एचआईवी की स्थिति के आधार पर स्थायीता से इनकार असंवैधानिक — बॉम्बे हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, समानता और गरिमा की निर्णायक जीत
बंबई उच्च न्यायालय ने श्रम अधिकारों, मानव गरिमा और समानता के संवैधानिक सिद्धांतों को सुदृढ़ करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील निर्णय दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी श्रमिक को केवल इस आधार पर स्थायी नियुक्ति (Regularisation / Permanency) से वंचित करना कि वह एचआईवी पॉजिटिव है, न केवल मनमाना और भेदभावपूर्ण है, बल्कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का प्रत्यक्ष उल्लंघन भी है।
यह फैसला एचआईवी/एड्स से पीड़ित व्यक्तियों के अधिकारों, कार्यस्थल पर समान अवसर, और राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारियों के संदर्भ में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। जस्टिस संदीप वी. मार्ने द्वारा दिया गया यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि बीमारी के नाम पर किसी व्यक्ति की आजीविका और सम्मान से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि: वर्षों की सेवा, फिर भी अस्थायी दर्जा
इस मामले में याचिकाकर्ता एक स्वीपर (Safai Karmachari) था, जो एक सरकारी/अर्ध-सरकारी संस्थान में लंबे समय से निरंतर सेवा दे रहा था। उसने वर्षों तक नियमित रूप से अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया, बिना किसी शिकायत या सेवा दोष के।
हालाँकि, जब स्थायी नियुक्ति (permanency) का प्रश्न आया, तो नियोक्ता संस्था ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि—
- याचिकाकर्ता एचआईवी पॉजिटिव है
- भविष्य में उसकी स्वास्थ्य स्थिति कार्य में बाधा बन सकती है
- इसलिए उसे स्थायी कर्मचारी नहीं बनाया जा सकता
याचिकाकर्ता ने इस निर्णय को मनमाना, अन्यायपूर्ण और भेदभावपूर्ण बताते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
मुख्य कानूनी प्रश्न
इस मामले में न्यायालय के समक्ष कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न थे:
- क्या केवल एचआईवी पॉजिटिव होना किसी व्यक्ति को स्थायी नियुक्ति से वंचित करने का वैध आधार हो सकता है?
- क्या ऐसा इनकार संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) का उल्लंघन है?
- क्या यह व्यवहार एचआईवी और एड्स (निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 2017 के अंतर्गत निषिद्ध भेदभाव की श्रेणी में आता है?
बॉम्बे हाईकोर्ट का स्पष्ट और कठोर दृष्टिकोण
जस्टिस संदीप वी. मार्ने ने अपने निर्णय में कहा कि—
“केवल एचआईवी पॉजिटिव होने के आधार पर किसी कर्मचारी को स्थायीता से वंचित करना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह अमानवीय और कानून द्वारा निषिद्ध भेदभाव भी है।”
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि एचआईवी की स्थिति स्वयं में किसी व्यक्ति की कार्यक्षमता या दक्षता को स्वतः प्रभावित नहीं करती, विशेष रूप से तब, जब—
- कर्मचारी वर्षों से कार्यरत है
- उसके कार्य निष्पादन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है
- कोई चिकित्सकीय प्रमाण यह नहीं दर्शाता कि वह अपने कर्तव्यों को निभाने में असमर्थ है
स्वीपर के कर्तव्यों और एचआईवी: कोई संबंध नहीं
न्यायालय ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि—
- याचिकाकर्ता का कार्य स्वीपर का था
- एचआईवी का उसके दैनिक कर्तव्यों से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है
- नियोक्ता यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि एचआईवी के कारण उसके कार्य में कोई जोखिम या बाधा उत्पन्न हुई है
अदालत ने कहा कि काल्पनिक आशंकाओं और सामाजिक पूर्वाग्रहों के आधार पर किसी व्यक्ति के अधिकारों को छीना नहीं जा सकता।
अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन
बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना कि यह मामला संविधान के दो मूल स्तंभों के उल्लंघन का स्पष्ट उदाहरण है:
अनुच्छेद 14 — समानता का अधिकार
अनुच्छेद 14 राज्य को मनमाने और भेदभावपूर्ण व्यवहार से रोकता है। अदालत ने कहा कि—
- समान परिस्थितियों में कार्यरत अन्य कर्मचारियों को स्थायीता दी गई
- केवल एचआईवी की स्थिति के आधार पर याचिकाकर्ता को अलग व्यवहार दिया गया
यह असंगत वर्गीकरण (Unreasonable Classification) है, जिसका कोई तर्कसंगत आधार नहीं है।
अनुच्छेद 16 — सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर
यदि कोई व्यक्ति—
- योग्यता रखता है
- कार्य करने में सक्षम है
- और सेवा की शर्तें पूरी करता है
तो केवल बीमारी के नाम पर उसे अवसर से वंचित करना संवैधानिक अपराध है।
एचआईवी और एड्स अधिनियम, 2017 का उल्लंघन
न्यायालय ने इस फैसले को एचआईवी और एड्स (निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 2017 के आलोक में भी परखा।
इस अधिनियम के अनुसार—
- एचआईवी की स्थिति के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव निषिद्ध है
- रोजगार, नियुक्ति, पदोन्नति और सेवा शर्तों में समानता अनिवार्य है
- शत्रुतापूर्ण भेदभाव (Hostile Discrimination) कानूनन अपराध है
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि याचिकाकर्ता के साथ किया गया व्यवहार शत्रुतापूर्ण भेदभाव के बराबर है, जिसे कानून स्पष्ट रूप से मना करता है।
स्थायीता का आदेश और सीमित मौद्रिक लाभ
अदालत ने न केवल नियोक्ता के निर्णय को रद्द किया, बल्कि याचिकाकर्ता को स्थायी कर्मचारी का दर्जा भी प्रदान किया।
स्थायीता की तिथि
कोर्ट ने निर्देश दिया कि—
- याचिकाकर्ता को 1 दिसंबर 2006 से स्थायी माना जाए
हालाँकि, लंबे अंतराल को देखते हुए अदालत ने सीमित मौद्रिक लाभ (Limited Monetary Benefits) देने का आदेश दिया, ताकि—
- प्रशासनिक बोझ नियंत्रित रहे
- लेकिन याचिकाकर्ता के अधिकार भी सुरक्षित रहें
बकाया भुगतान और ब्याज का निर्देश
न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए कि—
- सभी बकाया लाभों का भुगतान तीन महीने के भीतर किया जाए
- यदि तय समय में भुगतान नहीं किया गया, तो
- बकाया राशि पर 8% वार्षिक ब्याज देना होगा
यह निर्देश यह दर्शाता है कि अदालत इस प्रकार के भेदभाव को गंभीरता से लेती है और अनुपालन सुनिश्चित करना चाहती है।
समाज और कार्यस्थल के लिए व्यापक संदेश
यह फैसला केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं है। इसके व्यापक सामाजिक और कानूनी प्रभाव हैं:
- एचआईवी से जुड़े कलंक (Stigma) के विरुद्ध सशक्त संदेश
- कार्यस्थल पर समानता और गरिमा की पुनः पुष्टि
- राज्य और नियोक्ताओं को चेतावनी कि पूर्वाग्रह कानून से ऊपर नहीं
- मानवाधिकार और श्रम अधिकारों का समन्वय
न्यायिक संवेदनशीलता और मानव गरिमा
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह निर्णय यह याद दिलाता है कि—
- कानून केवल नियमों का संग्रह नहीं
- बल्कि मानवीय गरिमा की रक्षा का साधन है
एचआईवी जैसी बीमारी को नैतिक दोष के रूप में देखना न केवल वैज्ञानिक रूप से गलत है, बल्कि कानूनी और संवैधानिक रूप से भी अस्वीकार्य है।
निष्कर्ष: समानता केवल सिद्धांत नहीं, व्यवहार भी
यह फैसला स्पष्ट करता है कि—
- बीमारी किसी व्यक्ति की योग्यता को स्वतः समाप्त नहीं करती
- एचआईवी पॉजिटिव होना अपराध या अयोग्यता नहीं है
- राज्य का कर्तव्य है कि वह सबसे कमजोर वर्ग की रक्षा करे
बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह स्थापित कर दिया है कि समानता केवल कागज़ पर नहीं, बल्कि व्यवहार में भी दिखनी चाहिए। यह निर्णय आने वाले समय में एचआईवी से पीड़ित कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा में एक मजबूत नजीर बनेगा।