“BNSS धारा 38: गिरफ्तारी के समय आरोपी के अधिकार और अधिवक्ता से मिलने की संवैधानिक गारंटी”
भूमिका
भारत में किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को संविधान द्वारा अत्यधिक महत्व दिया गया है। अनुच्छेद 21 के तहत, प्रत्येक व्यक्ति को “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” का अधिकार प्राप्त है। यह अधिकार केवल न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार ही सीमित किया जा सकता है। जब किसी व्यक्ति को पुलिस गिरफ्तार करती है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि उसकी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के साथ-साथ उसे न्यायसंगत प्रक्रिया (fair procedure) का पूरा अवसर मिले।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita – BNSS), जो कि 2023 में पारित हुई और 2025 से लागू होने जा रही है, इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसकी धारा 38 (Section 38) आरोपी को एक अत्यंत महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान करती है — गिरफ्तारी और पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार।
धारा 38 का सटीक कानूनी प्रावधान
BNSS की धारा 38 में स्पष्ट कहा गया है:
“जब किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है और उससे पूछताछ की जाती है, तब उसे अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार होगा।”
यह धारा न केवल आरोपी को अपने अधिकारों की जानकारी देती है बल्कि उसे यह सुनिश्चित भी करती है कि पुलिस की पूछताछ के दौरान उसका कानूनी प्रतिनिधित्व बना रहे।
इसका उद्देश्य है — आरोपी को न्यायिक सुरक्षा प्रदान करना, ताकि किसी भी प्रकार की पुलिस की मनमानी, प्रताड़ना या अवैध पूछताछ से उसकी रक्षा की जा सके।
संविधान से संबंध
BNSS की धारा 38 को समझने के लिए इसे भारतीय संविधान से जोड़कर देखना आवश्यक है।
संविधान का अनुच्छेद 22(1) कहता है कि –
“किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने पर, उसे बिना वकील से सलाह लिए या अपने बचाव का अधिकार छीने बिना नहीं रखा जा सकता।”
अर्थात, संविधान पहले से ही यह गारंटी देता है कि किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को अधिवक्ता से परामर्श करने और न्यायिक सहायता प्राप्त करने का अधिकार है।
BNSS की धारा 38 इसी संवैधानिक भावना को लागू करने वाला ठोस प्रावधान है।
धारा 38 का उद्देश्य
इस प्रावधान का मूल उद्देश्य “न्याय की निष्पक्षता” (Fairness of Justice) को सुनिश्चित करना है।
जब किसी व्यक्ति को पुलिस हिरासत में रखा जाता है, तब कई बार दबाव, धमकी या जबरन बयान लेने जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे में अधिवक्ता की उपस्थिति आरोपी के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है।
धारा 38 के अंतर्गत आरोपी को न केवल कानूनी सहायता प्राप्त करने का अधिकार है बल्कि यह भी सुनिश्चित किया गया है कि पुलिस अधिकारी उसकी इस स्वतंत्रता में बाधा न डालें।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और न्यायिक व्याख्या
भारत में इस अधिकार का विकास न्यायालयों के कई महत्वपूर्ण निर्णयों से हुआ है।
(1) मनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) – इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता में “न्यायसंगत, उचित और तार्किक प्रक्रिया” का समावेश है।
(2) डी. के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) – इस ऐतिहासिक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी के दौरान पालन की जाने वाली दिशा-निर्देश (guidelines) निर्धारित कीं। इनमें यह भी कहा गया कि गिरफ्तार व्यक्ति को अधिवक्ता से मिलने और अपने परिवार को गिरफ्तारी की सूचना देने का अधिकार है।
इन निर्णयों के आधार पर अब BNSS की धारा 38 को विधिक रूप में लागू किया गया है, ताकि पुलिस और अभियोजन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जा सके।
व्यवहारिक पहलू (Practical Implementation)
धारा 38 के लागू होने के बाद पुलिस को निम्नलिखित बातों का पालन करना होगा:
- गिरफ्तारी के बाद जानकारी देना:
पुलिस अधिकारी को आरोपी को यह बताना अनिवार्य होगा कि उसे अधिवक्ता से मिलने का अधिकार प्राप्त है। - पूछताछ के दौरान अनुमति:
आरोपी जब चाहे, पूछताछ के दौरान अपने चुने हुए अधिवक्ता से परामर्श कर सकता है। - अधिवक्ता की उपस्थिति:
अधिवक्ता को पूछताछ कक्ष के भीतर या निकट उपस्थित रहने की अनुमति दी जा सकती है ताकि किसी प्रकार की जबरन स्वीकारोक्ति न ली जाए। - पुलिस द्वारा बाधा डालना अपराध होगा:
यदि पुलिस अधिकारी आरोपी को उसके वकील से मिलने से रोकता है, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन होगा बल्कि आरोपी के मौलिक अधिकार का भी हनन माना जाएगा।
आरोपी के लिए कानूनी लाभ
धारा 38 आरोपी को कई तरह से लाभ पहुँचाती है:
- यह सुनिश्चित करती है कि आरोपी के साथ मानवाधिकारों का उल्लंघन न हो।
- अधिवक्ता की सहायता से आरोपी अपने बचाव की रणनीति तैयार कर सकता है।
- यह पुलिस द्वारा झूठे साक्ष्य या दबाव में स्वीकारोक्ति जैसे मामलों को रोकता है।
- न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता और पारदर्शिता बनी रहती है।
अधिवक्ता की भूमिका
अधिवक्ता का कार्य केवल आरोपी की ओर से बहस करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि पुलिस प्रक्रिया के हर चरण में कानूनी प्रक्रिया का पालन हो।
वकील आरोपी को उसके अधिकारों की जानकारी देता है, जांच में अनुचित सवालों या दबाव से बचाता है, और यह सुनिश्चित करता है कि आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई मिले।
संबंधित अन्य धाराएँ
BNSS की अन्य धाराएँ भी आरोपी के अधिकारों को मजबूत बनाती हैं, जैसे:
- धारा 36: गिरफ्तारी के समय कारण बताने का अधिकार
- धारा 37: परिवार या मित्र को गिरफ्तारी की सूचना देने का अधिकार
- धारा 39: मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने का अधिकार
- धारा 38: अधिवक्ता से मिलने का अधिकार
इन सभी प्रावधानों का संयुक्त उद्देश्य है — आरोपी की गरिमा की रक्षा करना और न्यायिक प्रणाली को मानवीय बनाना।
मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से महत्व
संयुक्त राष्ट्र के “International Covenant on Civil and Political Rights (ICCPR)” के अनुच्छेद 14 में भी यह कहा गया है कि
“हर व्यक्ति को अपने बचाव के लिए विधिक सहायता प्राप्त करने का अधिकार होगा।”
भारत, इस संधि का सदस्य है, इसलिए BNSS धारा 38 का प्रावधान अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप है।
निष्कर्ष
BNSS की धारा 38 केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि एक मानव अधिकार की अभिव्यक्ति है। यह भारतीय न्याय प्रणाली को अधिक पारदर्शी, संवेदनशील और आधुनिक बनाती है।
किसी भी व्यक्ति को बिना अधिवक्ता की सहायता के पूछताछ का सामना करने के लिए मजबूर करना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
धारा 38 यह सुनिश्चित करती है कि हर आरोपी — चाहे वह गरीब हो या अमीर — अपने कानूनी अधिकारों की रक्षा कर सके और न्यायिक प्रक्रिया में भयमुक्त होकर भाग ले सके।
संक्षेप में कहा जाए तो –
- BNSS धारा 38 आरोपी को पूछताछ के दौरान अधिवक्ता से मिलने का अधिकार देती है।
- यह संविधान के अनुच्छेद 22 और 21 का व्यावहारिक रूप है।
- यह मानवाधिकार, न्याय और निष्पक्षता की दिशा में एक बड़ा सुधार है।
- यह सुनिश्चित करती है कि कानून के शासन (Rule of Law) के तहत हर व्यक्ति को समान न्याय मिले।