HIV स्थिति के आधार पर नियमितीकरण से इनकार असंवैधानिक: समानता, गरिमा और श्रम अधिकारों पर बॉम्बे हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
प्रस्तावना
भारतीय संविधान केवल काग़ज़ी अधिकारों का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि वह प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा, समानता और न्याय की जीवंत अभिव्यक्ति है। कार्यस्थलों पर भेदभाव, विशेषकर स्वास्थ्य की स्थिति के आधार पर, आज भी भारतीय समाज की एक कड़वी सच्चाई है। इसी पृष्ठभूमि में बॉम्बे हाईकोर्ट का यह हालिया निर्णय न केवल श्रम कानून और सेवा विधि के क्षेत्र में बल्कि मानवाधिकार और संवैधानिक नैतिकता के संदर्भ में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी कर्मचारी को केवल इसलिए पक्का (Regular) न करना कि वह HIV पॉजिटिव है, मनमाना, भेदभावपूर्ण और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का घोर उल्लंघन है। यह निर्णय उस सामाजिक सोच को चुनौती देता है जो HIV को अक्षमता या अयोग्यता के रूप में देखती है।
मामले की पृष्ठभूमि: 30 वर्षों की सेवा, पर समान अधिकार नहीं
यह मामला वर्ष 1994 से बॉम्बे हॉस्पिटल में स्वीपर के रूप में कार्यरत एक कर्मचारी से जुड़ा है। याचिकाकर्ता लगातार और बिना किसी शिकायत के अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता रहा।
समय के साथ, अस्पताल में कार्यरत कई अस्थायी कर्मचारियों को एक समझौते के तहत पक्का (स्थायी) किया जाना था। याचिकाकर्ता का नाम भी उन पात्र कर्मचारियों की सूची में शामिल था।
लेकिन समस्या तब उत्पन्न हुई जब मेडिकल परीक्षण में याचिकाकर्ता HIV पॉजिटिव पाया गया। इसके आधार पर उसे “Medically Unfit” घोषित कर दिया गया और उसे नियमित कर्मचारी बनाए जाने से वंचित कर दिया गया।
विरोधाभासपूर्ण व्यवहार: काम वही, वेतन और दर्जा अलग
यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है कि:
- याचिकाकर्ता को पक्का नहीं किया गया
- लेकिन उससे वही काम करवाया जाता रहा
- वही समय, वही ज़िम्मेदारियाँ
- वही कार्य-परिस्थितियाँ
- लेकिन कम वेतन और कम दर्जा
कोर्ट ने इस विरोधाभास को गंभीरता से नोट किया और कहा कि यदि कोई कर्मचारी वर्षों तक बिना किसी रुकावट के अपने सहकर्मियों की तरह काम करता है, तो केवल उसके HIV स्टेटस के आधार पर उसे नियमितीकरण के लाभ से वंचित करना दुश्मनी वाला भेदभाव (Hostile Discrimination) है।
2017 का हस्तक्षेप और आंशिक न्याय
यह उल्लेखनीय है कि 2017 में मुंबई डिस्ट्रिक्ट एड्स कंट्रोल सोसाइटी के हस्तक्षेप के बाद याचिकाकर्ता को भविष्य के लिए पक्का किया गया।
हालांकि, यह कदम समस्या का पूर्ण समाधान नहीं था, क्योंकि:
- याचिकाकर्ता को 2006 से पक्का किया जाना चाहिए था
- उसके साथियों को उसी वर्ष नियमित कर दिया गया था
- उसे वेतन, वरिष्ठता और अन्य सेवा लाभों से वंचित रखा गया
इंडस्ट्रियल कोर्ट से हाईकोर्ट तक
2006 से पक्का न किए जाने से आहत होकर याचिकाकर्ता ने इंडस्ट्रियल कोर्ट में शिकायत दर्ज की, जिसमें उसने:
- 2006 से नियमितीकरण की घोषणा
- और उसके बाद मिलने वाले सभी लाभों की मांग की
लेकिन इंडस्ट्रियल कोर्ट ने उसकी शिकायत खारिज कर दी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने बॉम्बे हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।
हाईकोर्ट का विश्लेषण: स्वास्थ्य बनाम मानव गरिमा
न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने ने मामले की सुनवाई करते हुए कई महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर विचार किया:
1. क्या HIV पॉजिटिव होना सेवा से अयोग्य बनाता है?
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि HIV एक चिकित्सीय स्थिति है, न कि अक्षमता। यदि कर्मचारी अपना काम प्रभावी ढंग से कर रहा है, तो केवल HIV पॉजिटिव होना सेवा में भेदभाव का आधार नहीं बन सकता।
2. अनुच्छेद 14 का उल्लंघन
अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है। कोर्ट ने कहा कि:
“समान काम करने वाले कर्मचारियों के साथ केवल स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर अलग व्यवहार करना मनमाना और असमानता को बढ़ावा देने वाला है।”
3. अनुच्छेद 16 का उल्लंघन
अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की गारंटी देता है। कोर्ट ने माना कि नियमितीकरण से इनकार करना रोज़गार के अवसरों में असमानता पैदा करता है।
दुश्मनी वाला भेदभाव (Hostile Discrimination) क्या है?
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई तटस्थ प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि:
- यह जानबूझकर किया गया भेदभाव था
- इसका कोई तार्किक या वैज्ञानिक आधार नहीं था
- यह सामाजिक पूर्वाग्रह पर आधारित था
इसलिए इसे Hostile Discrimination कहा गया, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
गरिमा (Dignity) और संवैधानिक नैतिकता
कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान केवल समानता की बात नहीं करता, बल्कि मानव गरिमा को भी सर्वोच्च मूल्य मानता है।
HIV पॉजिटिव व्यक्ति के साथ इस प्रकार का व्यवहार:
- उसे सामाजिक रूप से कलंकित करता है
- उसकी आत्म-सम्मान को ठेस पहुँचाता है
- और उसे “कमतर नागरिक” की श्रेणी में धकेल देता है
यह स्थिति संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) के विरुद्ध है।
श्रम कानून और सामाजिक न्याय का दृष्टिकोण
यह फैसला श्रम कानूनों की उस मूल भावना को भी पुष्ट करता है, जिसके अनुसार:
- “काम का मूल्य काम से तय होगा, बीमारी से नहीं”
- “समान कार्य के लिए समान वेतन और दर्जा”
- “लंबी सेवा का सम्मान”
यह निर्णय विशेष रूप से अस्थायी और संविदा कर्मचारियों के लिए एक मजबूत संदेश है कि नियमितीकरण कोई कृपा नहीं, बल्कि अधिकार हो सकता है, यदि शर्तें पूरी हों।
व्यापक प्रभाव और भविष्य की दिशा
यह निर्णय केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। इसके व्यापक प्रभाव हैं:
- HIV/AIDS से जुड़े सामाजिक कलंक को चुनौती
- कार्यस्थलों पर स्वास्थ्य-आधारित भेदभाव पर रोक
- नियोक्ताओं के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश
- न्यायपालिका द्वारा मानवाधिकारों की पुनर्पुष्टि
यह फैसला भविष्य में ऐसे सभी मामलों के लिए नज़ीर (Precedent) के रूप में कार्य करेगा।
निष्कर्ष
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में एक मानवाधिकार-केन्द्रित मील का पत्थर है। यह स्पष्ट करता है कि:
- बीमारी अपराध नहीं है
- HIV अयोग्यता नहीं है
- समान काम करने वाले कर्मचारियों के अधिकार समान होंगे
- गरिमा और समानता संविधान की आत्मा हैं
यह फैसला न केवल याचिकाकर्ता को न्याय देता है, बल्कि समाज को भी यह संदेश देता है कि संविधान हर उस व्यक्ति के साथ खड़ा है, जिसे केवल उसकी स्थिति के कारण हाशिए पर धकेला गया हो।