Indian Evidence Act की धारा 65B: इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता – एक संपूर्ण मार्गदर्शिका
भारतीय न्याय प्रणाली में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (Electronic Evidence) की भूमिका तेजी से बढ़ी है। मोबाइल फोन, सीसीटीवी फुटेज, ईमेल, व्हाट्सएप चैट, सर्वर लॉग, लैपटॉप डेटा, पेन ड्राइव, कॉल रिकॉर्डिंग्स—ये सभी आधुनिक युग में अपराधों और विवादों की जांच में अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व बन चुके हैं। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को अदालत में स्वीकार करने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B एक निर्णायक प्रावधान है। न्यायालयों ने कई अहम निर्णयों में धारा 65B की व्याख्या की है, जिसने यह स्पष्ट किया है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स को साक्ष्य के रूप में मान्यता देने के लिए क्या अनिवार्य शर्तें हैं। यह लेख धारा 65B का पूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत करता है और यह समझाता है कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को अदालत में स्वीकार्य बनाने के लिए किन आवश्यकताओं को पूरा करना होता है।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की बढ़ती प्रासंगिकता
आज लगभग हर अपराध में किसी न किसी रूप में इलेक्ट्रॉनिक डेटा शामिल होता है। चाहे साइबर अपराध की बात हो या हत्या, रिश्वत, घरेलू हिंसा, बलात्कार, सड़क हादसा, धोखाधड़ी, कर चोरी, बैंकिंग अपराध—हर केस में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड किसी न किसी रूप में सामने आता है। आधुनिक विवादों में ईमेल, चैट, सोशल मीडिया पोस्ट, कॉल रिकॉर्ड, डिजिटल कॉन्ट्रैक्ट, यूपीआई और बैंकिंग लेन-देन, ऑनलाइन कैमरा रिकॉर्डिंग आदि महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए धारा 65B का ज्ञान न केवल वकीलों बल्कि न्यायपालिका, पुलिस, फोरेंसिक विशेषज्ञों और आम नागरिकों के लिए भी आवश्यक है।
धारा 65B का मूल उद्देश्य
धारा 65B का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अदालत में प्रस्तुत इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की प्रमाणिकता (authenticity) और विश्वसनीयता पर कोई शक न रहे। चूंकि इलेक्ट्रॉनिक डेटा आसानी से बदला जा सकता है, एडिट किया जा सकता है या मॉडिफाइ किया जा सकता है, इसलिए इसे अन्य दस्तावेजों की तरह साधारण रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता। धारा 65B एक विशेष प्रक्रिया निर्धारित करती है, जिसके अनुसार इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सेकेंडरी एविडेंस के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। यह प्रावधान इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की अखंडता (integrity) और विश्वसनीयता (reliability) सुनिश्चित करता है।
धारा 65B की तकनीकी आवश्यकता: प्रमाणपत्र (Certificate)
धारा 65B(4) के अनुसार, जब भी कोई इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड (जैसे सीडी, पेन ड्राइव, हार्ड डिस्क की कॉपी, मोबाइल स्क्रीनशॉट आदि) अदालत में पेश किया जाता है, तो उसके साथ 65B प्रमाणपत्र लगाया जाना अनिवार्य है, बशर्ते कि मूल उपकरण (Original Device) प्रस्तुत न किया जा सके।
65B प्रमाणपत्र में निम्न बातें अनिवार्य होती हैं—
- इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड निकालने की प्रक्रिया क्या थी।
- वह रिकॉर्ड जिस उपकरण से निकाला गया है उसकी जानकारी।
- यह प्रमाण कि रिकॉर्ड बिना किसी संशोधन के उसी रूप में स्थानांतरित किया गया है।
- प्रमाणपत्र देने वाले व्यक्ति का अधिकार/कंपिटेंसी (कि वह उपकरण को संचालित या नियंत्रित करता है)।
यह प्रमाणपत्र इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की प्रामाणिकता सिद्ध करने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
क्या हर इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के लिए 65B प्रमाणपत्र जरूरी है?
इस प्रश्न पर न्यायालयों ने कई बार अलग-अलग व्याख्याएँ दी थीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसलों में अंतिम स्थिति स्पष्ट कर दी है। सामान्य नियम यह है कि यदि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड मूल उपकरण से नहीं दिया जा रहा है, तो 65B प्रमाणपत्र अनिवार्य है।
यदि कोई पार्टी स्वयं मोबाइल फोन या लैपटॉप को मूल रूप में पेश कर दे और उसी उपकरण से अदालत रिकॉर्ड देख सकती है, तो प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं रह जाती। लेकिन अधिकांश मामलों में ऐसा संभव नहीं होता, इसलिए 65B प्रमाणपत्र अनिवार्य माना जाता है।
Anvar P.V. v. P.K. Basheer (2014): ऐतिहासिक निर्णय
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता पर सबसे प्रभावशाली माना जाता है। अदालत ने कहा—
- इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सेकेंडरी एविडेंस के रूप में तभी स्वीकार किए जा सकते हैं जब 65B प्रमाणपत्र दिया गया हो।
- बिना प्रमाणपत्र के कोई सीडी, व्हाट्सएप चैट, वीडियो रिकॉर्डिंग, ईमेल प्रिंटआउट, सीसीटीवी फुटेज आदि स्वीकार नहीं किए जा सकते।
इस निर्णय ने यह साफ कर दिया कि धारा 65B एक तकनीकी लेकिन अनिवार्य आवश्यकता है।
Shafhi Mohammad v. State of Himachal Pradesh (2018): अस्थायी ढील
इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि कोई व्यक्ति प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं करा सकता, क्योंकि वह डिवाइस उसके नियंत्रण में नहीं है, तो प्रमाणपत्र देना अनिवार्य नहीं है। लेकिन यह निर्णय बाद में विवादित हो गया और फिर सुप्रीम कोर्ट ने बड़े बेंच में इसे गलत ठहराया।
Arjun Panditrao Khotkar v. Kailash Kushanrao (2020): अंतिम और बाध्यकारी कानून
तीन-न्यायाधीशों वाली बेंच ने स्पष्ट किया कि—
- Shafhi Mohammad का फैसला गलत था।
- 65B प्रमाणपत्र अनिवार्य है, जब तक कि इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस मूल रूप में प्रस्तुत न किया गया हो।
- पुलिस, प्राइवेट कंपनियों, बैंकों, सोशल मीडिया कंपनियों, टेलीकॉम ऑपरेटर्स आदि की जिम्मेदारी है कि जब भी उनसे डेटा लिया जाए, वे 65B प्रमाणपत्र दें।
इसके बाद भारत में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का एकीकृत और स्पष्ट ढांचा तैयार हो गया।
धारा 65B प्रमाणपत्र कौन दे सकता है?
65B प्रमाणपत्र उस व्यक्ति द्वारा दिया जा सकता है—
- जिसके पास डिवाइस का नियंत्रण या संचालन का अधिकार हो।
- जो उस प्रक्रिया से परिचित हो जिसके द्वारा रिकॉर्ड निकाला गया है।
- जो प्रमाणित कर सके कि रिकॉर्ड उसी तरह कॉपी किया गया है जैसा मूल में मौजूद था।
उदाहरण के लिए—
- सीसीटीवी ऑपरेटर या कंपनी का आईटी कर्मचारी
- बैंक अधिकारी (बैंक स्टेटमेंट के लिए)
- टेलीकॉम कंपनी का नोडल अधिकारी
- मोबाइल से डेटा निकालने वाला फोरेंसिक विशेषज्ञ
- ऑफिस सर्वर डेटा निकालने वाला टेक्निशियन
65B प्रमाणपत्र का स्वरूप
धारा 65B किसी विशेष फॉर्मेट को निर्धारित नहीं करती, लेकिन प्रमाणपत्र में निम्न अनिवार्य तत्व होते हैं—
- यह घोषणा कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड कंप्यूटर सिस्टम के नियमित उपयोग में उत्पन्न हुआ।
- उसे निकालने की प्रक्रिया सुरक्षित और नियमित थी।
- कॉपी मूल के समान है।
- प्रमाणपत्र देने वाले का नाम, पद, हस्ताक्षर और अधिकार।
65B प्रमाणपत्र का महत्व क्यों है?
इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स आसानी से एडिट, डिलीट, मॉडिफाइ या फ्रेम किए जा सकते हैं। इसलिए प्रमाणपत्र एक सुरक्षा कवच जैसा कार्य करता है। यह सुनिश्चित करता है कि—
- डेटा में छेड़छाड़ नहीं हुई है।
- वह विश्वसनीय है।
- अदालत में प्रस्तुत कॉपी मूल डेटा का सत्य व सही प्रतिनिधित्व है।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के प्रकार
धारा 65B विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर लागू होती है—
- मोबाइल फोन चैट (WhatsApp, SMS)
- ईमेल और सर्वर लॉग
- सोशल मीडिया पोस्ट
- सीसीटीवी फुटेज
- पेन ड्राइव, हार्ड डिस्क, सीडी, डीवीडी
- कॉल रिकॉर्डिंग
- बैंकिंग लेन-देन का इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड
- डिजिटल अनुबंध और ई-सिग्नेचर डेटा
- ऑनलाइन लेन-देन और यूपीआई स्टेटमेंट
हर प्रकार के रिकॉर्ड को स्वीकार्य बनाने के लिए आवश्यक है कि उसका स्रोत प्रमाणित हो।
क्या स्क्रीनशॉट अपने आप में साक्ष्य हैं?
स्क्रीनशॉट स्वत: स्वीकार्य नहीं होते। उन्हें स्वीकार्य बनाने के लिए—
- स्रोत का प्रमाण,
- डेटा निकालने की प्रक्रिया,
- और 65B प्रमाणपत्र
आवश्यक हैं।
क्या व्हाट्सएप चैट साक्ष्य बन सकती है?
हाँ, व्हाट्सएप चैट साक्ष्य बन सकती है, लेकिन इसकी स्वीकार्यता तभी है जब—
- चैट का बैकअप/एक्सपोर्ट 65B प्रमाणपत्र के साथ दिया जाए।
- यदि मोबाइल फोन मूल रूप में अदालत में प्रस्तुत किया जाए, तब प्रमाणपत्र अनिवार्य नहीं है।
- टाइमस्टैम्प और मेटाडेटा जांच योग्य हों।
सीसीटीवी फुटेज की स्वीकार्यता
सीसीटीवी फुटेज सबसे अधिक प्रचलित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों में से है। इसे स्वीकार्य बनाने के लिए—
- फुटेज निकालने वाले तकनीशियन का 65B प्रमाणपत्र
- डीवीआर/NVR की जानकारी
- रिकॉर्डिंग की तारिख, समय, कैमरों की लोकेशन
- फुटेज की सततता (continuity)
महत्वपूर्ण हैं।
65B प्रमाणपत्र कब आवश्यक नहीं होता?
सिर्फ तीन स्थितियाँ हैं—
- जब मूल उपकरण (Mobile, Hard Disk, Server आदि) अदालत में ही प्रस्तुत कर दिया जाए।
- जब डेटा सीधे मूल उपकरण से अदालत में प्रदर्शित किया जाए।
- जब अदालत खुद डिवाइस को जांच सकती है और उसके कंटेंट की सत्यता स्पष्ट हो।
इन परिस्थितियों को छोड़कर लगभग हर मामले में प्रमाणपत्र अनिवार्य है।
अदालतों में 65B की व्यावहारिक चुनौतियाँ
- पुलिस द्वारा समय पर प्रमाणपत्र न लेना।
- कंपनियों, बैंकों, और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का सहयोग न करना।
- आईटी विशेषज्ञों की कमी।
- जजों द्वारा तकनीकी पहलुओं को समझने में कठिनाई।
- डिजिटल डेटा की जल्द नष्ट होने वाली प्रकृति।
इन चुनौतियों के कारण कभी-कभी महत्वपूर्ण केस कमजोर हो जाते हैं।
भविष्य की दिशा : तकनीकी साक्ष्य को मजबूत बनाना
भारत को तकनीकी साक्ष्य को मजबूत बनाने के लिए निम्न कदम आवश्यक हैं—
- पुलिस और वकीलों का विशेष प्रशिक्षण।
- डिजिटल फोरेंसिक प्रयोगशालाओं की स्थापना।
- सोशल मीडिया कंपनियों को 65B प्रमाणपत्र देना अनिवार्य करना।
- इलेक्ट्रॉनिक डेटा संरक्षण के लिए आधुनिक कानून बनाना।
- ब्लॉकचेन आधारित डिजिटल साक्ष्य संरक्षण प्रणाली विकसित करना।
निष्कर्ष
धारा 65B भारतीय साक्ष्य अधिनियम में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की रीढ़ है। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि डिजिटल डेटा को सुरक्षित, विश्वसनीय और वैज्ञानिक आधार पर ही अदालत में मान्यता मिले। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता से जुड़ी अस्पष्टताओं को दूर कर दिया है और अब यह स्पष्ट है कि—
- इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को सेकेंडरी एविडेंस के रूप में प्रस्तुत करने के लिए 65B प्रमाणपत्र अनिवार्य है।
- प्रमाणपत्र डिजिटल रिकॉर्ड की प्रामाणिकता और अखंडता की गारंटी है।
- डिजिटल युग में न्याय सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी साक्ष्य के सही उपयोग का ज्ञान आवश्यक है।
धारा 65B न केवल आधुनिक न्याय प्रणाली का महत्वपूर्ण आधार है, बल्कि डिजिटल व्यवस्था में विश्वास का भी संरक्षक है। यह लेख इस प्रावधान का एक संपूर्ण और व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है, जो वकीलों, शोधकर्ताओं, छात्रों और न्यायिक अधिकारियों के लिए अत्यंत उपयोगी है।