“Liberty Cannot Wait”: ट्रायल में देरी पर कलकत्ता हाईकोर्ट की सख़्त टिप्पणी — चार साल जेल, पर मुकदमे में कोई ठोस प्रगति नहीं
प्रस्तावना: जब न्याय में देरी, स्वयं अन्याय बन जाए
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में एक पुरानी कहावत है — Justice delayed is justice denied। हाल ही में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इसी सिद्धांत को एक बार फिर सशक्त शब्दों में दोहराया, जब उसने चार वर्षों से जेल में बंद एक आरोपी के मामले में ट्रायल में हो रही असहनीय देरी पर तीखी नाराज़गी जताई। अदालत ने स्पष्ट कहा कि “Liberty Cannot Wait” — अर्थात किसी भी आरोपी को अनिश्चितकाल तक केवल इस आधार पर जेल में नहीं रखा जा सकता कि अभियोजन अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा है।
यह निर्णय न केवल संबंधित आरोपी के लिए राहत लेकर आया, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था, अभियोजन एजेंसियों और निचली अदालतों के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है।
मामले की पृष्ठभूमि: चार साल जेल, पर ट्रायल शून्य के करीब
यह मामला एक गंभीर आपराधिक आरोप से जुड़ा था, जिसमें आरोपी को वर्ष 2020 के आसपास गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के बाद आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। प्रारंभ में यह माना गया कि मामला गंभीर है, जांच लंबित है और जमानत देना उचित नहीं होगा।
लेकिन समस्या यहीं से शुरू हुई।
चार वर्ष बीत जाने के बावजूद:
- चार्ज फ्रेम नहीं हो पाए
- गवाहों की गवाही शुरू नहीं हुई
- अभियोजन बार-बार समय मांगता रहा
- ट्रायल व्यावहारिक रूप से ठप पड़ा रहा
आरोपी लगातार जेल में रहा, जबकि मुकदमे की प्रगति नगण्य रही।
हाईकोर्ट की सख़्त टिप्पणी: “कानून सज़ा से पहले दंड नहीं देता”
कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस स्थिति को संविधान के अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार — का घोर उल्लंघन बताया। न्यायालय ने कहा:
“कोई भी व्यक्ति केवल इस कारण वर्षों तक जेल में नहीं रखा जा सकता कि अभियोजन अपना काम करने में असफल रहा है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता अनिश्चितकाल तक प्रतीक्षा नहीं कर सकती।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्री-ट्रायल डिटेंशन (Pre-Trial Detention) को सज़ा का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
अभियोजन की भूमिका पर सवाल: Prosecutorial Apathy
इस मामले में हाईकोर्ट ने अभियोजन की भूमिका पर बेहद कड़े शब्दों में टिप्पणी की। अदालत के अनुसार:
- अभियोजन की ओर से गवाहों को समय पर प्रस्तुत नहीं किया गया
- सुनवाई की तारीखों पर तैयारी का अभाव रहा
- बार-बार स्थगन (Adjournments) मांगे गए
- आरोपी की हिरासत की आवश्यकता का कोई ठोस औचित्य नहीं बताया गया
अदालत ने इसे “Prosecutorial Apathy” यानी अभियोजन की लापरवाही और उदासीनता करार दिया।
जमानत बनाम जेल: न्यायिक सिद्धांत की पुनः पुष्टि
कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर स्थापित सिद्धांतों को दोहराया, जिनमें प्रमुख हैं:
- Bail is the rule, jail is the exception
- लंबी ट्रायल देरी जमानत का मजबूत आधार बनती है
- गंभीर आरोप भी अनंत कारावास को जायज़ नहीं ठहराते
अदालत ने कहा कि जब ट्रायल शुरू होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं दिखती, तो आरोपी को जेल में रखना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
चार साल की कैद: मानवाधिकार का प्रश्न
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि चार साल तक बिना ट्रायल जेल में रहना केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवाधिकार का भी गंभीर मुद्दा है। अदालत ने कहा:
- आरोपी दोषसिद्ध नहीं है
- कानून उसे निर्दोष मानता है जब तक दोष सिद्ध न हो
- जेल में बिताया गया हर दिन, यदि अनावश्यक है, तो वह राज्य की विफलता है
यह टिप्पणी भारत की जेलों में बंद हज़ारों अंडरट्रायल कैदियों की स्थिति पर भी रोशनी डालती है।
राज्य की जिम्मेदारी: ट्रायल को समयबद्ध बनाना
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि:
- राज्य का कर्तव्य है कि वह ट्रायल को यथाशीघ्र पूरा करे
- अभियोजन की अक्षमता का भार आरोपी पर नहीं डाला जा सकता
- संसाधनों की कमी या प्रशासनिक शिथिलता कोई बहाना नहीं है
अदालत ने निचली अदालतों और अभियोजन को निर्देश दिया कि वे अनावश्यक स्थगनों पर लगाम लगाएं।
जमानत आदेश: राहत लेकिन चेतावनी के साथ
अंततः हाईकोर्ट ने आरोपी को नियमित जमानत प्रदान करते हुए कहा कि:
- आरोपी चार वर्षों से अधिक समय से जेल में है
- ट्रायल शुरू होने की कोई निश्चित समय-सीमा नहीं
- अभियोजन द्वारा देरी का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं
हालांकि, अदालत ने जमानत कुछ शर्तों के साथ दी, जैसे:
- आरोपी जांच और ट्रायल में सहयोग करेगा
- गवाहों को प्रभावित नहीं करेगा
- बिना अनुमति क्षेत्र नहीं छोड़ेगा
न्यायिक संदेश: सिस्टम के लिए एक अलार्म
यह फैसला केवल एक व्यक्ति की रिहाई नहीं है, बल्कि पूरे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के लिए एक चेतावनी है। हाईकोर्ट ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश दिया कि:
- जेलें ट्रायल से पहले सज़ा देने का स्थान नहीं बन सकतीं
- अभियोजन की निष्क्रियता स्वीकार्य नहीं
- न्यायपालिका को व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा में सक्रिय रहना होगा
समाज और विधि जगत की प्रतिक्रिया
विधि विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि:
- यह आदेश अंडरट्रायल कैदियों के अधिकारों को मज़बूती देता है
- अभियोजन को जवाबदेह बनाता है
- निचली अदालतों को संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है
कई अधिवक्ताओं का मानना है कि यह फैसला भविष्य में लंबित मामलों में जमानत याचिकाओं का महत्वपूर्ण आधार बनेगा।
व्यापक परिप्रेक्ष्य: भारत में अंडरट्रायल की समस्या
भारत की जेलों में आज भी बड़ी संख्या में कैदी ऐसे हैं जो:
- दोषसिद्ध नहीं हुए हैं
- वर्षों से ट्रायल का इंतज़ार कर रहे हैं
- जिनकी कैद की अवधि संभावित सज़ा से भी अधिक हो चुकी है
कलकत्ता हाईकोर्ट का यह निर्णय इस गंभीर समस्या की ओर फिर से ध्यान आकर्षित करता है।
निष्कर्ष: “Liberty Cannot Wait” — केवल शब्द नहीं, संवैधानिक चेतावनी
कलकत्ता हाईकोर्ट का यह फैसला एक सशक्त स्मरण है कि स्वतंत्रता कोई दया नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है। जब राज्य और अभियोजन अपने कर्तव्यों में विफल होते हैं, तो उसका दंड आरोपी को जेल में रखकर नहीं दिया जा सकता।
“Liberty Cannot Wait” केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था के लिए एक स्पष्ट संदेश है —
न्याय में देरी, अब बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
यह फैसला आने वाले समय में भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित ट्रायल के सिद्धांतों को और अधिक मजबूती देगा।