SC/ST एक्ट में ‘पीड़ित की जाति की जानकारी’ अनिवार्य तत्व: SHAIK SHABUDDIN बनाम तेलंगाना राज्य (SC 2025) का ऐतिहासिक निर्णय
भूमिका
भारत में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों को सामाजिक अत्याचारों, अपमान, भेदभाव और हिंसा से संरक्षण देने के उद्देश्य से SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 अधिनियमित किया गया। यह अधिनियम केवल दंडात्मक कानून नहीं है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 17 और 21 में निहित समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय की भावना का व्यावहारिक रूप है।
इस कानून का उद्देश्य उन ऐतिहासिक अत्याचारों को रोकना है जो केवल जाति पहचान के कारण किए जाते रहे हैं। किंतु समय के साथ न्यायालयों ने यह भी महसूस किया कि यदि इस अधिनियम का प्रयोग बिना आवश्यक कानूनी तत्वों के किया जाए, तो यह कानून स्वयं अन्याय का कारण बन सकता है।
इसी संतुलन को स्थापित करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2025 में Shaik Shabuddin v. State of Telangana मामले में यह ऐतिहासिक निर्णय दिया कि:
SC/ST एक्ट के अंतर्गत दोष सिद्ध करने के लिए अभियुक्त को पीड़ित की जाति की जानकारी होना अनिवार्य तत्व है।
यह निर्णय SC/ST कानून की न्यायिक व्याख्या में एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।
केस का संक्षिप्त विवरण
मामला:
Shaik Shabuddin v. State of Telangana
साइटेशन:
SC 2025 (SLP Cri. No. 6850/2024)
कानून:
SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989
मुख्य प्रश्न:
क्या अभियुक्त को पीड़ित की जाति की जानकारी होना आवश्यक है ताकि SC/ST एक्ट के तहत अपराध सिद्ध हो सके?
मामले की पृष्ठभूमि
इस प्रकरण में अभियोजन पक्ष ने यह स्थापित किया कि पीड़िता/मृतका अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित थी। अभियुक्तों पर हत्या/अपराध के आरोप लगाए गए और साथ ही SC/ST एक्ट की धाराएं भी जोड़ दी गईं।
हालांकि अभियोजन यह सिद्ध करने में असफल रहा कि:
- अभियुक्त पीड़िता को पहले से जानते थे
- अभियुक्त को उसकी जाति की जानकारी थी
- अपराध जाति के कारण किया गया
- कोई जातिसूचक शब्द, संकेत या व्यवहार प्रदर्शित किया गया
- कोई पूर्व जाति आधारित विवाद था
इसके बावजूद निचली अदालत ने अभियुक्तों को SC/ST एक्ट के तहत दोषी ठहराया।
इसके विरुद्ध अभियुक्तों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की।
सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
केवल यह सिद्ध कर देना कि पीड़ित SC/ST समुदाय से था, पर्याप्त नहीं है।
अभियोजन को यह भी सिद्ध करना होगा कि अभियुक्त को पीड़ित की जाति की जानकारी थी और अपराध उसी आधार पर किया गया।
न्यायालय ने कहा कि SC/ST एक्ट के अंतर्गत अपराध तभी सिद्ध होगा जब:
- अभियुक्त को पीड़ित की जाति का ज्ञान हो
- अपराध उसी जाति पहचान के कारण किया गया हो
SC/ST एक्ट के अंतर्गत आवश्यक तत्व
न्यायालय ने दो अनिवार्य तत्वों को दोहराया:
(1) Knowledge of Caste
अभियुक्त को पीड़ित की जाति की जानकारी होनी चाहिए।
(2) Caste Based Motive
अपराध का कारण पीड़ित की जाति होना चाहिए।
यदि इनमें से कोई भी तत्व अनुपस्थित है, तो SC/ST एक्ट के तहत दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता।
“ज्ञान (Knowledge)” क्यों आवश्यक है?
न्यायालय ने इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत स्पष्ट शब्दों में दिया:
- SC/ST एक्ट का उद्देश्य जाति-आधारित अत्याचार को दंडित करना है
- यदि अभियुक्त को पीड़ित की जाति की जानकारी ही नहीं है, तो जाति-आधारित अपराध का अस्तित्व नहीं बनता
- अन्यथा प्रत्येक सामान्य अपराध स्वतः SC/ST एक्ट के अंतर्गत आ जाएगा, जो विधायी मंशा के विपरीत होगा
न्यायालय ने कहा कि कानून का उद्देश्य संरक्षण है, न कि स्वचालित दंड।
न्यायालय की कानूनी व्याख्या
न्यायालय ने कहा:
अपराध का “मोटिव” जाति होना चाहिए, केवल पीड़ित की जाति SC/ST होना पर्याप्त नहीं है।
व्यवहारिक स्थिति तालिका
| स्थिति | SC/ST एक्ट लागू |
|---|---|
| पीड़ित SC/ST है, अभियुक्त को जानकारी नहीं | ❌ |
| अभियुक्त जानता है, पर अपराध निजी कारण से | ❌ |
| अभियुक्त जानता है और अपराध जाति कारण से | ✅ |
अभियोजन की विफलता
इस मामले में अभियोजन यह सिद्ध नहीं कर पाया कि:
- अभियुक्त और पीड़िता के बीच कोई पूर्व परिचय था
- अभियुक्त ने जाति से संबंधित कोई टिप्पणी की
- किसी गवाह ने जाति आधारित अपमान सुना
- कोई सामाजिक या जातिगत संघर्ष मौजूद था
इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि SC/ST एक्ट की धाराएं टिकाऊ नहीं हैं और अभियुक्तों को बरी कर दिया।
निर्णय का कानूनी महत्व
यह निर्णय निम्न महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित करता है:
- SC/ST एक्ट स्वतः लागू नहीं होता
- अभियोजन को Mens Rea सिद्ध करना होगा
- जाति आधारित उद्देश्य का ठोस प्रमाण आवश्यक है
- मात्र पीड़ित की जाति पर्याप्त नहीं है
- कानून का प्रयोग विवेकपूर्ण होना चाहिए
पूर्व निर्णयों से सामंजस्य
यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के अनुरूप है:
- Hitesh Verma v. State of Uttarakhand
- Khuman Singh v. State of MP
- Ashrafi v. State of UP
इन सभी मामलों में न्यायालय ने यही सिद्धांत दोहराया कि:
जाति का ज्ञान और जाति आधारित उद्देश्य दोनों अनिवार्य हैं।
सामाजिक संतुलन का दृष्टिकोण
न्यायालय ने संतुलन बनाते हुए कहा कि:
- SC/ST अधिनियम वास्तविक पीड़ितों की ढाल है
- परन्तु निर्दोषों के लिए तलवार नहीं बनना चाहिए
- कानून का प्रयोग न्यायपूर्ण और विवेकपूर्ण होना चाहिए
यह निर्णय सामाजिक न्याय और विधिक निष्पक्षता दोनों को सुरक्षित करता है।
अधिवक्ताओं के लिए उपयोगिता
यह निर्णय विशेष रूप से उपयोगी है:
- जब SC/ST एक्ट गलत रूप से लगाया गया हो
- जब अभियुक्त और पीड़ित अपरिचित हों
- जब कोई जातिसूचक शब्द या संकेत न हो
- जब विवाद निजी कारणों से उत्पन्न हुआ हो
- जब FIR में जाति-ज्ञान का उल्लेख न हो
जांच एजेंसियों के लिए संदेश
अब पुलिस और अभियोजन को यह सुनिश्चित करना होगा कि:
- चार्जशीट में जाति-ज्ञान का उल्लेख हो
- गवाहों से जाति-आधारित तथ्य सिद्ध कराए जाएं
- उद्देश्य स्पष्ट रूप से दर्शाया जाए
- तकनीकी चार्जशीट नहीं बल्कि तथ्यात्मक चार्जशीट बने
न्यायिक प्रणाली के लिए प्रभाव
यह निर्णय:
- SC/ST एक्ट की विश्वसनीयता बढ़ाता है
- कानून के दुरुपयोग को रोकता है
- वास्तविक पीड़ितों की रक्षा करता है
- निर्दोषों के अधिकारों की रक्षा करता है
निष्कर्ष
Shaik Shabuddin v. State of Telangana (2025) का यह निर्णय SC/ST एक्ट के न्यायिक विकास में एक मील का पत्थर है। यह स्पष्ट करता है कि:
SC/ST एक्ट केवल तब लागू होगा जब अपराध जाति-आधारित मानसिकता से किया गया हो और अभियुक्त को पीड़ित की जाति की जानकारी हो।
यह फैसला न केवल विधिक स्पष्टता लाता है, बल्कि सामाजिक न्याय के उद्देश्य को भी सुरक्षित रखता है।