IndianLawNotes.com

POCSO अधिनियम की व्याख्या पर सुप्रीम कोर्ट का अहम हस्तक्षेप: क्या नाबालिग के निजी अंग में उंगली डालना ‘पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ है?

POCSO अधिनियम की व्याख्या पर सुप्रीम कोर्ट का अहम हस्तक्षेप: क्या नाबालिग के निजी अंग में उंगली डालना ‘पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ है?

भूमिका

        भारत में बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों से निपटने के लिए बनाया गया यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 केवल एक दंडात्मक कानून नहीं है, बल्कि यह बाल गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और संवैधानिक नैतिकता का विधिक विस्तार है। हाल के वर्षों में इस अधिनियम की व्याख्या को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रश्न न्यायालयों के समक्ष आए हैं। ऐसा ही एक गंभीर और संवेदनशील प्रश्न अब Supreme Court of India के विचाराधीन है—

क्या किसी नाबालिग लड़की के निजी अंग में उंगली डालना, POCSO अधिनियम की धारा 3(बी) के अंतर्गत ‘पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ माना जाएगा?


मामले की पृष्ठभूमि

       यह विवाद केरल से उत्पन्न हुआ, जहाँ एक 70 वर्षीय आरोपी को नाबालिग लड़की के साथ यौन कृत्य का दोषी ठहराया गया था। पीड़िता की गवाही के अनुसार, आरोपी ने उसके प्राइवेट पार्ट में उंगली डाली थी

  • ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को POCSO अधिनियम की धारा 3(बी) (पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट) के तहत दोषी माना।
  • परंतु केरल हाईकोर्ट ने इस दोषसिद्धि को परिवर्तित करते हुए इसे धारा 8 (यौन उत्पीड़न / Sexual Assault) के अंतर्गत मान लिया, जिससे दंड की गंभीरता कम हो गई।

इसी निर्णय को चुनौती देते हुए विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की गई, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है।


सुप्रीम कोर्ट की पीठ और प्रारंभिक दृष्टि

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति अभय एस. ओका की पीठ कर रही है। पीठ ने प्रारंभिक तौर पर यह माना कि मामला कानून की व्याख्या से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है, जिसका प्रभाव देशभर में POCSO मामलों की दिशा तय कर सकता है।

नोटिस जारी करना अपने आप में संकेत है कि सर्वोच्च न्यायालय इस प्रश्न को केवल तथ्यात्मक विवाद नहीं, बल्कि कानून के सिद्धांतात्मक स्पष्टीकरण के रूप में देख रहा है।


POCSO अधिनियम की संरचना और उद्देश्य

POCSO अधिनियम, 2012 का मूल उद्देश्य है:

  • बच्चों को यौन शोषण, उत्पीड़न और अश्लीलता से बचाना
  • अपराध की परिभाषा को विस्तृत और स्पष्ट बनाना
  • पीड़ित–केंद्रित (Victim-Centric) न्याय सुनिश्चित करना

यह अधिनियम इस मान्यता पर आधारित है कि बच्चा सहमति देने में सक्षम नहीं होता, इसलिए किसी भी प्रकार का यौन स्पर्श या कृत्य, जो उसकी शारीरिक अखंडता का उल्लंघन करता हो, अपराध है।


धारा 3(बी): ‘पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ का दायरा

POCSO की धारा 3(बी) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति—

  • अपने शरीर का कोई भी अंग (यहाँ तक कि उंगली)
  • बच्चे की योनि, गुदा या मूत्रमार्ग में प्रवेश (penetration) कराता है,

तो वह पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट का अपराध करता है।

यहाँ महत्वपूर्ण शब्द है—“penetration, to any extent”
कानून स्पष्ट करता है कि पूर्ण प्रवेश आवश्यक नहीं है; आंशिक प्रवेश भी पर्याप्त है


केरल हाईकोर्ट का दृष्टिकोण

केरल हाईकोर्ट ने यह माना कि:

  • उंगली डालने का कृत्य गंभीर अवश्य है,
  • परंतु इसे ‘पेनेट्रेटिव’ मानना आवश्यक नहीं,
  • इसलिए इसे धारा 8 (Sexual Assault) के अंतर्गत रखा गया।

इस व्याख्या से दंड की प्रकृति बदल जाती है—

  • धारा 3/4 के तहत कठोर कारावास (अधिक वर्षों तक)
  • धारा 8 के तहत कम अवधि का दंड

यही वह बिंदु है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा।


कानूनी प्रश्न: क्या उंगली डालना ‘पेनेट्रेशन’ है?

यह प्रश्न केवल शब्दों का नहीं, बल्कि बाल संरक्षण की नीति का है।

  • यदि उंगली डालना ‘पेनेट्रेशन’ नहीं माना गया,
  • तो कई गंभीर यौन कृत्य कम गंभीर धाराओं में चले जाएंगे,
  • जिससे POCSO का निवारक (deterrent) प्रभाव कमजोर पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट पूर्व में भी यह कह चुका है कि

कानून की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जिससे अपराधी बच न सके और पीड़ित की गरिमा सुरक्षित रहे।


पूर्व न्यायिक दृष्टांत (Judicial Precedents)

भारतीय न्यायपालिका ने पहले भी संकेत दिए हैं कि:

  • POCSO की धाराओं की व्याख्या संकीर्ण (narrow) नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण (purposive) होनी चाहिए।
  • बच्चे के शरीर में किसी भी प्रकार का जबरन प्रवेश, उसकी गरिमा का गंभीर उल्लंघन है।

कुछ निर्णयों में यह भी कहा गया है कि

“उंगली या किसी वस्तु का प्रवेश, चाहे क्षणिक हो, पेनेट्रेशन ही है।”


पीड़िता की गवाही का महत्व

इस मामले में पीड़िता की गवाही स्पष्ट है।

  • उसने साफ कहा कि आरोपी ने उसके निजी अंग में उंगली डाली।
  • POCSO के अंतर्गत, यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय है, तो उसे विशेष महत्व दिया जाता है।

यह कानून बच्चों को बार–बार मानसिक आघात से बचाने के लिए बनाया गया है, ताकि उनसे अनावश्यक कठोर जिरह न हो।


उम्र और सहानुभूति बनाम अपराध की गंभीरता

यह तथ्य कि आरोपी 70 वर्ष का है, कानूनी दृष्टि से अपराध की प्रकृति को कम नहीं करता।

  • POCSO में आयु कोई बचाव (defence) नहीं है।
  • सहानुभूति दंड निर्धारण में सीमित भूमिका निभा सकती है,
  • परंतु अपराध की श्रेणी बदलने का आधार नहीं बन सकती।

संवैधानिक परिप्रेक्ष्य

यह मामला अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) से भी जुड़ा है।

  • बच्चे का सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार
  • उसका शारीरिक और मानसिक संरक्षण

यदि कानून की व्याख्या पीड़ित–विरोधी हुई, तो यह संविधान की भावना के विपरीत होगा।


सुप्रीम कोर्ट के संभावित निष्कर्ष और प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय:

  • पूरे देश में POCSO मामलों की दिशा तय करेगा
  • निचली अदालतों और हाईकोर्ट्स के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन देगा
  • यह तय करेगा कि पेनेट्रेशन की कानूनी सीमा कहाँ तक है

यदि सर्वोच्च न्यायालय यह स्पष्ट करता है कि उंगली डालना भी धारा 3(बी) के अंतर्गत आता है, तो यह

बाल यौन अपराधों के विरुद्ध कानून का सख़्त और स्पष्ट संदेश होगा।


निष्कर्ष

यह मामला केवल एक आरोपी या एक पीड़िता तक सीमित नहीं है। यह प्रश्न है—

  • क्या हम बच्चों के शरीर और गरिमा की रक्षा के लिए कानून को पूरी शक्ति से लागू करेंगे?
  • या फिर तकनीकी व्याख्याओं से अपराध की गंभीरता को कम होने देंगे?

सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप बताता है कि बाल अधिकारों पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। आने वाला निर्णय न केवल POCSO अधिनियम की व्याख्या को स्पष्ट करेगा, बल्कि समाज को यह भी याद दिलाएगा कि

बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों में ‘कम गंभीर’ जैसा कोई विकल्प नहीं होता।