UAPA की धारा 43D(5) के अंतर्गत जमानत: व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विधिक प्रतिबंध के बीच संवैधानिक संतुलन — Gulfisha Fatima बनाम राज्य (NCT दिल्ली), 5 जनवरी 2026
प्रस्तावना
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। यह अधिकार केवल शारीरिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि गरिमा, निष्पक्ष प्रक्रिया और न्यायिक संरक्षण का भी आश्वासन देता है। दूसरी ओर, राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े अपराधों के संदर्भ में संसद ने कुछ विशेष कानून बनाए हैं, जिनमें Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967 (UAPA) प्रमुख है।
UAPA की धारा 43D(5) जमानत पर एक कठोर वैधानिक प्रतिबंध लगाती है। यह प्रावधान कहता है कि यदि अदालत को प्रथम दृष्टया यह प्रतीत हो कि अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए आरोप सत्य हैं, तो उसे जमानत नहीं दी जा सकती।
इसी संवैधानिक और विधिक द्वंद्व का गहन परीक्षण Gulfisha Fatima बनाम राज्य (NCT दिल्ली), निर्णय दिनांक 5 जनवरी 2026 में किया गया। यह निर्णय केवल एक अभियुक्त की जमानत तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र में स्वतंत्रता और सुरक्षा के संतुलन पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक घोषणा है।
धारा 43D(5) UAPA का स्वरूप
धारा 43D(5) का मूल उद्देश्य यह है कि आतंकवाद या राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से जुड़े मामलों में सामान्य आपराधिक कानून की उदार जमानत व्यवस्था लागू न हो।
इस धारा के अनुसार:
यदि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत सामग्री से यह प्रतीत होता है कि आरोप प्रथम दृष्टया सत्य हैं, तो अभियुक्त को जमानत नहीं दी जाएगी।
यह प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता की सामान्य जमानत नीति से भिन्न है, जहाँ “बेल नॉट जेल” सिद्धांत लागू होता है।
अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत स्वतंत्रता
अनुच्छेद 21 को भारतीय संविधान की आत्मा कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने Maneka Gandhi v. Union of India से लेकर Arnab Goswami, Sanjay Chandra, और Union of India v. K.A. Najeeb तक निरंतर यह प्रतिपादित किया है कि:
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है,
- विचाराधीन कैद (undertrial incarceration) अपवाद होनी चाहिए,
- और न्यायिक प्रक्रिया को दंड में परिवर्तित नहीं होने दिया जा सकता।
लंबे समय तक बिना दोष सिद्ध हुए जेल में रखना संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध माना गया है।
Gulfisha Fatima मामला: पृष्ठभूमि
Gulfisha Fatima पर दिल्ली दंगों से संबंधित UAPA के अंतर्गत गंभीर आरोप लगाए गए थे। अभियोजन का दावा था कि अभियुक्त ने साजिश में भाग लिया और सार्वजनिक शांति को भंग करने वाली गतिविधियों में संलिप्तता दिखाई।
अभियुक्त लंबे समय से विचाराधीन कैद में थी। इस दौरान अभियोजन की कार्यवाही धीमी रही और आरोप सिद्ध होने की प्रक्रिया अभी प्रारंभिक अवस्था में थी।
इसी संदर्भ में अदालत के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था:
क्या धारा 43D(5) का वैधानिक प्रतिबंध अनुच्छेद 21 के अधिकार को निष्प्रभावी कर सकता है?
न्यायालय का संवैधानिक दृष्टिकोण
निर्णय के अनुच्छेद 428 में न्यायालय ने अत्यंत संतुलित और परिपक्व दृष्टिकोण अपनाया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
- अनुच्छेद 21 का महत्व सर्वोच्च है।
- परंतु संसद द्वारा बनाए गए वैधानिक प्रतिबंध को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
- न्यायालय का कार्य न तो कानून को यांत्रिक रूप से लागू करना है और न ही स्वतंत्रता के नाम पर उसे निष्प्रभावी बनाना है।
- न्यायालय को “disciplined scrutiny” के साथ अभियोजन सामग्री की समीक्षा करनी होगी।
अर्थात, न्यायालय को यह देखना होगा कि अभियोजन की सामग्री वास्तव में प्रथम दृष्टया आरोपों को सत्य सिद्ध करती है या नहीं।
“Prima Facie True” की न्यायिक व्याख्या
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि “prima facie true” का अर्थ यह नहीं है कि:
- अभियोजन का हर कथन स्वीकार कर लिया जाए,
- या अभियुक्त को दोषी मान लिया जाए।
बल्कि इसका अर्थ है कि:
- क्या प्रस्तुत सामग्री कानूनी रूप से विश्वसनीय है,
- क्या वह आरोपों को समर्थन देती है,
- और क्या उसमें गंभीर विरोधाभास या अनुमानात्मक तत्व नहीं हैं।
यदि अभियोजन की कहानी केवल संदेह, अनुमान या अपुष्ट कथनों पर आधारित है, तो उसे “prima facie true” नहीं कहा जा सकता।
लंबी विचाराधीन कैद और संवैधानिक संकट
न्यायालय ने यह भी कहा कि लंबी अवधि तक विचाराधीन कैद:
- न्यायिक प्रक्रिया को दंड में बदल देती है,
- निर्दोषता की धारणा (Presumption of Innocence) को कमजोर करती है,
- और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है।
यह निर्णय K.A. Najeeb के सिद्धांत को आगे बढ़ाता है, जहाँ कहा गया था कि भले ही UAPA लागू हो, फिर भी अत्यधिक देरी होने पर जमानत दी जा सकती है।
न्यायालय का संतुलन सिद्धांत
न्यायालय ने दो चरम सीमाओं को अस्वीकार किया:
- केवल कानून के आधार पर जमानत अस्वीकार करना।
- केवल स्वतंत्रता के आधार पर कानून को दरकिनार करना।
इसके स्थान पर न्यायालय ने कहा:
अनुच्छेद 21 कानून को नष्ट नहीं करता, बल्कि उसे संवैधानिक तरीके से लागू करने का मार्ग दिखाता है।
यह कथन भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र में एक नई व्याख्या प्रस्तुत करता है।
लोकतंत्र और आतंकवाद विरोधी कानून
UAPA जैसे कानून लोकतंत्र के लिए आवश्यक हैं, परंतु उनका दुरुपयोग लोकतंत्र को कमजोर कर सकता है। Gulfisha Fatima निर्णय इस बात को स्वीकार करता है कि:
- राष्ट्र की सुरक्षा आवश्यक है,
- परंतु नागरिक स्वतंत्रता उससे भी अधिक संवेदनशील है।
संतुलन ही लोकतांत्रिक शासन की आत्मा है।
निचली अदालतों के लिए मार्गदर्शन
यह निर्णय विशेष रूप से ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत स्थापित करता है:
- अभियोजन सामग्री का यांत्रिक स्वीकार न करें,
- आरोपों की गंभीरता के साथ-साथ साक्ष्य की गुणवत्ता देखें,
- विचाराधीन कैद की अवधि को महत्व दें,
- और न्यायिक विवेक का प्रयोग करें।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण
कुछ आलोचकों का मानना है कि UAPA जैसे कानूनों में न्यायालयों की भूमिका सीमित हो जाती है। परंतु यह निर्णय दर्शाता है कि:
- न्यायपालिका अब भी संविधान की अंतिम संरक्षक है,
- और वह विधायी कठोरता के भीतर भी मानवाधिकारों की रक्षा कर सकती है।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दृष्टिकोण
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार मानकों के अनुसार:
- विचाराधीन कैद अपवाद होनी चाहिए,
- और प्रत्येक अभियुक्त को शीघ्र न्याय का अधिकार है।
Gulfisha Fatima निर्णय भारतीय न्यायशास्त्र को इन अंतरराष्ट्रीय मूल्यों के निकट लाता है।
भविष्य पर प्रभाव
यह निर्णय आने वाले समय में:
- UAPA मामलों में जमानत याचिकाओं की न्यायिक समीक्षा को अधिक गहन बनाएगा,
- अभियोजन को अधिक जिम्मेदार बनाएगा,
- और नागरिक स्वतंत्रताओं की संवैधानिक सुरक्षा को मजबूत करेगा।
निष्कर्ष
Gulfisha Fatima बनाम राज्य (NCT दिल्ली) का निर्णय यह सिद्ध करता है कि:
- अनुच्छेद 21 भारतीय लोकतंत्र की धुरी है,
- UAPA की धारा 43D(5) एक आवश्यक लेकिन नियंत्रित प्रतिबंध है,
- और न्यायालय का कार्य दोनों के बीच संतुलन बनाना है।
यह फैसला यह संदेश देता है कि:
स्वतंत्रता कोई कृपा नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है; और सुरक्षा कोई बहाना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है।
भारतीय न्यायपालिका ने इस निर्णय के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून और संविधान विरोधी नहीं, बल्कि सहयात्री हैं — बशर्ते उन्हें विवेक, संवेदनशीलता और संवैधानिक चेतना के साथ लागू किया जाए।