अग्रिम जमानत के लिए सत्र न्यायालय को दरकिनार करना: असाधारण परिस्थिति, महिला गरिमा और न्यायिक अनुशासन पर केरल उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय
भूमिका
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) को एक असाधारण राहत के रूप में देखा जाता है, जिसका उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना है, न कि गंभीर अपराधों में आरोपित व्यक्ति को कानून से बच निकलने का अवसर देना। हाल के वर्षों में न्यायालयों ने यह स्पष्ट किया है कि अग्रिम जमानत का प्रयोग अत्यंत सावधानी और न्यायिक अनुशासन के साथ किया जाना चाहिए, विशेषकर जब आरोप महिलाओं के विरुद्ध यौन दुराचार से जुड़े हों।
इसी संदर्भ में केरल उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें एक वकील द्वारा सत्र न्यायालय में अपील किए बिना सीधे उच्च न्यायालय में दायर अग्रिम जमानत याचिका को तथ्यों और आरोपों की गंभीरता के आधार पर खारिज कर दिया गया। यह निर्णय न केवल प्रक्रियात्मक कानून की व्याख्या करता है, बल्कि महिलाओं की गरिमा, न्यायिक अनुशासन और नवगठित आपराधिक कानूनों की मंशा को भी स्पष्ट करता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला पलक्कड़ (केरल) के एक अधिवक्ता से संबंधित है, जिसके विरुद्ध एक महिला वकील द्वारा गंभीर आरोप लगाए गए थे। आरोपों के आधार पर पुलिस ने—
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS)
- धारा 78 – पीछा करना (Stalking)
- धारा 79 – किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले शब्द, हावभाव या कृत्य
- केरल पुलिस अधिनियम, 2011
- धारा 119(क)
- धारा 119(ख)
के अंतर्गत अपराध पंजीकृत किया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार घटनाक्रम
अभियोजन के अनुसार—
- याचिकाकर्ता उसी निजी बस में यात्रा कर रहा था जिसमें शिकायतकर्ता, एक महिला वकील, सवार थी
- उसने बिना सहमति महिला की तस्वीरें लेने का प्रयास किया
- आपत्ति जताने पर उसने कथित रूप से यौन संबंधी आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं
- यह आचरण महिला की गरिमा और सम्मान के प्रतिकूल था
इन तथ्यों के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई।
सीधे उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत याचिका
सामान्यतः अग्रिम जमानत के लिए पहले सत्र न्यायालय का दरवाजा खटखटाना न्यायिक व्यवस्था का स्थापित सिद्धांत है। किंतु इस मामले में याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया कि—
- शिकायतकर्ता उसी बार एसोसिएशन की वकील है
- पेशेवर दबाव के कारण सत्र न्यायालय में कोई भी वकील उसका प्रतिनिधित्व करने को तैयार नहीं
- यह एक असाधारण परिस्थिति है, जो सीधे उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप को उचित ठहराती है
इसी आधार पर याचिका सीधे केरल उच्च न्यायालय में दायर की गई।
पीठ और न्यायिक दृष्टिकोण
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति के. बाबू द्वारा की गई। न्यायालय ने दो प्रमुख प्रश्नों पर विचार किया—
- क्या सत्र न्यायालय को दरकिनार करना न्यायसंगत है?
- क्या आरोपों की प्रकृति अग्रिम जमानत जैसी राहत देने योग्य है?
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का संदर्भ
न्यायमूर्ति के. बाबू ने Supreme Court के हालिया निर्णय मोहम्मद रसाल सी बनाम केरल राज्य (2025) का उल्लेख किया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि—
- उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय का क्षेत्राधिकार समवर्ती है
- फिर भी, न्यायिक अनुशासन के अनुसार याचिकाकर्ता को पहले सत्र न्यायालय जाना चाहिए
- केवल दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों में ही इस क्रम से विचलन किया जा सकता है
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सीधे उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल करना एक सामान्य प्रथा नहीं बननी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद केरल उच्च न्यायालय का रुख
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी के बाद, केरल उच्च न्यायालय ने अपने दृष्टिकोण में संयम अपनाया है। सामान्यतः—
- पहले सत्र न्यायालय जाने पर जोर
- असाधारण परिस्थितियों की कड़ी जांच
- केवल प्रक्रियात्मक कठिनाइयों को पर्याप्त आधार नहीं माना जाना
असाधारण परिस्थिति के दावे की जांच
हालांकि न्यायालय ने याचिकाकर्ता के इस तर्क पर विचार किया कि—
- कोई भी वकील उसकी ओर से पेश नहीं होना चाहता
परंतु न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—
- केवल पेशेवर असुविधा या प्रतिनिधित्व में कठिनाई
- अपने आप में अग्रिम जमानत के लिए पर्याप्त आधार नहीं बनती
अदालत ने कहा कि आरोपों की प्रकृति और गंभीरता इस मामले में अधिक महत्वपूर्ण है।
मामले की डायरी और आरोपों की गंभीरता
मामले की केस डायरी का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने पाया कि—
- आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर हैं
- महिला के विरुद्ध यौन संबंधी मांग और टिप्पणियां की गईं
- यह आचरण महिला की गरिमा पर सीधा आघात करता है
अदालत ने माना कि ऐसे अपराध समाज में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान से सीधे जुड़े हैं।
अग्रिम जमानत: असाधारण राहत का सिद्धांत
न्यायालय ने दोहराया कि—
- अग्रिम जमानत कोई सामान्य अधिकार नहीं
- यह एक असाधारण उपाय है
- गंभीर यौन अपराधों में इसका प्रयोग अत्यंत सीमित होना चाहिए
अदालत ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 की भावना महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर सख्त दृष्टिकोण अपनाने की है।
धारा 482 की शक्ति और उसकी सीमाएं
याचिकाकर्ता ने अप्रत्यक्ष रूप से धारा 482 (अंतर्निहित शक्तियां) का सहारा लेने का प्रयास किया। इस पर न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—
- धारा 482 का प्रयोग असाधारण परिस्थितियों में ही
- गंभीर यौन दुराचार के मामलों में इस शक्ति का उपयोग अनुचित
अग्रिम जमानत याचिका की अस्वीकृति
इन सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने कहा—
- आरोप गंभीर और प्रथम दृष्टया प्रमाणित
- महिला के विरुद्ध यौन दुराचार का मामला
- अग्रिम जमानत देने का कोई आधार नहीं
अतः अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई।
अंतिम आदेश
- केस नंबर: जमानत आवेदन संख्या 12074/2025
- पक्षकार: याचिकाकर्ता बनाम केरल राज्य
- निर्णय: अग्रिम जमानत अस्वीकृत
आदेश का कानूनी महत्व
यह निर्णय कई महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित करता है—
- न्यायिक अनुशासन: सत्र न्यायालय को दरकिनार करना अपवाद होना चाहिए
- महिला गरिमा का संरक्षण: गंभीर यौन आरोपों में नरमी नहीं
- अग्रिम जमानत की सीमाएं: असाधारण राहत का सीमित प्रयोग
- नवगठित आपराधिक कानून की मंशा: महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर कठोर दृष्टिकोण
निष्कर्ष
केरल उच्च न्यायालय का यह निर्णय आपराधिक न्याय प्रणाली में संतुलन का उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक हित दोनों को समान रूप से महत्व दिया गया है। यह स्पष्ट संदेश देता है कि—
प्रक्रियात्मक कठिनाइयाँ महिलाओं के विरुद्ध गंभीर अपराधों में अग्रिम जमानत का आधार नहीं बन सकतीं।
यह फैसला अधिवक्ताओं, न्यायिक अधिकारियों और समाज—सभी के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक है और भारतीय आपराधिक कानून के विकास में एक सशक्त कदम के रूप में देखा जाएगा।