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आवारा कुत्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट में नई बहस: ‘आख़िरी रक्षा रेखा’ के रूप में अनाथ बच्चों और कुत्तों के सरक्षण पर तीखे तर्क

आवारा कुत्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट में नई बहस: ‘आख़िरी रक्षा रेखा’ के रूप में अनाथ बच्चों और कुत्तों के सरक्षण पर तीखे तर्क

         भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) में आवारा कुत्तों (Stray Dogs) से जुड़े अहम मामले पर सुनवाई जारी है, जिसमें आज एक अंतरवादी (intervenor) ने यह अनूठा तर्क प्रस्तुत किया कि आश्रयहीन और अनाथ बच्चों के लिए आवारा कुत्ते सड़कों पर उनकी “आख़िरी रक्षा रेखा” हैं, और इसलिए इन्हें हटाया नहीं जाना चाहिए; कुत्तों के आश्रयों के बजाय सरकार को पहले इन बच्चों के लिए आश्रय व्यवस्था बनानी चाहिए। यह दलील विवाद को नई दिशा दे रही है और अदालत में दोनों पक्षों के बीच गहन बहस का विषय बनी हुई है।

       यह मामला काफी संवेदनशील है क्योंकि इसमें लोकल पब्लिक सेफ़्टी, पशु अधिकारों और बच्चों के अधिकारों के बीच संतुलन बैठाने की चुनौती है। तीन न्यायाधीशों की पीठ, जिसमे जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया शामिल हैं, ने इस पर सुनवाई की और अगली सुनवाई 20 जनवरी 2026 को तय की।


मुकदमे का संक्षिप्त परिचय

        आवारा कुत्तों के विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने गत वर्ष स्वयं संज्ञान (suo motu) लेते हुए सुनवाई शुरू की थी, जब मीडिया रिपोर्ट्स में यह बताया गया कि कुत्तों के काटने और रेबीज़ जैसे गंभीर मामलों से खासकर बच्चों को खतरा बढ़ रहा है। कोर्ट ने कई बिंदुओं पर दिशा‑निर्देश दिए हैं और राज्य निकायों व अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे ABC (Animal Birth Control) नियमों के तहत आवारा कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण और प्रबंधन सुनिश्चित करें।

        लेकिन पिछले आदेशों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया जोर पब्लिक सेफ़्टी और स्वास्थ्य जोखिमों के मद्देनज़र कई अटकलों का विषय रहा है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि आवारा कुत्तों को स्कूलों, अस्पतालों और रेलवे स्टेशनों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों से हटाना चाहिए ताकि कुत्तों के हमले और डॉग बाइट के मामले रोके जा सकें।


आज की सुनवाई में अनूठा तर्क: आवारा कुत्ते अनाथ बच्चों के संरक्षक?

       आज की सुनवाई में पवानी शुक्ला नामक एक वकील ने अदालत के सामने दयालुता और मानव‑कुत्ता संबंध को एक नई संवेदना के साथ पेश किया। उन्होंने तर्क दिया कि:

आश्रयहीन और अनाथ बच्चों के लिए आवारा कुत्ते व्यवहार में उनकी “आख़िरी रक्षा रेखा” हैं, क्योंकि ये कुत्ते सड़कों पर बच्चों के आसपास रहते हैं और खतरे या हमलों के समय अलार्म या चेतावनी का काम करते हैं;
अगर कुत्तों को हटाया जाता है या उन्हें कैद करके आश्रयों में रखा जाता है, तो ये बच्चे फिर से पूरी तरह से असुरक्षित रह जाएंगे, क्योंकि उनके पास कोई संरक्षा नहीं बचती;
इसलिए, कुत्तों के लिए आश्रय बनवाने से पहले इन बच्चों के लिए आश्रय और संरक्षा पर निवेश करना प्राथमिकता होनी चाहिए.

        उन्होंने यह भी दावा किया कि सरकारों को 20,000 करोड़ रुपये तक आवारा कुत्तों के लिए आश्रयों पर खर्च करने की बजाय इन बच्चों के लिए संसाधन जुटाने चाहिए। उनके मुताबिक यदि कुत्तों को गायब कर दिया जाए, तो ये बच्चे “दूसरी बार परित्यक्त” हो जाएंगे.


सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया

       इस तर्क पर न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने उत्तर दिया कि यह बहस बहुत ही अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत की गई है। उन्होंने कहा:
“क्या आप सच में यह बोल रहे हैं?”
उन्होंने सवाल उठाया कि आज तक कई वकील आवारा कुत्तों और उनके अधिकारों के लिए बहस कर रहे हैं, लेकिन मानव सुरक्षा और बच्चों की स्थिति पर कोई संवेदनशील दलील प्रस्तुत नहीं की गई थी — यह एक नई और महत्वपूर्ण बात है।

        न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि यदि वास्तव में बच्चों के लिए बेहतर उपाय किए जाते हैं तो यह समाज का प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए, और यह भी पूछा कि क्यों कोई इस दिशा में कानूनी दलील प्रस्तुत नहीं कर रहा।


इन दलीलों के व्यापक सामाजिक‑कानूनी आयाम

1. मानव सुरक्षा बनाम पशु अधिकार

       सुप्रीम कोर्ट के सामने यह गहरा प्रश्न है कि क्या आवारा कुत्तों को इनकी स्वतंत्रता से वंचित करके शेल्टर्स में रखने का आदेश देना सामाजिक उत्तरदायित्व पूरा करता है या यह पशु अधिकारों और जानवरों की आज़ादी का उल्लंघन है। कई पशु‑हितैषियों ने कहा है कि कुत्तों को हटाना उनकी वास्तविक सुरक्षा और जीवनशैली के खिलाफ होगा, जबकि दूसरी ओर सार्वजनिक सेफ़्टी का मामला भी उतना ही गंभीर है।


2. ABC नियमों का कार्यान्वयन

      ABC Rules, 2023 के तहत, आवारा कुत्तों को पकड़ा जाता है, नसबंदी और टीकाकरण किया जाता है, और फिर उन्हें उसी इलाके में वापस छोड़ा जाता है। अधिकतर NGOs और पशु अधिकार संगठनों ने इसका पालन करने की अपील की है, क्योंकि इससे कुत्तों के प्रति क्रूरता नहीं होती और वे अपने प्राकृतिक वातावरण में रहते हैं।


3. सरकार की जवाबदेही और भारी मुआवजा

      सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि हर डॉग बाइट, हर मृत्यु के मामले में यदि पर्याप्त प्रबंध नहीं किए जाते हैं तो राज्यों पर भारी मुआवजा लगाया जा सकता है और जिन लोगों द्वारा कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों पर खिलाया जा रहा है, उन्हें भी जवाबदेही तय की जा सकती है।


4. बच्चों एवं संवेदनशील समूहों की सुरक्षा

      आज के बहस के दौरान अदालत ने विशेष रूप से कहा कि संवेदनशील क्षेत्रों — जैसे स्कूल, हॉस्पिटल, बस डिपो, रेलवे स्टेशन — में आवारा कुत्तों का अधिकार नहीं बनता कि वहां वे स्वतंत्र घूमें, क्योंकि इससे बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा खतरे में होती है.

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल पशु कल्याण को प्राथमिकता देना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि मनुष्य की सुरक्षा, खासकर बच्चों की, सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए.


प्रमुख वकीलों, पक्षकारों और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ

✔ एक वकील ने सुझाव दिया कि इंडिए कुत्तों के गोद लेने को बढ़ावा देने के लिए नीति बनाई जाए और तकनीक जैसे डॉग ट्रैकिंग, ABC सुव्यवस्था, डेंसिटी मैपिंग उपयोग की जाए ताकि नियंत्रणयुक्त प्रबंधन किया जा सके।

डॉग “अम्मा” के पक्ष में दलील दी गई कि बड़े पैमाने पर पारिवारिक एवं वृद्ध पशु‑प्रेमी समाज भी कुत्तों का ध्यान रख रहे हैं और ऐसा कोई ढांचा लागू किया जाना चाहिए जिससे उनका सहयोग लिया जा सके।

✔ न्यायालय ने कहा कि कुछ वकील मानव हित के पक्ष में भी बात कर रहे हैं, और उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्यों दुनिया की अपेक्षा बच्चों के लिए व्यापक दलील नहीं पेश की जा रही।


कानूनी समाधान और आगे की सुनवाई

अब अगली सुनवाई 20 जनवरी 2026 को होगी, जहां सुप्रीम कोर्ट इस बहस को आगे बढ़ाएगी और संभवतः मानव सुरक्षा बनाम पशु कल्याण के बीच संतुलन तलाशेगी। कोर्ट यह देखेगी कि क्या आवारा कुत्तों को पूरी तरह से हटाने या उन्हें नियंत्रित तरीके से प्रबंधित करने के लिए उपाय किए जाएं, और किन संवेदनशील समूहों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.


निष्कर्ष: संवेदनशील मुद्दे पर व्यापक बहस

      आवारा कुत्तों का विवाद सिर्फ एक प्रशासनिक मामला नहीं है — यह मानव सुरक्षा, पशु अधिकार, सार्वजनिक नीति, सामाजिक मूल्यों और संवेदनशीलता का संघर्ष है। आज की बहस में आश्रयहीन बच्चों की दलील ने इस मुद्दे को एक नया अर्थ दिया है और यह स्पष्ट किया है कि किसी भी नीति या न्यायिक आदेश में मानव जीवन और मानव सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए निर्णय लिया जाना चाहिए।

      सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस बहस का संतुलित निर्णय निकालना न केवल कानूनी प्रासंगिकता रखता है, बल्कि समाज की नैतिक दिशा, न्याय और सार्वजनिक सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण प्रतीक होगा।