IndianLawNotes.com

“BNSS युग में रिमांड की नई परिभाषा: SC ने कहा—मजिस्ट्रेट मशीनी ढंग से आदेश नहीं दे सकते”

“BNSS युग में रिमांड की नई परिभाषा: SC ने कहा—मजिस्ट्रेट मशीनी ढंग से आदेश नहीं दे सकते”


भूमिका: नया BNSS, नई जिम्मेदारियाँ—सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण संकेत

      भारत में हाल ही में लागू हुए Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (BNSS) ने गिरफ्तारी, रिमांड और जांच से जुड़ी न्यायिक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं।
इन्हीं बदलावों के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने Mahir Rajesh Shah v. State of Maharashtra & Anr., Criminal Appeal No. 2195 of 2025 में एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय दिया, जिसमें कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि रिमांड पर निर्णय लेते समय मजिस्ट्रेट केवल औपचारिकता पूरी करने वाली “मशीन” या “पोस्ट ऑफिस” की भूमिका नहीं निभा सकते।

      इस निर्णय ने न केवल धारा 187 BNSS की न्यायिक प्रकृति को रेखांकित किया है, बल्कि मजिस्ट्रेट पर न्यायिक दायित्वों की कठोरता और निष्पक्ष मनन की आवश्यकता को भी रेखांकित किया है।


1. मामला क्या था?—Mahir Rajesh Shah का विवाद

       इस मामले में आरोपी महि‍र राजेश शाह को पुलिस ने विशेष अपराध के संदेह में गिरफ्तार किया और मजिस्ट्रेट के समक्ष रिमांड के लिए प्रस्तुत किया। पुलिस ने अक्सर की तरह रिमांड पेपर तैयार किए और उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया।

परंतु आरोपी के पक्ष ने यह याचिका दाखिल की कि—

  • मजिस्ट्रेट ने रिमांड आदेश पास करते समय कोई स्वतंत्र न्यायिक मनन नहीं किया,
  • आरोपी की दलीलें या आपत्ति सुने बिना मशीनी ढंग से रिमांड दे दिया,
  • और यह सब BNSS की धारा 187 के मानकों का गंभीर उल्लंघन है।

इस आधार पर यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए।


2. सुप्रीम कोर्ट का सिद्धांत: “Magistrate is not a Post Office”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कुछ अत्यंत कड़े और स्पष्ट शब्दों का प्रयोग किया:

“मजिस्ट्रेट रिमांड पेपर्स पर केवल एक मुहर लगाने वाला पोस्ट ऑफिस नहीं है।”

अर्थात्—

  • मजिस्ट्रेट को पुलिस की मांग का स्वतंत्र मूल्यांकन करना होगा,
  • आरोपी की बात सुनना अनिवार्य है,
  • और सभी दस्तावेजों को देखकर यह संतुष्टि प्राप्त करनी होगी कि रिमांड का औचित्य सिद्ध होता है।

यह न्यायपालिका के लिए एक बहुत बड़ा संकेत है कि BNSS लागू होने के बाद मजिस्ट्रेट की ज़िम्मेदारी पूर्व की तुलना में और भी कठोर और सक्रिय हो गई है।


3. धारा 187 BNSS क्या कहती है?—सामग्री, प्रक्रिया और न्यायिक दायित्व

BNSS की धारा 187 पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के बाद व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत करने और पुलिस/न्यायिक कस्टडी देने से संबंधित है।

धारा 187 की मुख्य विशेषताएँ:

(1) मजिस्ट्रेट को पुलिस रिमांड तभी देनी है जब—

  • अपराध गंभीर हो,
  • जांच के लिए आरोपी की कस्टडी वास्तव में आवश्यक हो,
  • और पुलिस द्वारा प्रस्तुत सामग्री “विश्वसनीय और पर्याप्त” हो।

(2) आरोपी को सुनवाई का अधिकार

मजिस्ट्रेट को आरोपी या उसके वकील को सुनना अनिवार्य है।
एकतरफा रिमांड आदेश अमान्य माना जाएगा।

(3) न्यायिक मनन (Judicial Application of Mind)

सिर्फ पुलिस द्वारा दिए गए कागजों को स्वीकार कर लेना पर्याप्त नहीं।
मजिस्ट्रेट को “हमने यह देखा, यह पाया, यह आवश्यकता है” जैसे ठोस आधार रिमांड आदेश में दर्ज करने होंगे।

(4) रिमांड आदेश एक न्यायिक आदेश है

इसका अर्थ है—
यह आदेश तर्कपूर्ण, कारणयुक्त और कानून के अनुरूप होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इसी धारा का विस्तृत अनुपालन बताते हुए कहा कि इसका उल्लंघन सीधे तौर पर न्यायिक त्रुटि माना जाएगा।


4. सुप्रीम कोर्ट का विस्तृत विश्लेषण—मजिस्ट्रेट की 5 प्रमुख जिम्मेदारियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय में मजिस्ट्रेट की न्यायिक भूमिका को 5 हिस्सों में बाँटा:


1. आरोपी को सुनना (Right of Hearing)

मजिस्ट्रेट आरोपी से अवश्य पूछे कि—

  • क्या उसे रिमांड पर कोई आपत्ति है?
  • क्या गिरफ्तारी की वैधता पर कोई प्रश्न है?
  • क्या उसे पुलिस द्वारा प्रताड़ित किया गया है?
  • क्या मेडिकल जांच की आवश्यकता है?

यह सुनवाई केवल औपचारिकता नहीं बल्कि एक संवैधानिक आवश्यकता है।


2. रिमांड के कारणों का विश्लेषण

पुलिस को यह साबित करना होगा कि रिमांड आवश्यक क्यों है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा—
“सिर्फ अपराध की गंभीरता रिमांड का आधार नहीं हो सकती।”

इसमें निम्न प्रश्नों पर विचार आवश्यक है—

  • क्या जांच में आरोपी की शारीरिक उपस्थिति आवश्यक है?
  • क्या पूछताछ में सहयोग नहीं किया गया?
  • क्या कोई सबूत जुटाने के लिए आरोपी की उपस्थिति आवश्यक है?

3. पुलिस द्वारा प्रस्तुत सामग्री का परीक्षण

पुलिस केस-डायरी, सबूत, इलेक्ट्रॉनिक डेटा, बयान आदि प्रस्तुत करती है।
मजिस्ट्रेट को यह देखना आवश्यक है कि—

  • क्या ये सामग्री विश्वसनीय है?
  • क्या रिमांड की मांग प्रामाणिक है या केवल “रूटीन” कार्यवाही है?

4. आरोपी की सुरक्षा और मौलिक अधिकारों की रक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि—

  • आरोपी को किसी भी प्रकार की यातना न दी जा सके,
  • उसकी चिकित्सा जाँच नियमित हो,
  • उसे अपने वकील से मिलने की अनुमति हो,
  • उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो।

5. कारणयुक्त आदेश (Reasoned Order) देना अनिवार्य

मजिस्ट्रेट को रिमांड देते समय लिखित कारण देने होते हैं:

  • क्यों रिमांड आवश्यक है?
  • कौन-से सबूत या तथ्य इसको समर्थन करते हैं?
  • कितने दिनों की रिमांड उचित है?

अगर यह सब नहीं दिया गया, तो आदेश कानूनी रूप से अस्थिर (unsustainable) माना जाएगा।


5. BNSS के युग में रिमांड: सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण प्रगतिशील दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला BNSS की मंशा (legislative intent) को स्पष्ट करता है, जो है—

“रिमांड को दुर्लभ और न्यायिक रूप से नियंत्रित प्रक्रिया बनाना।”

क्योंकि BNSS का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि—

  • पुलिस की मनमानी न हो,
  • व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान हो,
  • और जेलों में अनावश्यक भीड़ न बढ़े।

इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट को अत्यंत सतर्क रहना होगा।


6. सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा कि मजिस्ट्रेट ‘पोस्ट ऑफिस’ नहीं है?

कई बार यह देखा गया है कि—

  • पुलिस हर आरोपी को रूटीन तरीके से रिमांड के लिए प्रस्तुत करती है,
  • मजिस्ट्रेट भी बिना सवाल किए रिमांड दे देते हैं,
  • आरोपी से पूछने की भी औपचारिकता पूरी नहीं की जाती।

सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा—

“ऐसी प्रक्रिया न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।”

पोस्ट ऑफिस का अर्थ—

  • बिना सोचे समझे कागजों पर मुहर लगाना,
  • न्यायिक विवेक का उपयोग न करना,
  • आरोपी की स्वतंत्रता को महत्व न देना।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह न्यायिक पद की गरिमा और संविधान दोनों का अपमान है।


7. इस निर्णय का व्यापक प्रभाव—कानूनी जगत पर क्या असर पड़ेगा?

(1) मजिस्ट्रेट अधिक सतर्क होंगे

हर रिमांड आदेश अब विस्तृत कारणों के साथ पारित होगा।

(2) पुलिस को मजबूत सबूत पेश करने होंगे

रूटीन रिमांड माँगने की प्रवृत्ति कम होगी।

(3) आरोपी के अधिकार मजबूत होंगे

निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार और मेडिकल जाँच का अधिकार और मजबूत हो जाएगा।

(4) अनावश्यक पुलिस कस्टडी कम होगी

BNSS का उद्देश्य यही है कि जेल में भीड़ और कस्टडी का दुरुपयोग कम हो।

(5) न्यायिक जवाबदेही बढ़ेगी

रिमांड आदेशों की समीक्षा अब उच्च न्यायालयों में अधिक कठोरता से होगी।


8. निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट का निर्णय न्यायिक विवेक का नया मानक तय करता है

Mahir Rajesh Shah v. State of Maharashtra (2025) का यह फैसला BNSS की धारा 187 के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत बन गया है।

सुप्रीम कोर्ट का सबसे बड़ा संदेश है—

  • रिमांड एक सामान्य औपचारिकता नहीं है
  • यह एक न्यायिक प्रक्रिया है
  • मजिस्ट्रेट को पूर्ण विवेक, संवेदनशीलता और निष्पक्षता से निर्णय करना होगा
  • आरोपी के मौलिक अधिकार सर्वोपरि हैं
  • न्यायालय केवल पुलिस की औपचारिक मुहर नहीं है

यह फैसला न्यायिक स्वतंत्रता, पुलिस प्रक्रियाओं और आरोपी के संविधान प्रदत्त अधिकारों के बीच संतुलन का सबसे सुंदर उदाहरण है।