अबू सलेम की समयपूर्व रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट की सख़्त पूछ: क्या TADA दोषियों को महाराष्ट्र नियमों के तहत छूट मिल सकती है?
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आज एक बार फिर आतंकवाद, प्रत्यर्पण संधि और दंडात्मक न्याय प्रणाली के बीच संतुलन से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील प्रश्न पर सुनवाई करते हुए आतंकवादी अबू सलेम को निर्देश दिया कि वह महाराष्ट्र राज्य के उन नियमों को रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करे, जिनके आधार पर यह तय किया जा सके कि आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम, 1987 — यानी TADA के तहत दोषी व्यक्ति को समयपूर्व रिहाई (remission / premature release) का लाभ दिया जा सकता है या नहीं।
यह मामला केवल एक आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय दायित्वों, पीड़ितों के अधिकार, और आतंकवाद के विरुद्ध कानूनी नीति से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।
अबू सलेम मामला: एक संक्षिप्त पृष्ठभूमि
अबू सलेम अंसारी, 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामलों और अन्य संगीन अपराधों में दोषी ठहराया गया व्यक्ति है। उसे पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पित किया गया था, लेकिन यह प्रत्यर्पण भारत-पुर्तगाल प्रत्यर्पण संधि की विशिष्ट शर्तों के अधीन हुआ था। इन शर्तों में यह स्पष्ट था कि उसे मृत्यु-दंड या आजीवन कारावास की ऐसी सजा नहीं दी जाएगी जो व्यावहारिक रूप से जीवनभर कारावास के बराबर हो।
इसी आधार पर अबू सलेम ने यह दावा किया है कि उसे संधि के अनुसार समयपूर्व रिहाई का अधिकार प्राप्त है, और उसे अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का मुख्य प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट ने आज की सुनवाई में एक महत्वपूर्ण बिंदु उठाया—
“आप यह बताइए कि महाराष्ट्र राज्य के कौन-से नियम TADA के तहत दोषी व्यक्ति को remission या समयपूर्व रिहाई की अनुमति देते हैं?”
अदालत का यह प्रश्न केवल तकनीकी नहीं है, बल्कि कानूनी दर्शन से जुड़ा हुआ है। क्योंकि TADA जैसे कठोर कानूनों के अंतर्गत दोषसिद्धि को सामान्य अपराधों से अलग दृष्टि से देखा जाता है।
TADA और सामान्य दंड प्रक्रिया में अंतर
TADA को देश में आतंकवाद से निपटने के लिए बनाया गया था। इसके अंतर्गत—
- कठोर साक्ष्य नियम
- विशेष अदालतें
- सीमित अपील अधिकार
- और अधिकतम दंडात्मक प्रविधान
शामिल थे।
यही कारण है कि जब किसी TADA दोषी की समयपूर्व रिहाई की बात आती है, तो सामान्य कैदियों पर लागू नियम स्वतः लागू नहीं माने जा सकते।
समयपूर्व रिहाई (Remission) का कानूनी ढांचा
भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 और 433 राज्य सरकार को यह अधिकार देती हैं कि वे सजा में छूट दे सकें। परंतु यह अधिकार पूर्णतः विवेकाधीन है, स्वतःसिद्ध नहीं।
इसके अतिरिक्त, धारा 433A यह स्पष्ट करती है कि कुछ गंभीर अपराधों में न्यूनतम 14 वर्ष की वास्तविक सजा अनिवार्य है।
अब प्रश्न यह उठता है कि—
- क्या TADA दोषियों पर ये प्रावधान उसी तरह लागू होते हैं?
- क्या महाराष्ट्र के जेल नियमों में TADA दोषियों के लिए कोई विशेष अपवाद या निषेध है?
- क्या प्रत्यर्पण संधि इन घरेलू कानूनों पर प्राथमिकता रखती है?
प्रत्यर्पण संधि बनाम घरेलू कानून
अबू सलेम के वकीलों का तर्क है कि—
भारत सरकार ने जब पुर्तगाल से प्रत्यर्पण की मांग की, तब उसने कुछ विशेष आश्वासन दिए थे। इन आश्वासनों का पालन करना भारत की अंतरराष्ट्रीय बाध्यता है।
वहीं, सरकार का रुख यह रहा है कि—
प्रत्यर्पण संधि भारत को दोषी व्यक्ति को समयपूर्व रिहाई देने के लिए बाध्य नहीं करती, बल्कि केवल यह सुनिश्चित करती है कि उसे अमानवीय या असंगत दंड न दिया जाए।
यही टकराव आज सुप्रीम कोर्ट के समक्ष केंद्रीय मुद्दा बनकर उभरा है।
सुप्रीम कोर्ट की सावधानीपूर्ण दृष्टि
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भावनात्मक या राजनीतिक दृष्टिकोण अपनाने के बजाय पूर्णतः कानूनी संतुलन बनाए रखा है। अदालत यह स्पष्ट करना चाहती है कि—
- क्या अबू सलेम की मांग नियमों पर आधारित है या केवल संधि की व्याख्या पर?
- क्या महाराष्ट्र राज्य के नियम वास्तव में TADA दोषियों को remission की अनुमति देते हैं?
- यदि नहीं, तो क्या संधि के कारण नियमों को दरकिनार किया जा सकता है?
इसीलिए अदालत ने सीधे तौर पर निर्देश दिया कि महाराष्ट्र के प्रासंगिक नियम प्रस्तुत किए जाएं।
पीड़ितों के अधिकार और सामाजिक दृष्टिकोण
इस पूरे विवाद में एक बड़ा पहलू वह भी है जिसे अक्सर कानूनी बहसों में पीछे छोड़ दिया जाता है—पीड़ितों का न्याय।
1993 के मुंबई विस्फोटों में सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवाई, हजारों घायल हुए, और पूरे देश की आत्मा पर एक गहरा आघात पहुंचा।
ऐसे मामलों में समयपूर्व रिहाई की बात समाज में यह प्रश्न खड़ा करती है—
क्या आतंकवादियों के लिए कानून में वही सहानुभूति होनी चाहिए जो सामान्य अपराधियों के लिए होती है?
यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि नीति-निर्धारण से जुड़ा हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय छवि और भारत की जिम्मेदारी
भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है, जो कानून के शासन और मानवाधिकारों में विश्वास रखता है। साथ ही, वह आतंकवाद के विरुद्ध कठोर रुख भी अपनाता है।
अबू सलेम का मामला इन दोनों मूल्यों के बीच संतुलन का प्रतीक बन गया है।
यदि भारत संधि की शर्तों की अवहेलना करता है, तो उसकी अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ सकता है।
यदि भारत अत्यधिक उदारता दिखाता है, तो देश के नागरिकों के मन में न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा हो सकता है।
महाराष्ट्र राज्य नियमों की भूमिका
अब पूरा मामला इस बात पर टिक गया है कि महाराष्ट्र के जेल नियम और remission नीति TADA दोषियों के संबंध में क्या कहती है।
यदि नियम स्पष्ट रूप से रोक लगाते हैं, तो अबू सलेम की याचिका कमजोर पड़ जाती है।
यदि नियम अनुमति देते हैं, तो सरकार को भी उस पर विचार करना पड़ेगा।
यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने तथ्यों और नियमों को पहले सामने लाने पर ज़ोर दिया है, न कि भावनात्मक तर्कों पर।
न्यायालय की संभावित दिशा
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट संभवतः—
- संधि और घरेलू कानून की सामंजस्यपूर्ण व्याख्या करेगा,
- किसी एक को पूरी तरह से दूसरे पर हावी नहीं होने देगा,
- और एक ऐसा रास्ता चुनेगा जो न तो अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का उल्लंघन करे और न ही राष्ट्रीय सुरक्षा की भावना को ठेस पहुँचाए।
निष्कर्ष: कानून, संवेदना और संतुलन की परीक्षा
अबू सलेम की समयपूर्व रिहाई का प्रश्न केवल एक व्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं है। यह प्रश्न है—
- भारत की कानूनी परिपक्वता का,
- उसके अंतरराष्ट्रीय वचनों की विश्वसनीयता का,
- और उसके नागरिकों के प्रति न्याय की प्रतिबद्धता का।
सुप्रीम कोर्ट ने आज यह स्पष्ट कर दिया है कि वह इस मामले में किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पहले नियमों, तथ्यों और कानून की पूरी तस्वीर देखना चाहता है।
अंततः, यह मामला आने वाले समय में भारतीय न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा—जहाँ आतंकवाद, प्रत्यर्पण संधि और मानवाधिकार एक ही मंच पर आमने-सामने खड़े हैं।