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एक ही घटना पर दूसरी निजी शिकायत अस्वीकार्य: नकारात्मक रिपोर्ट स्वीकार होने के बाद दोबारा शिकायत नहीं चल सकती — सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय

एक ही घटना पर दूसरी निजी शिकायत अस्वीकार्य: नकारात्मक रिपोर्ट स्वीकार होने के बाद दोबारा शिकायत नहीं चल सकती — सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय

Rani Mol & Ors. v. State of Kerala & Anr., Criminal Appeal No. 4931/2025


भूमिका

        भारतीय दंड प्रक्रिया में “शिकायत” (Complaint), “पुलिस जांच” (Investigation) और “रिपोर्ट को स्वीकार करना” (Acceptance of Final Report) — ये सभी चरण आपराधिक न्याय प्रणाली के मूल स्तंभ हैं। अक्सर ऐसा होता है कि शिकायतकर्ता किसी घटना के संबंध में शिकायत दर्ज कराता है, पुलिस जांच करती है, और तथ्यों व साक्ष्यों के आधार पर वह नकारात्मक रिपोर्ट (Closure Report) प्रस्तुत कर देती है।
ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि —
यदि नकारात्मक रिपोर्ट न्यायालय स्वीकार कर ले, तो क्या उसी शिकायतकर्ता को उसी घटना पर दूसरी निजी शिकायत दायर करने का अधिकार है?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा है कि —

       एक ही घटना पर दूसरी निजी शिकायत उसी शिकायतकर्ता द्वारा दायर नहीं की जा सकती, यदि पहले की शिकायत पर पुलिस जांच पूरी हो चुकी है और उसकी नकारात्मक रिपोर्ट कोर्ट द्वारा स्वीकार कर ली गई है।

यह फैसला आपराधिक प्रक्रिया में finality of investigation और abuse of process of law को रोकने का एक प्रासंगिक उदाहरण है।


मामले की पृष्ठभूमि

Case Title: Rani Mol & Ors. v. The State of Kerala & Anr.
Case No.: Criminal Appeal No. 4931/2025
Court: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया
Bench: (विवरण आदेशानुसार)

      मामला केरल राज्य से संबंधित है, जहाँ शिकायतकर्ता ने एक विशेष घटना के संबंध में पुलिस के समक्ष शिकायत दायर की। पुलिस ने विस्तृत जांच कर नकारात्मक रिपोर्ट (Negative Final Report) फाइल कर दी।
नकारात्मक रिपोर्ट में कहा गया कि:

  • कोई आपराधिक मामला बनता नहीं है
  • पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले
  • आरोप संदेह से परे साबित नहीं होते

न्यायिक मजिस्ट्रेट ने नकारात्मक रिपोर्ट को स्वीकार (Accept) कर लिया।

इसी बीच शिकायतकर्ता ने बिना इस आदेश को चुनौती दिए, पुनः दूसरी निजी शिकायत प्रस्तुत कर दी — उसी घटना, वही तथ्य, वही आरोपी और वही आरोप।

मजिस्ट्रेट ने दूसरी शिकायत पर संज्ञान लेकर कार्यवाही प्रारंभ कर दी।
इसके खिलाफ आरोपीगण ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, परंतु राहत नहीं मिली।
अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।


मुख्य मुद्दा (Key Issue Before the Supreme Court)

क्या एक ही घटना पर दूसरी निजी शिकायत उसी शिकायतकर्ता द्वारा दायर की जा सकती है, जबकि पहली शिकायत पर पुलिस ने नकारात्मक रिपोर्ट जमा कर दी हो और उसे मजिस्ट्रेट स्वीकार कर चुका हो?


सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और कानूनी विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी विवाद को सुलझाते हुए स्पष्ट और निर्णायक व्याख्या प्रस्तुत की।

1. पहली शिकायत पर जांच पूरी हो चुकी थी – इसलिए दोबारा शिकायत दायर करना दुरुपयोग

कोर्ट ने कहा कि:

  • पहली शिकायत पर पुलिस ने विस्तृत जांच (detailed investigation) की थी।
  • अंतिम रिपोर्ट में सभी पहलुओं की जांच कर निष्कर्ष दे दिया गया था।
  • शिकायतकर्ता ने मजिस्ट्रेट द्वारा रिपोर्ट स्वीकार करने के आदेश को कहीं चुनौती नहीं दी

इस परिस्थिति में,
➡ दूसरी निजी शिकायत दायर करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Process of Court) माना जाएगा।


2. CrPC की स्कीम “एक बार जांच पूरी होने” को अंतिमता देती है

कोर्ट ने कहा कि CrPC का ढांचा इस बात की अनुमति नहीं देता कि:

  • एक ही व्यक्ति
  • एक ही घटना
  • एक ही आरोपी
    के विरुद्ध
    बार-बार शिकायतें दर्ज करता रहे, जब तक कि वह मनचाही प्रक्रिया या परिणाम न प्राप्त कर ले।

यह कानूनी प्रणाली को अस्थिर और अनिश्चित बना देगा।


3. दूसरी शिकायत केवल तभी Maintainable — जब पहली शिकायत में “घोर कमी” हो

सुप्रीम कोर्ट ने पुराने निर्णयों का उल्लेख करते हुए दोहराया कि:

दूसरी शिकायत तभी चल सकती है जब:

  • पहली शिकायत को अदालत ने बिना मेरिट देखे खारिज किया हो,
  • या वह प्रारंभिक तकनीकी आधार पर खारिज हुई हो,
  • या जांच बिल्कुल अपर्याप्त रही हो।

परन्तु वर्तमान मामले में:

  • जांच विस्तृत थी,
  • रिपोर्ट reasoned थी,
  • मजिस्ट्रेट ने पूरी सोच-विचार के बाद उसे स्वीकार किया था।

इसलिए दूसरी शिकायत मान्य नहीं है।


4. शिकायतकर्ता का उपाय (Remedy) — दूसरी शिकायत नहीं, बल्कि आदेश को चुनौती करना

कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया:

  • यदि शिकायतकर्ता पुलिस रिपोर्ट से असहमत था,
  • या उसे लगता था कि जांच ठीक से नहीं हुई,
    तो उसे चाहिए था कि:

मजिस्ट्रेट के रिपोर्ट स्वीकार करने के आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती देता
— न कि दोबारा शिकायत दायर करता।

इस सिद्धांत से न्यायिक प्रक्रिया में Consistency और Certainty बनाए रखना आवश्यक है।


5. दूसरी शिकायत मजिस्ट्रेट द्वारा entertain करना — “ज्यूरिस्डिक्शनल एरर”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

➡ मजिस्ट्रेट को दूसरी शिकायत पर संज्ञान लेने का अधिकार (jurisdiction) ही नहीं था।
इसलिए मजिस्ट्रेट का आदेश और आगे की कार्यवाही पूर्णतः अवैध (void) है।


संबंधित न्यायिक सिद्धांत (Jurisprudence)

सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय देते समय कई स्थापित सिद्धांतों पर भरोसा किया:

(i) Finality of Investigation

एक बार जांच पूरी होकर अदालत द्वारा रिपोर्ट स्वीकार हो जाए, तो प्रक्रिया को अंतिमता मिल जाती है।

(ii) Double Jeopardy-like Protection

हालाँकि CrPC में शिकायतों पर डबल जियोपर्डी सीधा लागू नहीं होता, लेकिन सिद्धांततः व्यक्ति को बार-बार परेशान करना प्रतिबंधित है।

(iii) Abuse of Process

एक ही घटना पर दूसरी शिकायत दाखिल करना न्यायालय के समय और संसाधन का दुरुपयोग है।

(iv) Prohibition on Multiple Complaints

एक ही घटना पर एक ही शिकायतकर्ता की कई शिकायतें न्यायिक अनुशासन के विरुद्ध हैं।


सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निम्न आदेश दिए—

  1. शिकायतकर्ता द्वारा दायर दूसरी निजी शिकायत अवैध और अस्वीकार्य है।
  2. मजिस्ट्रेट द्वारा दूसरी शिकायत पर संज्ञान लेने का आदेश रद्द किया जाता है।
  3. उच्च न्यायालय का आदेश भी निरस्त।
  4. आरोपीगण को बड़ी राहत प्रदान की गई।

निर्णय के अनुसार:
➡ दूसरी निजी शिकायत Maintainable नहीं है जब पहली जांच की रिपोर्ट स्वीकार की जा चुकी हो।


निर्णय का व्यापक प्रभाव (Wider Legal Impact)

यह फैसला भारतीय आपराधिक विधि में कई महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर करता है:

1. न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग रोकने में महत्वपूर्ण

यदि बार-बार शिकायतें चलेंगी, तो आरोपी को अनिश्चित काल तक मुकदमों का सामना करना पड़ेगा।
इस निर्णय ने इस स्थिति पर सख्त रोक लगाई है।

2. पुलिस जांच को महत्व देने पर जोर

पुलिस की विस्तृत जांच को अदालत द्वारा स्वीकार किया जाना अंतिम माना गया है।

3. शिकायतकर्ता की रणनीति का स्पष्ट मार्ग

यदि रिपोर्ट गलत लगे, तो उपाय:

  • प्रोटेस्ट पिटीशन
  • आदेश को चैलेंज करना
  • आगे की जांच की मांग

परन्तु दूसरी शिकायत नहीं।

4. अदालतों के लिए दिशा-निर्देश

मजिस्ट्रेट अब बिना गहन परीक्षण के दूसरी शिकायत पर संज्ञान नहीं ले सकेंगे।


कानूनी समुदाय में इस फैसले की प्रासंगिकता

यह निर्णय विशेष रूप से उन मामलों में मार्गदर्शक सिद्ध होगा, जहाँ:

  • पारिवारिक विवादों में बार-बार शिकायतें दी जाती हैं
  • भूमि विवादों में कई शिकायतें दायर की जाती हैं
  • व्यावसायिक दुश्मनी में पुनः-पुनः FIR/शिकायत दी जाती है

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि:

➡ न्याय प्रणाली को अनिश्चितता और अव्यवस्था से बचाने के लिए एक ही घटना पर बार-बार शिकायतें रोकनी होंगी


निष्कर्ष

Rani Mol & Ors. v. State of Kerala & Anr. में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आपराधिक न्यायशास्त्र के मूल सिद्धांत — finality of proceedings — को मजबूती देता है।
न्यायालय ने कहा कि:

  • एक बार पुलिस जांच पूरी होकर रिपोर्ट स्वीकार हो जाए
  • और शिकायतकर्ता उसे चुनौती न दे
  • तो दोबारा निजी शिकायत दायर करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है

यह फैसला न्यायिक अनुशासन, स्थिरता और निष्पक्षता को मजबूत करता है।
साथ ही यह संदेश भी देता है कि आपराधिक कानून को मनमर्जी या प्रतिशोध के साधन के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता।