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“आजीवन कारावास का वास्तविक अर्थ: पूरी ज़िंदगी जेल, पर रिमिशन का अधिकार राज्य का — सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक और सिद्धांतगत स्पष्टीकरण”

“आजीवन कारावास का वास्तविक अर्थ: पूरी ज़िंदगी जेल, पर रिमिशन का अधिकार राज्य का — सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक और सिद्धांतगत स्पष्टीकरण”

भूमिका

     भारतीय दंड न्याय प्रणाली में “आजीवन कारावास” (Life Imprisonment) एक ऐसी सजा है, जिसे लेकर लंबे समय से समाज, अभियुक्तों, पीड़ितों और यहां तक कि निचली अदालतों में भी भ्रम बना रहा है। क्या आजीवन कारावास का मतलब 14 वर्ष की सजा है? क्या अदालतें यह तय कर सकती हैं कि दोषी को कभी रिहा नहीं किया जाएगा? क्या रिमिशन (Remission) और सजा में कमी का अधिकार न्यायालय के पास है या राज्य सरकार के पास?

     इन सभी प्रश्नों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर अत्यंत स्पष्ट, संवैधानिक और नीतिगत व्याख्या करते हुए कहा है कि—

“जब किसी आरोपी को आजीवन कारावास की सजा दी जाती है, तो इसका अर्थ उसकी प्राकृतिक जीवन-पर्यंत जेल में रहना होता है। हालांकि, सजा में कमी या रिमिशन देने का अधिकार राज्य सरकार के पास है, जिसे सेशन कोर्ट सीमित नहीं कर सकती।”

     यह फैसला न केवल आपराधिक न्यायशास्त्र को स्पष्ट करता है, बल्कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संवैधानिक संतुलन (Separation of Powers) को भी मजबूती देता है।


आजीवन कारावास: कानूनी अर्थ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय दंड संहिता (IPC) — अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) — में आजीवन कारावास को सबसे कठोर सजाओं में से एक माना गया है, मृत्यु-दंड के बाद।

कानूनी स्थिति

  • आजीवन कारावास = दोषी की पूरी प्राकृतिक आयु तक जेल
  • यह स्वतः 14 या 20 वर्ष की सजा नहीं है
  • समयपूर्व रिहाई केवल रिमिशन या क्षमादान से ही संभव है

सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में यह दोहराया है कि—

“Life imprisonment means imprisonment for the remainder of the convict’s natural life.”


14 साल की सजा का भ्रम कहां से आया?

यह भ्रम मुख्यतः दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 433-A से उत्पन्न हुआ, जिसमें कहा गया है कि—

  • जिन मामलों में मृत्यु-दंड को आजीवन कारावास में बदला गया है, या
  • जिन अपराधों में मृत्यु-दंड का प्रावधान है,

वहां दोषी को कम से कम 14 वर्ष की वास्तविक कैद भुगतनी होगी, उसके बाद ही रिमिशन पर विचार किया जा सकता है।

 लेकिन इसका यह अर्थ कभी नहीं रहा कि आजीवन कारावास = 14 वर्ष।


सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा स्पष्ट रुख

सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि—

  1. आजीवन कारावास पूरी ज़िंदगी के लिए होता है
  2. सेशन कोर्ट यह नहीं तय कर सकती कि रिमिशन का अधिकार समाप्त हो जाएगा
  3. रिमिशन और सजा में कमी देना कार्यपालिका (राज्य सरकार) का विशेषाधिकार है
  4. न्यायालय केवल सजा सुना सकता है, रिहाई नीति नहीं बना सकता

यह टिप्पणी विशेष रूप से उन मामलों में आई है, जहां निचली अदालतें यह लिख देती थीं कि—

“दोषी को आजीवन कारावास की सजा दी जाती है और वह किसी भी रिमिशन का हकदार नहीं होगा।”


सेशन कोर्ट की सीमाएं: न्यायिक अतिक्रमण नहीं चलेगा

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि—

  • सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट
    • दोषसिद्धि कर सकती है
    • उचित सजा सुना सकती है
  • लेकिन वह
    • राज्य सरकार के रिमिशन अधिकार को समाप्त या सीमित नहीं कर सकती

यह संविधान के अनुच्छेद 161 (राज्यपाल की क्षमादान शक्ति) और अनुच्छेद 72 (राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति) के विरुद्ध होगा।


रिमिशन क्या है और किसके पास अधिकार है?

रिमिशन (Remission) का अर्थ

रिमिशन का मतलब सजा को पूरी तरह खत्म करना नहीं, बल्कि—

  • सजा की अवधि कम करना
  • अच्छे आचरण, सुधार, उम्र, स्वास्थ्य, या सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर राहत देना

अधिकार किसके पास?

  • राज्य सरकार — जेल नियमों और नीति के अनुसार
  • राज्यपाल — संविधान अनुच्छेद 161
  • राष्ट्रपति — अनुच्छेद 72 (विशेष मामलों में)

 अदालतें इन शक्तियों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं।


सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख पुराने निर्णय

1. Gopal Vinayak Godse v. State of Maharashtra (1961)

  • आजीवन कारावास = पूरी ज़िंदगी

2. Swamy Shraddananda (2) v. State of Karnataka (2008)

  • कोर्ट “विशेष श्रेणी” में यह कह सकती है कि दोषी को न्यूनतम X वर्षों तक रिहा न किया जाए
  • लेकिन पूर्ण रिमिशन निषेध नहीं कर सकती

3. Union of India v. V. Sriharan (2016)

  • न्यायालय सीमित अवधि तक रिहाई पर रोक लगा सकती है
  • लेकिन राज्य की संवैधानिक शक्तियां बनी रहेंगी

पीड़ित अधिकार बनाम दोषी के सुधार का सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि—

  • पीड़ित और समाज के अधिकार उतने ही महत्वपूर्ण हैं
  • लेकिन दंड का उद्देश्य केवल प्रतिशोध नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास भी है

रिमिशन प्रणाली इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए है।


क्या आजीवन कारावास मृत्यु-दंड का विकल्प है?

हां, कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि—

  • मृत्यु-दंड “दुर्लभ से दुर्लभतम” मामलों में ही दिया जाए
  • आजीवन कारावास एक प्रभावी, कठोर लेकिन मानवीय विकल्प है

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दोषी स्वतः कुछ वर्षों में छूट जाएगा।


समाज के लिए इस फैसले का महत्व

1. भ्रम दूर हुआ

अब यह स्पष्ट है कि—

  • आजीवन कारावास कोई “14 साल की सजा” नहीं

2. न्यायिक अनुशासन मजबूत

  • निचली अदालतें अब कार्यपालिका के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं कर सकेंगी

3. संवैधानिक संतुलन

  • न्यायपालिका, कार्यपालिका और संविधान के बीच संतुलन कायम

आलोचनाएं और बहस

कुछ लोगों का तर्क है कि—

  • गंभीर अपराधों में रिमिशन नहीं मिलनी चाहिए

वहीं दूसरा पक्ष कहता है कि—

  • हर व्यक्ति सुधार का अवसर पाने का हकदार है

सुप्रीम कोर्ट का रुख संतुलित है—

रिमिशन स्वतः नहीं, विवेकाधीन है; अधिकार राज्य का है, अनिवार्यता नहीं।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में स्पष्टता, अनुशासन और संवैधानिक मूल्यों को मजबूती देता है।

आजीवन कारावास का मतलब पूरी ज़िंदगी जेल है।
रिमिशन देना या न देना राज्य सरकार का अधिकार है।
सेशन कोर्ट इस अधिकार को खत्म नहीं कर सकती।

यह निर्णय न केवल कानून के छात्रों और अधिवक्ताओं के लिए मार्गदर्शक है, बल्कि आम नागरिक के लिए भी यह समझने का अवसर है कि न्याय, दंड और सुधार के बीच संतुलन कैसे काम करता है।