IndianLawNotes.com

अस्थायी आय, आत्मनिर्भरता और भरण–पोषण का अधिकार: धारा 125 दंप्रसं, धारा 20 HAMA और धारा 144 BNSS के संदर्भ में केरल उच्च न्यायालय का विस्तृत विश्लेषण

अस्थायी आय, आत्मनिर्भरता और भरण–पोषण का अधिकार: धारा 125 दंप्रसं, धारा 20 HAMA और धारा 144 BNSS के संदर्भ में केरल उच्च न्यायालय का विस्तृत विश्लेषण

भूमिका

      भारतीय पारिवारिक कानून में भरण–पोषण (Maintenance) का उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता प्रदान करना नहीं, बल्कि परित्यक्त पत्नी और बच्चों को सम्मानजनक जीवन स्तर सुनिश्चित करना है। दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 तथा हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण–पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20 लंबे समय से इस उद्देश्य की पूर्ति करती आ रही हैं। अब नए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 144 के तहत भी भरण–पोषण से संबंधित सिद्धांतों को नया वैधानिक आधार प्राप्त हुआ है।

      इसी पृष्ठभूमि में, एर्नाकुलम स्थित केरल उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें यह प्रश्न उठाया गया कि क्या अस्थायी या सीमित आय अर्जित करने वाली पत्नी स्वतः भरण–पोषण की हकदार बन जाती है या नहीं। यह निर्णय केवल तथ्यों तक सीमित न रहकर, भरण–पोषण कानून की सामाजिक, संवैधानिक और न्यायिक व्याख्या का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।


मामले की पृष्ठभूमि

        यह विवाद थलास्सेरी स्थित परिवार न्यायालय में दायर एम.सी. संख्या 45/2017 से उत्पन्न हुआ। याचिकाकर्ता पत्नी जीशा पी. और उनके दो नाबालिग बच्चे — रंतिन पी. और डीजो राज — ने पति राजीव एम. से मासिक भरण–पोषण की मांग की थी।

  • पत्नी ने अपने लिए ₹15,000 प्रति माह
  • प्रत्येक बच्चे के लिए ₹10,000 प्रति माह

भरण–पोषण की मांग की।

       परिवार न्यायालय ने साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद पत्नी का दावा पूरी तरह खारिज कर दिया, जबकि दोनों बच्चों को ₹6,000 प्रति माह प्रति बच्चा भरण–पोषण देने का आदेश पारित किया।


पुनरीक्षण याचिकाएँ

परिवार न्यायालय के इस आदेश के विरुद्ध दोनों पक्षों ने केरल उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण याचिकाएँ दायर कीं—

  1. आरपीएफसी संख्या 409/2017 – पत्नी द्वारा,
    • अपने भरण–पोषण की अस्वीकृति को चुनौती
    • बच्चों के लिए तय राशि बढ़ाने की मांग
  2. आरपीएफसी संख्या 476/2017 – पति द्वारा,
    • बच्चों के लिए ₹6,000 प्रति माह प्रति बच्चा को अत्यधिक बताते हुए चुनौती

दोनों याचिकाओं की संयुक्त सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति डॉ. कौसर एडप्पागथ द्वारा की गई।


पत्नी की ओर से दलीलें

पत्नी के अधिवक्ता ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि—

  • पत्नी के पास कोई स्थायी रोजगार नहीं है।
  • दर्जी के रूप में कार्य करना कभी–कभार और अनिश्चित है।
  • अस्थायी आय को आत्मनिर्भरता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
  • दंप्रसं की धारा 125 का उद्देश्य महिलाओं और बच्चों को दरिद्रता और परित्याग से बचाना है।

उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि केवल आय अर्जित करने की क्षमता या थोड़ी बहुत आय पत्नी को भरण–पोषण से वंचित करने का आधार नहीं हो सकती।


पति की ओर से दलीलें

पति के वकील ने प्रतिवाद में कहा कि—

  • विवाह प्रमाण पत्र में पत्नी का व्यवसाय दर्जी दर्ज है।
  • वह दर्जी संघ की सदस्य भी रही है।
  • अतः यह मानना गलत है कि वह पूर्णतः निर्भर है।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण–पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20(3) का हवाला देते हुए कहा कि बच्चों के भरण–पोषण की जिम्मेदारी दोनों माता–पिता की संयुक्त होती है, केवल पिता की नहीं।


न्यायालय द्वारा पत्नी के भरण–पोषण पर विचार

केरल उच्च न्यायालय ने सबसे पहले पत्नी के भरण–पोषण के अधिकार पर विचार किया। न्यायालय ने निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया—

  1. क्या पत्नी वास्तव में आय अर्जित कर रही है?
  2. यदि हाँ, तो क्या वह आय उसके जीवन निर्वाह के लिए पर्याप्त है?

न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि—

  • पत्नी दर्जी संघ की सदस्य थी,
  • परंतु नियमित और पर्याप्त आय का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

इसके बावजूद, न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि हर मामले में आय की अपर्याप्तता अपने–आप भरण–पोषण का अधिकार उत्पन्न नहीं करती


सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का संदर्भ

न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया—

  • रजनेश बनाम नेहा (2020)
  • सुनीता कछवाहा बनाम अनिल कछवाहा
  • शैलजा बनाम खोब्बन्ना

इन निर्णयों में यह सिद्धांत स्थापित किया गया है कि—

यदि पत्नी थोड़ी आय अर्जित करती है, किंतु वह उसके निर्वाह के लिए अपर्याप्त है, तो उसे भरण–पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।

परंतु न्यायालय ने यह भी जोड़ा कि—

यह सिद्धांत एक सार्वभौमिक नियम नहीं है; प्रत्येक मामले के तथ्य और परिस्थितियाँ निर्णायक होती हैं।


धारा 144 BNSS के संदर्भ में व्याख्या

यद्यपि यह मामला दंप्रसं की धारा 125 और HAMA की धारा 20 से संबंधित था, फिर भी न्यायालय की reasoning नई धारा 144 BNSS के लिए भी मार्गदर्शक मानी जा सकती है।

धारा 144 BNSS का उद्देश्य भी—

  • पत्नी,
  • बच्चों,
  • और आश्रित माता–पिता

को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है, लेकिन यह स्वतःस्फूर्त अधिकार नहीं है। इसके लिए यह दिखाना आवश्यक है कि—

  • दावा करने वाला व्यक्ति स्वयं का निर्वाह करने में असमर्थ है।

न्यायालय का निष्कर्ष: पत्नी भरण–पोषण की हकदार नहीं

सभी तथ्यों और साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि—

  • पत्नी पूरी तरह निराश्रित नहीं है।
  • वह कुछ न कुछ आय अर्जित करने में सक्षम है।
  • पारिवारिक न्यायालय द्वारा भरण–पोषण से इनकार करना कानूनी त्रुटि नहीं है।

अतः पत्नी की पुनरीक्षण याचिका इस बिंदु पर खारिज कर दी गई।


बच्चों के भरण–पोषण पर न्यायालय की दृष्टि

जहाँ पत्नी के दावे को अस्वीकार किया गया, वहीं बच्चों के अधिकारों पर न्यायालय ने अधिक संवेदनशील और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया।

न्यायालय ने कहा—

  • नाबालिग बच्चों का भरण–पोषण पूर्णतः माता–पिता की संयुक्त जिम्मेदारी है।
  • पिता की आर्थिक स्थिति को देखते हुए ₹6,000 प्रति माह प्रति बच्चा अत्यधिक नहीं है।

अतः पति की पुनरीक्षण याचिका भी इस बिंदु पर अस्वीकृत कर दी गई।


निर्णय का विधिक और सामाजिक महत्व

यह निर्णय कई महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित करता है—

  1. अस्थायी या सीमित आय अपने–आप भरण–पोषण का अधिकार उत्पन्न नहीं करती।
  2. पत्नी की आत्मनिर्भरता का मूल्यांकन वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित होना चाहिए।
  3. बच्चों के भरण–पोषण में न्यायालय हमेशा कल्याणकारी दृष्टिकोण अपनाएगा।
  4. धारा 125 दंप्रसं और धारा 144 BNSS का उद्देश्य सामाजिक न्याय है, न कि दुरुपयोग को बढ़ावा देना।

निष्कर्ष

       केरल उच्च न्यायालय का यह निर्णय भरण–पोषण कानून की संतुलित व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह न तो पत्नी के अधिकारों को यांत्रिक रूप से नकारता है और न ही पति पर अनुचित आर्थिक बोझ डालता है। यह स्पष्ट करता है कि—

भरण–पोषण का अधिकार दया नहीं, बल्कि कानून से नियंत्रित न्याय है।

        धारा 144 BNSS के भविष्य के मामलों में यह निर्णय एक महत्वपूर्ण न्यायिक मार्गदर्शक के रूप में उद्धृत किया जाएगा, विशेष रूप से उन मामलों में जहाँ अस्थायी रोजगार, आंशिक आय और आत्मनिर्भरता के प्रश्न उठते हैं।