NCR में पुराने वाहनों पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी स्पष्टता BS-IV से कम उत्सर्जन मानकों वाले 10 साल से पुराने डीज़ल और 15 साल से पुराने पेट्रोल वाहनों पर कार्रवाई संभव
(12 अगस्त के आदेश में संशोधन करते हुए सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्देश)
भारत में वायु प्रदूषण, पर्यावरण संरक्षण और नागरिकों के परिवहन अधिकार—इन तीनों के बीच संतुलन को लेकर Supreme Court ने बुधवार (17 दिसंबर) को एक अहम स्पष्टीकरण जारी किया। न्यायालय ने अपने 12 अगस्त के पूर्व आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए यह स्पष्ट किया कि—
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में 10 वर्ष से पुराने डीज़ल और 15 वर्ष से पुराने पेट्रोल वाहनों के विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है, यदि वे BS-IV (भारत स्टेज-IV) उत्सर्जन मानकों से नीचे आते हैं।
हालाँकि, कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि केवल उम्र के आधार पर सभी पुराने वाहनों के विरुद्ध यांत्रिक (Mechanical) या अंधाधुंध कार्रवाई उचित नहीं होगी।
यह आदेश न केवल पर्यावरण कानून, बल्कि प्रशासनिक विवेक और नागरिक अधिकारों के लिहाज़ से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
1. पृष्ठभूमि: 12 अगस्त का आदेश क्या था?
12 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने NCR क्षेत्र में—
- 10 वर्ष से पुराने डीज़ल वाहन
- 15 वर्ष से पुराने पेट्रोल वाहन
के विरुद्ध किसी भी प्रकार की दमनकारी (Coercive) कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।
इस आदेश का उद्देश्य था—
- आम नागरिकों को अचानक दंडात्मक कार्रवाई से राहत देना
- यह सुनिश्चित करना कि केवल वाहन की उम्र को आधार बनाकर
- जब्ती, चालान या सीधी रोक न लगाई जाए
लेकिन इस आदेश के बाद प्रवर्तन एजेंसियों और पर्यावरण संगठनों के बीच भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई।
2. सुप्रीम कोर्ट को स्पष्टीकरण की आवश्यकता क्यों पड़ी?
12 अगस्त के आदेश के बाद यह प्रश्न उठा कि—
- क्या सभी पुराने वाहन, भले ही अत्यधिक प्रदूषण फैला रहे हों,
- कार्रवाई से पूरी तरह सुरक्षित हो गए हैं?
इसी संदर्भ में अदालत के समक्ष यह मुद्दा रखा गया कि—
- यदि कोई वाहन
- BS-IV से कम उत्सर्जन मानक का पालन करता है
- और गंभीर प्रदूषण फैला रहा है
तो क्या उस पर भी कार्रवाई नहीं की जा सकती?
3. 17 दिसंबर का संशोधित आदेश: अदालत ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि—
12 अगस्त का आदेश उन वाहनों को पूर्ण छूट देने के लिए नहीं था, जो BS-IV से नीचे के उत्सर्जन मानकों पर चलते हैं।
अदालत ने कहा—
- यदि कोई पुराना वाहन
- BS-IV मानकों को पूरा नहीं करता
- और प्रदूषण नियंत्रण मानकों का उल्लंघन करता है
तो उसके विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई की जा सकती है।
इस प्रकार, अदालत ने पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए अपना रुख स्पष्ट किया।
4. BS-IV उत्सर्जन मानक क्या हैं?
BS-IV (Bharat Stage-IV) उत्सर्जन मानक—
- वाहनों से निकलने वाले
- कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर
- को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए हैं।
भारत में—
- BS-IV मानक 2017 तक लागू थे
- इसके बाद BS-VI मानक लागू किए गए
यदि कोई वाहन—
- BS-IV से नीचे है
- या उसकी उत्सर्जन क्षमता तय सीमा से अधिक है
तो उसे पर्यावरण के लिए हानिकारक माना जाता है।
5. NCR में प्रदूषण और वाहनों की भूमिका
National Capital Region लंबे समय से—
- गंभीर वायु प्रदूषण
- स्मॉग
- और स्वास्थ्य संकट
का सामना कर रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार—
- पुराने वाहन
- प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में से एक हैं
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि—
“पर्यावरण की रक्षा केवल नीति का प्रश्न नहीं, बल्कि जीवन के अधिकार से जुड़ा मुद्दा है।”
6. नागरिकों के अधिकार बनाम पर्यावरण संरक्षण
अदालत ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि—
- एक ओर नागरिकों का
- आवागमन का अधिकार
- संपत्ति का अधिकार
- दूसरी ओर समाज का
- स्वच्छ पर्यावरण में सांस लेने का अधिकार
दोनों के बीच संतुलन आवश्यक है।
इसलिए—
- सभी पुराने वाहनों को स्वतः अपराधी नहीं ठहराया जा सकता
- लेकिन प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को खुली छूट भी नहीं दी जा सकती।
7. प्रशासन और प्रवर्तन एजेंसियों के लिए संदेश
सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्टीकरण—
- ट्रैफिक पुलिस
- परिवहन विभाग
- और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश है।
अब—
- कार्रवाई का आधार
- उत्सर्जन मानक होगा, न कि केवल वाहन की उम्र
अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से यह भी संकेत दिया कि—
“कानून का प्रवर्तन विवेकपूर्ण होना चाहिए, दमनकारी नहीं।”
8. क्या सभी पुराने वाहन सुरक्षित हैं?
इस आदेश के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि—
- BS-IV मानकों को पूरा करने वाले पुराने वाहन
- स्वतः प्रतिबंधित नहीं होंगे
लेकिन—
- BS-IV से नीचे के वाहन
- कार्रवाई के दायरे में आएँगे
इससे उन नागरिकों को राहत मिलेगी—
- जिनके वाहन
- तकनीकी रूप से फिट
- और कम प्रदूषणकारी हैं।
9. पर्यावरणीय न्यायशास्त्र की दिशा में कदम
यह निर्णय भारत के पर्यावरणीय न्यायशास्त्र (Environmental Jurisprudence) को आगे बढ़ाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया कि—
स्वच्छ पर्यावरण अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।
इसलिए—
- प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों को
- संवैधानिक संरक्षण नहीं मिल सकता।
10. भविष्य में क्या प्रभाव पड़ेगा?
इस आदेश के बाद—
- NCR में वाहनों की
- फिटनेस जाँच
- उत्सर्जन परीक्षण
को और सख्ती से लागू किया जा सकता है।
संभावना है कि—
- सरकार
- प्रदूषण नियंत्रण के लिए
- तकनीकी और नीतिगत उपायों को तेज़ करेगी।
11. आलोचना और समर्थन
जहाँ—
- पर्यावरण विशेषज्ञों ने आदेश का स्वागत किया है
वहीं—
- कुछ वाहन मालिक संगठनों का कहना है कि
- परीक्षण प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि यह स्पष्ट किया है कि—
“मनमानी या अंधाधुंध कार्रवाई स्वीकार्य नहीं होगी।”
12. निष्कर्ष: संतुलन का प्रयास
17 दिसंबर का यह आदेश यह दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट—
- न तो पर्यावरण से समझौता करना चाहता है
- और न ही नागरिकों को अनावश्यक रूप से दंडित करना।
अदालत का संदेश साफ़ है—
उम्र नहीं, प्रदूषण निर्णायक होगा।
यह निर्णय—
- पर्यावरण संरक्षण
- कानूनी विवेक
- और संवैधानिक संतुलन
तीनों को साथ लेकर चलने का प्रयास है।
और यही एक स्वस्थ, न्यायपूर्ण और टिकाऊ शहरी भविष्य की दिशा में आवश्यक कदम है।