के साथ मिलकर खंडपीठ बना सकते हैं?
- क्या वे संवैधानिक और महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई कर सकते हैं?
इन प्रश्नों पर विभिन्न उच्च न्यायालयों और बार में अलग-अलग व्याख्याएं प्रचलित थीं। कहीं यह माना जा रहा था कि एडहॉक जजों की भूमिका सीमित है, तो कहीं उन्हें केवल पुराने मामलों तक सीमित समझा जा रहा था।
सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने इस भ्रम को समाप्त करते हुए कहा कि—
- एडहॉक जज पूर्ण न्यायिक अधिकारों के साथ नियुक्त किए जाते हैं
- उनकी नियुक्ति किसी प्रतीकात्मक या सीमित भूमिका के लिए नहीं होती
- वे उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की तरह ही न्यायिक कार्य कर सकते हैं
अदालत ने स्पष्ट किया कि—
“एडहॉक जज एकल पीठ में भी बैठ सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर वे कार्यरत न्यायाधीशों के साथ खंडपीठ का भी हिस्सा बन सकते हैं।”
एकल पीठ (Single Bench) में भूमिका
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार—
- एडहॉक जज स्वतंत्र रूप से एकल पीठ में मामलों की सुनवाई कर सकते हैं
- वे सिविल, क्रिमिनल, रिट और अपील जैसे मामलों में आदेश पारित कर सकते हैं
- उनके द्वारा दिए गए निर्णयों की वैधानिक स्थिति किसी भी अन्य न्यायाधीश के निर्णय के समान होगी
इसका अर्थ यह है कि एडहॉक जज केवल “सहायक” नहीं बल्कि पूर्ण न्यायाधीश की भूमिका में होते हैं।
खंडपीठ (Division Bench) में भूमिका
सबसे महत्वपूर्ण स्पष्टता यह रही कि—
- एडहॉक जज कार्यरत (sitting) न्यायाधीशों के साथ मिलकर खंडपीठ बना सकते हैं
- दो या अधिक जजों की पीठ में उनकी भागीदारी पूरी तरह वैध है
- वे संवैधानिक, अपील और महत्वपूर्ण विधिक प्रश्नों वाले मामलों की सुनवाई कर सकते हैं
इससे यह स्पष्ट हो गया कि एडहॉक जजों को किसी “द्वितीय श्रेणी” के न्यायाधीश के रूप में नहीं देखा जा सकता।
लंबित मामलों पर प्रभाव
यह निर्णय ऐसे समय आया है जब—
- कई उच्च न्यायालयों में 30% से अधिक पद रिक्त हैं
- लाखों मामले वर्षों से लंबित हैं
- आम नागरिक को समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा
एडहॉक जजों को पूर्ण पीठीय भूमिका देने से—
- बेंचों की संख्या बढ़ेगी
- मामलों की सुनवाई तेज होगी
- पुराने और लंबे समय से लंबित मामलों का निपटारा संभव होगा
संविधान और न्यायिक संतुलन
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि—
- अनुच्छेद 224A का उद्देश्य केवल अस्थायी भरपाई नहीं
- बल्कि न्यायिक प्रणाली को प्रभावी बनाना है
यदि एडहॉक जजों को सीमित अधिकार दिए जाएं, तो संविधान निर्माताओं और विधायिका की मंशा ही विफल हो जाएगी।
बार और वकीलों के लिए महत्व
इस स्पष्टता का असर केवल न्यायाधीशों तक सीमित नहीं है, बल्कि—
- वकीलों
- वादकारियों
- और पूरी न्यायिक प्रक्रिया
पर भी पड़ेगा।
अब—
- एडहॉक जज द्वारा सुने गए मामलों की वैधता पर प्रश्न नहीं उठेगा
- खंडपीठ की संरचना को लेकर अनावश्यक आपत्तियां नहीं होंगी
- मुकदमों में तकनीकी बाधाएं कम होंगी
न्यायिक स्वतंत्रता और विश्वसनीयता
कुछ आलोचनाएं यह भी उठती रही हैं कि—
- एडहॉक जज सेवानिवृत्त होते हैं
- उनकी स्वतंत्रता या निष्पक्षता पर प्रश्न हो सकता है
इस पर सुप्रीम कोर्ट का रुख स्पष्ट रहा कि—
- सेवानिवृत्त न्यायाधीश भी उतने ही सक्षम और निष्पक्ष होते हैं
- उनकी नियुक्ति संवैधानिक प्रक्रिया से होती है
- और उन्हें पूर्ण न्यायिक गरिमा प्राप्त होती है
भविष्य की दिशा
यह फैसला आने वाले समय में—
- उच्च न्यायालयों को एडहॉक जजों की नियुक्ति के लिए प्रोत्साहित करेगा
- न्यायिक रिक्तियों के बावजूद कामकाज को सुचारु बनाएगा
- और न्याय तक पहुंच (Access to Justice) को मजबूत करेगा
साथ ही, यह निर्णय न्यायिक प्रशासन को अधिक लचीला और व्यावहारिक बनाता है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट की यह स्पष्टता कि एडहॉक जज एकल पीठ में भी बैठ सकते हैं और कार्यरत न्यायाधीशों के साथ खंडपीठ में भी, भारतीय न्यायपालिका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह फैसला—
- न्याय में देरी की समस्या से निपटने में सहायक होगा
- एडहॉक जजों की भूमिका को सम्मान और स्पष्टता देगा
- और संविधान के अनुच्छेद 224A की वास्तविक भावना को साकार करेगा
कुल मिलाकर, यह निर्णय यह दर्शाता है कि भारतीय न्यायपालिका न केवल संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा करती है, बल्कि व्यावहारिक चुनौतियों का समाधान निकालने में भी सक्षम और संवेदनशील है।