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“POCSO कानून, न्यायिक देरी और आजीविका के अधिकार को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट का विवादित फैसला”

“POCSO कानून, न्यायिक देरी और आजीविका के अधिकार को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट का विवादित फैसला” Allahabad High Court’s Controversial Order on POCSO, Judicial Delay and Right to Livelihood

       हाल के दिनों में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा पारित एक आदेश ने देशभर में गहरी बहस और असहज सवालों को जन्म दिया है। यह आदेश केवल एक आपराधिक अपील तक सीमित नहीं है, बल्कि यह POCSO Act, न्यायिक देरी (Judicial Delay), दोषसिद्ध अभियुक्त को जमानत, और सबसे अधिक विवादास्पद रूप से “Right to Livelihood” (आजीविका का अधिकार) जैसे संवैधानिक और नैतिक मुद्दों को केंद्र में ले आता है।

       यह फैसला उस बिंदु को उजागर करता है जहाँ कानून की तकनीकी प्रक्रिया, संवैधानिक अधिकारों की व्याख्या, और समाज की नैतिक अपेक्षाएँ आपस में टकरा जाती हैं। प्रश्न यह नहीं है कि अदालत के पास ऐसा आदेश पारित करने की शक्ति थी या नहीं, बल्कि असली प्रश्न यह है कि क्या ऐसे मामलों में शक्ति का प्रयोग न्याय के व्यापक उद्देश्यों के अनुरूप हुआ?


 मामला संक्षेप में | Case at a Glance

मामले का नाम: Pravesh Singh Tomar vs State of Uttar Pradesh
अभियुक्त: प्रवेश सिंह तोमर (सरकारी कर्मचारी – लेखपाल)
आरोप: नाबालिग पुत्री के साथ बलात्कार
लागू कानून: भारतीय दंड संहिता (IPC) की गंभीर धाराएं एवं POCSO Act, 2012
FIR दर्ज: 12 जनवरी 2020
शिकायतकर्ता: अभियुक्त की पत्नी

 ट्रायल कोर्ट का निर्णय

  • अभियुक्त को दोषसिद्ध (Convicted) घोषित किया गया
  • आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा सुनाई गई

 हाई कोर्ट

  • न्यायालय: इलाहाबाद हाई कोर्ट
  • पीठ: न्यायमूर्ति प्रज्ञान्त मिश्रा एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ

 आरोपों का स्वरूप | Nature of Allegations

इस मामले के आरोप असाधारण रूप से गंभीर और संवेदनशील हैं। शिकायत के अनुसार, अभियुक्त ने अपनी ही नाबालिग बेटी का लंबे समय तक बार-बार यौन शोषण किया। आरोपों में यह भी कहा गया कि:

  • पीड़िता गर्भवती हो गई
  • अभियुक्त द्वारा उसका गर्भपात कराया गया
  • अपराध केवल एक घटना तक सीमित नहीं था, बल्कि यह लगातार होने वाला शोषण था

ऐसे मामलों में POCSO Act का उद्देश्य स्पष्ट है—

बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों में शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance)।

इन्हीं तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को दोषी ठहराते हुए कठोरतम सजा सुनाई।


 बचाव पक्ष की दलीलें | Defence Version

हाई कोर्ट में अपील के दौरान बचाव पक्ष ने सजा निलंबन (Suspension of Sentence) और जमानत के समर्थन में कई तर्क प्रस्तुत किए:

1. FIR को “काउंटरब्लास्ट” बताया गया

बचाव पक्ष का दावा था कि अभियुक्त और उसकी पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद तथा तलाक की कार्यवाही चल रही थी, और FIR उसी का प्रतिशोध है।

2. बयानों में विरोधाभास

यह तर्क दिया गया कि पीड़िता और उसकी मां के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं, जो अभियोजन की कहानी को कमजोर करते हैं।

3. मेडिकल साक्ष्य पर संदेह

बचाव पक्ष ने कहा कि मेडिकल और परिस्थितिजन्य साक्ष्य अभियोजन के संस्करण से पूरी तरह मेल नहीं खाते।

4. अपील लंबित, सुनवाई में लंबा समय

यह दलील दी गई कि अपील के निपटारे में वर्षों लग सकते हैं, और तब तक अभियुक्त को जेल में रखना अन्यायपूर्ण होगा।

आदेश में यह विशेष रूप से उल्लेख किया गया कि राज्य की ओर से पेश AGA (Additional Government Advocate) इन तर्कों का प्रभावी खंडन नहीं कर सके।


 हाई कोर्ट का तर्क | Court’s Reasoning

हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को अस्थायी रूप से निलंबित करते हुए अभियुक्त को जमानत प्रदान की।

कोर्ट द्वारा बताए गए प्रमुख आधार:

  • अपील लंबित है
  • शीघ्र सुनवाई की संभावना नहीं
  • अभियुक्त सरकारी कर्मचारी है
  • सजा निलंबन से अपील निष्फल नहीं होगी

 सबसे विवादास्पद टिप्पणी

कोर्ट ने कहा:

“His right to earn livelihood for survival cannot be curtailed.”
(अपील लंबित रहने के दौरान किसी व्यक्ति का जीवनयापन का अधिकार पूरी तरह छीना नहीं जा सकता)

यही वाक्य इस आदेश को राष्ट्रीय बहस का केंद्र बना देता है।


 फैसला इतना संवेदनशील क्यों है? | Why Is This Judgment So Sensitive?

 1. POCSO जैसे जघन्य अपराध में राहत

POCSO कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि पीड़ित बच्चों में सुरक्षा और विश्वास की भावना पैदा करना है। दोषसिद्ध व्यक्ति को राहत देना इस उद्देश्य के विपरीत प्रतीत होता है।

 2. पीड़िता बनाम अभियुक्त के अधिकार

यह मामला नाबालिग पीड़िता के जीवन, गरिमा और सुरक्षा के अधिकार बनाम अभियुक्त के Right to Livelihood के बीच टकराव को उजागर करता है।

 3. न्यायिक देरी का लाभ

एक गंभीर प्रश्न यह उठता है—
क्या न्यायिक देरी का लाभ दोषसिद्ध अभियुक्त को मिलना चाहिए?
यदि हाँ, तो पीड़ित के लिए न्याय का अर्थ क्या रह जाता है?


 “Right to Livelihood” की संवैधानिक बहस

भारतीय संविधान के Article 21 के अंतर्गत Right to Life की व्याख्या में Right to Livelihood को शामिल किया गया है। लेकिन न्यायशास्त्र यह भी स्पष्ट करता है कि:

  • यह अधिकार पूर्ण (Absolute) नहीं है
  • इसे कानून द्वारा सीमित किया जा सकता है
  • विशेष रूप से तब, जब व्यक्ति गंभीर अपराध में दोषसिद्ध हो

यहाँ प्रश्न केवल आजीविका का नहीं, बल्कि यह है कि

क्या दोषसिद्ध POCSO अभियुक्त का रोजगार अधिकार
नाबालिग पीड़िता के जीवन और गरिमा से ऊपर रखा जा सकता है?


 न्यायिक दृष्टिकोण बनाम सामाजिक नैतिकता

कानून केवल नियमों का संग्रह नहीं, बल्कि समाज के लिए नैतिक दिशा-निर्देशक भी होता है।
इस फैसले में:

  • कानून की तकनीकी व्याख्या स्पष्ट दिखती है
  • लेकिन सामाजिक और नैतिक संवेदनशीलता कमजोर प्रतीत होती है

यह आदेश यह संदेश देता है कि प्रक्रियात्मक देरी, सबसे गंभीर अपराधों में भी राहत का आधार बन सकती है—जो समाज के लिए चिंताजनक है।


 व्यापक प्रभाव | Broader Implications

 न्यायपालिका पर जन-विश्वास

ऐसे फैसले न्यायपालिका के प्रति आम जनता के विश्वास को गहराई से प्रभावित करते हैं।

 पीड़ितों में भय और हतोत्साह

नाबालिग पीड़ितों और उनके परिवारों को यह संदेश मिल सकता है कि

“दोषसिद्धि के बाद भी न्याय अधूरा रह सकता है।”

 विधायी हस्तक्षेप की आवश्यकता

अब यह आवश्यक प्रतीत होता है कि:

  • POCSO मामलों में
  • दोषसिद्धि के बाद
  • सजा निलंबन और जमानत पर स्पष्ट और सख्त दिशानिर्देश बनाए जाएँ

 निष्कर्ष | Conclusion

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह आदेश केवल एक अंतरिम न्यायिक निर्णय नहीं है। यह:

  • न्यायिक देरी की कठोर वास्तविकता
  • संवैधानिक अधिकारों की सीमाएँ
  • और समाज की नैतिक अपेक्षाएँ

इन सभी के बीच चल रहे संघर्ष को उजागर करता है।

यह फैसला अंतिम नहीं है—अपील लंबित है।
लेकिन इसने यह स्पष्ट कर दिया है कि POCSO जैसे मामलों में न्याय केवल अदालतों की फाइलों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज की आत्मा और संवैधानिक मूल्यों से गहराई से जुड़ा प्रश्न है।