NCLT का क्षेत्राधिकार और बौद्धिक संपदा विवाद: IBC के दायरे पर सर्वोच्च न्यायालय की निर्णायक व्याख्या
प्रस्तावना: क्या NCLT हर विवाद का समाधान मंच है?
भारत में दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016 (Insolvency and Bankruptcy Code – IBC) को आर्थिक सुधारों की रीढ़ माना जाता है। इस कानून का मूल उद्देश्य है—
संकटग्रस्त कंपनियों का समयबद्ध समाधान, परिसंपत्तियों का संरक्षण और हितधारकों के हितों का संतुलन।
IBC के लागू होने के बाद राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) एक अत्यंत शक्तिशाली मंच के रूप में उभरा। विशेष रूप से धारा 60(5) ने NCLT को ऐसा व्यापक अधिकार क्षेत्र प्रदान किया कि उसे अकसर “सिंगल विंडो फोरम” कहा जाने लगा।
लेकिन हाल के एक महत्वपूर्ण निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रवृत्ति पर विराम लगाते हुए एक स्पष्ट संदेश दिया—
NCLT कोई ‘सुपर कोर्ट’ नहीं है।
वह बौद्धिक संपदा (Intellectual Property – IP) के स्वामित्व या टाइटल से जुड़े जटिल विवादों का निपटारा नहीं कर सकता, यदि वे विवाद स्वीकृत समाधान योजना (Resolution Plan) के दायरे से बाहर हों।
यह निर्णय न केवल IBC की व्याख्या को संतुलित करता है, बल्कि NCLT के क्षेत्राधिकार की संवैधानिक सीमाएँ भी रेखांकित करता है।
IBC की धारा 60(5): व्यापक अधिकार, लेकिन असीम नहीं
धारा 60(5) का वैधानिक स्वरूप
IBC की धारा 60(5) के अनुसार, NCLT को अधिकार है कि वह:
- कॉर्पोरेट देनदार (Corporate Debtor) के विरुद्ध या उसकी ओर से दायर किसी भी आवेदन पर विचार करे।
- कॉर्पोरेट देनदार की संपत्तियों से संबंधित किसी भी दावे का निपटारा करे।
- कानून या तथ्य का कोई भी प्रश्न, जो दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) से उत्पन्न हो या उससे संबंधित हो, तय करे।
इस प्रावधान का उद्देश्य था—
✔ दिवाला प्रक्रिया को टुकड़ों में बिखरने से बचाना
✔ समानांतर मुकदमेबाजी (Parallel Litigation) को रोकना
✔ समाधान में देरी न होने देना
सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी: ‘Jurisdiction Creep’ से बचना जरूरी
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 60(5) का प्रयोग “अधिकार क्षेत्र हड़पने” (Jurisdictional Overreach) के लिए नहीं किया जा सकता।
NCLT केवल वही विवाद सुन सकता है—
- जो सीधे तौर पर CIRP से जुड़े हों
- जो समाधान योजना के कार्यान्वयन से संबंधित हों
- जिनका निपटारा सीमित साक्ष्य के आधार पर संभव हो
यदि कोई विवाद विस्तृत साक्ष्य, गवाहों की जिरह और विशेषज्ञ कानूनी परीक्षण की मांग करता है, तो वह NCLT के लिए उपयुक्त नहीं है।
बौद्धिक संपदा (IP) विवाद: दिवालिया प्रक्रिया में नई चुनौती
IP संपत्तियाँ क्यों बनती हैं विवाद का कारण?
आज की कॉर्पोरेट दुनिया में कंपनियों की असली ताकत उनके—
- ट्रेडमार्क
- ब्रांड नेम
- पेटेंट
- कॉपीराइट
- डिज़ाइन
जैसी अमूर्त संपत्तियों (Intangible Assets) में निहित होती है।
जब कोई कंपनी दिवालिया होती है, तब ये IP संपत्तियाँ समाधान योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती हैं। यहीं से विवाद शुरू होता है।
उदाहरण के लिए—
यदि किसी तीसरे पक्ष का यह दावा हो कि:
- कंपनी द्वारा प्रयुक्त ट्रेडमार्क उसका है, या
- ब्रांड केवल लाइसेंस पर उपयोग में था,
तो क्या NCLT इस स्वामित्व विवाद को तय कर सकता है?
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट उत्तर: नहीं
न्यायालय ने कहा कि—
यदि विवाद का समाधान केवल ट्रेडमार्क एक्ट, पेटेंट एक्ट या कॉपीराइट एक्ट के तहत विस्तृत परीक्षण से ही संभव है, तो NCLT को ऐसे मामलों से दूरी बनानी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के मुख्य सिद्धांत
1. समाधान योजना की पवित्रता (Sanctity of Resolution Plan)
सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा—
- एक बार समाधान योजना स्वीकृत हो जाए,
- तो वह अंतिम और बाध्यकारी (Final & Binding) होती है।
NCLT का कार्य केवल यह देखना है कि: ✔ योजना सही ढंग से लागू हो रही है या नहीं
👉 समाधान योजना के बाद यदि कोई नया टाइटल विवाद उठाया जाता है, तो उसे धारा 60(5) के अंतर्गत नहीं सुना जा सकता।
2. क्षेत्राधिकार बनाम विशेषज्ञता (Jurisdiction vs Expertise)
NCLT एक विशेष न्यायाधिकरण है, जिसकी स्थापना विशेष उद्देश्य से हुई है—
- दिवालिया समाधान
- परिसमापन
- कॉर्पोरेट पुनर्गठन
इसके विपरीत—
- IP विवादों में
- सिविल कानून
- साक्ष्य अधिनियम
- तकनीकी विशेषज्ञता
की आवश्यकता होती है, जो— ✔ सिविल कोर्ट
✔ उच्च न्यायालय
के क्षेत्राधिकार में आते हैं।
IBC अन्य कानूनों पर प्रभावी (Override) अवश्य है,
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर विवाद IBC के अधीन आ जाए।
3. ‘इन रेम’ और ‘इन पर्सोनम’ अधिकारों का अंतर
बौद्धिक संपदा अधिकार सामान्यतः—
- In Rem होते हैं (पूरी दुनिया के विरुद्ध अधिकार)
जबकि NCLT मुख्यतः—
- In Personam विवादों (पक्षकारों के बीच)
से निपटता है।
👉 IP के स्वामित्व का निर्धारण किसी एक पक्ष तक सीमित नहीं होता, इसलिए यह NCLT के सीमित दायरे से बाहर है।
इस निर्णय का व्यावसायिक और कानूनी प्रभाव
1. निवेशकों और Resolution Applicants को स्पष्टता
अब समाधान आवेदकों को स्पष्ट संदेश है—
- वे केवल उन्हीं IP संपत्तियों पर दावा कर सकते हैं
- जिनका स्वामित्व निर्विवाद रूप से कॉर्पोरेट देनदार के पास हो
यह Due Diligence को और मजबूत बनाएगा।
2. NCLT पर मुकदमेबाजी का बोझ कम होगा
NCLT अब—
- IP
- टाइटल
- दीवानी प्रकृति के विवादों
से मुक्त रहेगा, जिससे— ✔ दिवाला मामलों का तेजी से निपटारा होगा
✔ न्यायिक समय की बचत होगी
3. बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा
यह निर्णय IP मालिकों के लिए राहत लेकर आया है।
अब—
- उनके अधिकार
- IBC प्रक्रिया की आड़ में
- छीने नहीं जा सकेंगे
समाधान पेशेवरों (RPs) की भूमिका और जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट के इस दृष्टिकोण के बाद—
- Resolution Professionals
- Liquidators
को संपत्तियों की जांच करते समय विशेष सावधानी बरतनी होगी।
✔ IP का स्वामित्व
✔ लाइसेंस और असाइनमेंट
✔ लंबित विवाद
का खुलासा समाधान योजना में पहले ही होना चाहिए।
निष्कर्ष: IBC का उद्देश्य और न्यायिक संयम
सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय न्यायिक संयम (Judicial Restraint) का उत्कृष्ट उदाहरण है।
यह स्पष्ट करता है कि—
- IBC कोई रिकवरी टूल नहीं है
- NCLT कोई टाइटल डिक्लेरेशन फोरम नहीं है
- और दिवालिया प्रक्रिया का उद्देश्य विवादों का विस्तार नहीं, बल्कि समाधान है
यह फैसला Ease of Doing Business और कानूनी निश्चितता (Legal Certainty) के बीच एक संतुलित पुल बनाता है।
भविष्य में, यह निर्णय भारतीय दिवाला कानून को अधिक परिपक्व, व्यावहारिक और न्यायसंगत दिशा में ले जाएगा।