SHANTI विधेयक पारित: भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में ऐतिहासिक बदलाव, निजी भागीदारी का रास्ता खुला
भूमिका
भारत की ऊर्जा नीति लंबे समय से एक बुनियादी द्वंद्व से जूझती रही है—एक ओर तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और ऊर्जा की बढ़ती मांग, दूसरी ओर पर्यावरणीय संतुलन, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की चुनौती। इसी पृष्ठभूमि में Parliament of India ने SHANTI विधेयक पारित कर दिया है, जिसे भारत के परमाणु ऊर्जा कानूनों में अब तक का सबसे बड़ा संरचनात्मक सुधार माना जा रहा है।
यह विधेयक दशकों पुराने परमाणु कानूनों को प्रतिस्थापित करता है और पहली बार सीमित रूप में निजी क्षेत्र की भागीदारी को अनुमति देता है। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षा, नियामक निगरानी और परमाणु क्षति के लिए ‘नो-फॉल्ट लाइबिलिटी’ (No-Fault Liability) जैसे मूल सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं किया गया है।
यह कानून न केवल निवेश आकर्षित करने का प्रयास है, बल्कि यह भी एक परीक्षा होगी कि निजी पूंजी, राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच संतुलन कैसे साधा जाता है।
SHANTI विधेयक क्या है?
SHANTI विधेयक (Safe, Holistic And Nationally Integrated Nuclear Transformation Initiative – SHANTI) का उद्देश्य भारत की परमाणु ऊर्जा व्यवस्था को:
- आधुनिक बनाना
- निवेश के अनुकूल बनाना
- वैश्विक तकनीक और पूंजी से जोड़ना
- और फिर भी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना
सरकार के अनुसार, यह विधेयक पुराने कानूनों—जिन्हें एक ऐसे दौर में बनाया गया था जब परमाणु ऊर्जा पूरी तरह राज्य-नियंत्रित मानी जाती थी—को वर्तमान जरूरतों के अनुरूप ढालता है।
अब तक की स्थिति: पूरी तरह सरकारी नियंत्रण
अब तक भारत में:
- परमाणु ऊर्जा क्षेत्र लगभग पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में था
- NPCIL (Nuclear Power Corporation of India Limited) और कुछ सरकारी एजेंसियां ही
- परमाणु संयंत्रों का निर्माण
- संचालन
- और रखरखाव
करती थीं।
निजी कंपनियों की भूमिका:
- केवल उपकरण आपूर्ति
- इंजीनियरिंग सपोर्ट
- या सहायक सेवाओं तक सीमित थी
इस मॉडल ने सुरक्षा तो सुनिश्चित की, लेकिन:
- परियोजनाओं में देरी
- पूंजी की कमी
- और सीमित विस्तार
जैसी समस्याएं बनी रहीं।
SHANTI विधेयक में क्या बदला?
1. निजी भागीदारी की अनुमति (Limited Private Participation)
नए कानून के तहत:
- निजी कंपनियां
- परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं में निवेशक या ऑपरेटर के रूप में भाग ले सकेंगी
- हालांकि यह भागीदारी
- कड़ी शर्तों
- सरकारी निगरानी
- और लाइसेंसिंग प्रक्रिया
के अधीन होगी।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि:
“यह पूर्ण निजीकरण नहीं, बल्कि नियंत्रित और चरणबद्ध भागीदारी है।”
2. सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं
SHANTI विधेयक में दो टूक कहा गया है कि:
- परमाणु सुरक्षा (Nuclear Safety)
- रेडिएशन नियंत्रण
- आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र
पर केंद्र सरकार और नियामक संस्थाओं का पूर्ण नियंत्रण रहेगा।
निजी कंपनियों को:
- अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों
- भारतीय परमाणु नियामक ढांचे
का सख्ती से पालन करना होगा।
3. ‘नो-फॉल्ट लाइबिलिटी’ बरकरार
परमाणु कानून का सबसे संवेदनशील पहलू है—परमाणु दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी।
SHANTI विधेयक में:
- No-Fault Liability का सिद्धांत बरकरार रखा गया है
- यानी पीड़ित को मुआवजा पाने के लिए
- यह साबित नहीं करना होगा कि गलती किसकी थी
राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि:
- पीड़ितों को त्वरित और पर्याप्त मुआवजा मिले
- और उसके बाद जिम्मेदारी का निर्धारण किया जाए।
सरकार का तर्क: बदलाव क्यों जरूरी था?
सरकार ने संसद में विधेयक पेश करते हुए तर्क दिया कि:
- भारत की ऊर्जा मांग 2047 तक कई गुना बढ़ जाएगी
- कोयला आधारित ऊर्जा
- पर्यावरण के लिए हानिकारक
- और दीर्घकाल में अस्थिर
है।
परमाणु ऊर्जा:
- स्वच्छ
- कम कार्बन उत्सर्जन वाली
- और स्थिर ऊर्जा स्रोत
है, लेकिन इसके विस्तार के लिए:
- भारी पूंजी
- उन्नत तकनीक
- और तेज़ क्रियान्वयन
की आवश्यकता है, जो अकेले सरकारी संसाधनों से कठिन है।
निवेश और वैश्विक सहयोग की उम्मीद
SHANTI विधेयक के बाद उम्मीद की जा रही है कि:
- घरेलू निजी कंपनियां
- और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा फर्में
भारत में निवेश के लिए आगे आएंगी।
इससे:
- नई तकनीक आएगी
- परियोजनाओं की लागत कम हो सकती है
- और निर्माण समय घट सकता है
हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि:
- रणनीतिक नियंत्रण
- संवेदनशील तकनीक
पूरी तरह भारतीय संप्रभुता के अधीन रहेगी।
विपक्ष और आलोचकों की चिंताएं
1. सुरक्षा का सवाल
आलोचकों का कहना है कि:
- निजी कंपनियों का मुख्य उद्देश्य मुनाफा होता है
- जबकि परमाणु ऊर्जा में
- सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए
उनका तर्क है कि:
“परमाणु क्षेत्र में एक छोटी चूक भी राष्ट्रीय आपदा बन सकती है।”
2. जवाबदेही और पारदर्शिता
कुछ सांसदों और विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि:
- यदि निजी ऑपरेटर शामिल होंगे
- तो दुर्घटना की स्थिति में
- जवाबदेही तय करना जटिल हो सकता है
हालांकि सरकार का कहना है कि:
- नियामक ढांचा पहले से अधिक सख्त किया गया है।
3. संघीय ढांचे पर प्रभाव
कुछ राज्यों ने यह भी सवाल उठाया कि:
- परमाणु संयंत्रों का स्थान चयन
- भूमि अधिग्रहण
- और पर्यावरणीय मंजूरी
जैसे मुद्दों पर राज्यों की भूमिका कितनी होगी।
कानूनी और संवैधानिक पहलू
SHANTI विधेयक यह स्पष्ट करता है कि:
- परमाणु ऊर्जा अब भी
- केंद्र के विशेष अधिकार क्षेत्र में रहेगी
लेकिन:
- राज्यों के साथ समन्वय
- और स्थानीय समुदायों की सहमति
को प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाएगा।
यह कानून:
- पुराने परमाणु कानूनों को निरस्त/प्रतिस्थापित करता है
- और एक समेकित कानूनी ढांचा प्रदान करता है।
भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती: अमल
कानून बनना एक बात है, उसका सही और सुरक्षित क्रियान्वयन दूसरी।
अब सभी की नजर इस पर है कि:
- नियामक संस्थाएं कितनी स्वतंत्र और सशक्त होंगी
- निजी कंपनियों पर निगरानी कितनी प्रभावी होगी
- दुर्घटना प्रबंधन और मुआवजा तंत्र
- कागज़ों तक सीमित न रह जाए
ऊर्जा नीति में दीर्घकालिक प्रभाव
यदि SHANTI विधेयक का सही क्रियान्वयन हुआ, तो:
- भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता में
- उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है
- 2030 और 2047 के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को
- मजबूती मिलेगी
लेकिन यदि:
- सुरक्षा में ढील
- या जवाबदेही में अस्पष्टता
रही, तो यह कानून विवादों का कारण भी बन सकता है।
निष्कर्ष
SHANTI विधेयक भारत की परमाणु ऊर्जा नीति में एक ऐतिहासिक मोड़ है। यह:
- दशकों पुराने बंद ढांचे को खोलता है
- निजी पूंजी और तकनीक के लिए दरवाजे खोलता है
- लेकिन साथ ही सुरक्षा और राज्य की भूमिका को केंद्र में रखता है
यह कानून इस बात की परीक्षा है कि क्या भारत:
निजी भागीदारी और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन साध सकता है।
आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि SHANTI विधेयक:
- भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर ले जाता है
- या फिर यह केवल एक साहसिक लेकिन जोखिमपूर्ण प्रयोग साबित होता है।
फिलहाल इतना तय है कि भारत का परमाणु ऊर्जा परिदृश्य अब पहले जैसा नहीं रहेगा।