IndianLawNotes.com

BNS धारा 193 — अदालत में झूठा सबूत: जब वकील, गवाह या पक्षकार न्याय को गुमराह करें तो क़ानून क्यों होता है निर्मम

BNS धारा 193 — अदालत में झूठा सबूत: जब वकील, गवाह या पक्षकार न्याय को गुमराह करें तो क़ानून क्यों होता है निर्मम


भूमिका : न्याय की बुनियाद और सत्य का महत्व

       न्याय केवल फैसलों का नाम नहीं है, बल्कि यह सत्य, ईमानदारी और विश्वास पर टिकी एक पूरी प्रणाली है। अदालतें स्वयं घटनास्थल पर जाकर सच नहीं देखतीं, बल्कि वे गवाहों के बयान, दस्तावेज़ों और प्रस्तुत साक्ष्यों पर भरोसा करती हैं।
यदि यही साक्ष्य झूठे हों, तो न्याय व्यवस्था की आत्मा ही घायल हो जाती है।

      इसी गंभीर खतरे को ध्यान में रखते हुए भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) में धारा 193 को विशेष महत्व दिया गया है। यह धारा अदालत में जानबूझकर झूठा बयान देने या फर्जी सबूत पेश करने को गंभीर आपराधिक अपराध घोषित करती है।

क़ानून का संदेश बिल्कुल साफ़ है —
“न्याय से धोखा, बख़्शा नहीं जाएगा।”


भारतीय न्याय संहिता (BNS) और धारा 193 की पृष्ठभूमि

1 जुलाई 2024 से लागू हुई भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने औपनिवेशिक काल के IPC को प्रतिस्थापित किया।
BNS का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि:

  • न्याय प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना
  • झूठे मुकदमों और प्रक्रिया के दुरुपयोग पर रोक लगाना
  • पीड़ित और समाज दोनों का विश्वास बहाल करना

धारा 193 इसी सोच का प्रत्यक्ष उदाहरण है।


धारा 193 BNS क्या कहती है? (कानूनी स्वरूप)

यदि कोई व्यक्ति:

  • किसी न्यायालय में
  • किसी न्यायिक कार्यवाही में
  • या कानून द्वारा अधिकृत किसी जांच/प्रक्रिया में

जानबूझकर (Intentionally):

  • झूठा बयान देता है, या
  • ऐसा तथ्य प्रस्तुत करता है जिसे वह असत्य जानता है, या
  • फर्जी, मनगढ़ंत या जाली सबूत पेश करता है

तो वह BNS धारा 193 के अंतर्गत अपराधी होगा।


धारा 193 के आवश्यक तत्व (Ingredients of Offence)

किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए निम्न तत्वों का होना आवश्यक है:

  1. न्यायिक कार्यवाही का अस्तित्व
  2. बयान या साक्ष्य का प्रस्तुत किया जाना
  3. बयान/साक्ष्य का असत्य होना
  4. आरोपी को उसके झूठे होने का ज्ञान होना
  5. जानबूझकर अदालत को गुमराह करने की मंशा

इन तत्वों में से कोई भी अनुपस्थित होने पर धारा 193 लागू नहीं होगी।


क्या वकील भी धारा 193 के दायरे में आते हैं?

बिल्कुल आते हैं

अक्सर यह भ्रांति रहती है कि वकील केवल मुवक्किल की बात रखते हैं, इसलिए उन पर आपराधिक दायित्व नहीं बनता। यह धारणा पूरी तरह गलत है।

यदि कोई वकील:

  • जानते हुए झूठा तथ्य अदालत में रखता है
  • फर्जी दस्तावेज़ दाखिल करता है
  • झूठा गवाह खड़ा करता है
  • साक्ष्य से छेड़छाड़ करता है

तो वह:

  1. धारा 193 BNS के तहत अपराधी, और
  2. Bar Council Rules के तहत पेशेगत कदाचार का दोषी होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है:

“An advocate is not a mouthpiece of falsehood;
he is an officer of the Court.”


धारा 193 के तहत सज़ा (Punishment)

कानूनी दंड

  • 7 वर्ष तक का कारावास, और
  • जुर्माना

यदि झूठा साक्ष्य:

  • किसी गंभीर आपराधिक मुकदमे में दिया गया हो
  • या किसी निर्दोष को फँसाने के उद्देश्य से हो

तो अदालत कठोरतम सज़ा देने से पीछे नहीं हटती।


Mens Rea (आपराधिक मंशा) की निर्णायक भूमिका

धारा 193 में सबसे अहम शब्द है — “जानबूझकर”

इसका अर्थ यह है कि:

  • साधारण भूल
  • याददाश्त की गलती
  • दस्तावेज़ी त्रुटि

इस धारा के अंतर्गत अपराध नहीं बनती।

लेकिन यदि यह सिद्ध हो जाए कि:

  • व्यक्ति सत्य जानता था
  • फिर भी उसने असत्य को सच की तरह पेश किया

तो अपराध पूर्ण माना जाएगा।


झूठा सबूत: केवल झूठ बोलना ही नहीं

धारा 193 का दायरा बहुत व्यापक है। इसमें शामिल हो सकता है:

  • जाली दस्तावेज़
  • झूठी एफिडेविट
  • फर्जी मेडिकल रिपोर्ट
  • मनगढ़ंत संपत्ति दस्तावेज़
  • नकली कॉल रिकॉर्ड
  • एडिटेड ऑडियो/वीडियो
  • झूठी डिजिटल चैट्स
  • तथ्यों को जानबूझकर छिपाना

आज के डिजिटल युग में इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की हेराफेरी भी गंभीर चिंता का विषय है।


डिजिटल युग और धारा 193

आज:

  • AI जनरेटेड वीडियो
  • Deepfake ऑडियो
  • फर्जी स्क्रीनशॉट

यदि इन्हें अदालत में जानबूझकर पेश किया जाए, तो:

  • BNS धारा 193
  • साथ ही आईटी अधिनियम की धाराएँ भी लागू हो सकती हैं।

न्यायालयों का सख़्त दृष्टिकोण

भारतीय न्यायपालिका ने बार-बार कहा है:

“False evidence is worse than the crime itself.”

अदालतों के अनुसार:

  • झूठा साक्ष्य केवल एक पक्ष को नहीं
  • बल्कि पूरी न्याय प्रक्रिया को प्रदूषित करता है।

इसीलिए कई मामलों में अदालतें:

  • झूठा बयान देने वाले गवाहों के विरुद्ध
  • अलग से आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का आदेश देती हैं।

झूठे मुकदमों की समस्या और धारा 193

आज न्यायालयों में:

  • झूठे 498A केस
  • मनगढ़ंत दीवानी विवाद
  • फर्जी दस्तावेज़ों पर आधारित मुकदमे

एक बड़ी समस्या बन चुके हैं।

धारा 193 का उद्देश्य:

  • अदालतों का समय बचाना
  • निर्दोषों को उत्पीड़न से बचाना
  • न्याय व्यवस्था की साख बनाए रखना

संवैधानिक और नैतिक आधार

झूठा सबूत देना:

  • अनुच्छेद 21 (न्यायसंगत प्रक्रिया) का उल्लंघन है
  • Rule of Law के मूल सिद्धांत के विरुद्ध है

न्याय केवल विधिक नहीं, बल्कि नैतिक अवधारणा भी है।


गवाहों की जिम्मेदारी

गवाह अक्सर यह सोचते हैं कि:

  • “थोड़ा बहुत झूठ बोलने से क्या होगा?”

लेकिन अदालत की नज़र में:

  • गवाह का झूठ
  • पूरी केस की दिशा बदल सकता है।

इसलिए गवाहों के लिए भी धारा 193 एक कड़ी चेतावनी है।


आम नागरिक के लिए संदेश

यदि आप:

  • गवाह हैं
  • पक्षकार हैं
  • या किसी मामले में दस्तावेज़ दे रहे हैं

तो याद रखें:

अदालत में दिया गया हर झूठ,
आपको जेल की ओर ले जा सकता है।


निष्कर्ष : न्याय के मंदिर में झूठ का प्रवेश वर्जित

BNS धारा 193 का सार यही है कि:

  • न्यायालय को गुमराह करना
  • झूठा सबूत गढ़ना
  • सत्य को दबाना

 ये सभी गंभीर आपराधिक कृत्य हैं।

क़ानून का उद्देश्य:

  • बदला लेना नहीं
  • बल्कि न्याय की रक्षा करना है।

अंतिम शब्द

न्याय व्यवस्था की मजबूती:

  • कानून की किताबों से नहीं
  • बल्कि सत्यनिष्ठ आचरण से आती है।

धारा 193 स्पष्ट करती है —
न्याय से धोखा देने वालों के लिए
क़ानून कभी नरम नहीं होगा।