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BNS और BNSS : भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में ऐतिहासिक परिवर्तन का संवैधानिक एवं व्यावहारिक विश्लेषण

BNS और BNSS : भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में ऐतिहासिक परिवर्तन का संवैधानिक एवं व्यावहारिक विश्लेषण

प्रस्तावना : औपनिवेशिक कानूनों से न्यायोन्मुख व्यवस्था की ओर

भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली लगभग डेढ़ सौ वर्षों तक औपनिवेशिक काल में निर्मित कानूनों पर आधारित रही। भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) ने लंबे समय तक अपराध और दंड तथा उसकी प्रक्रिया को नियंत्रित किया। यद्यपि इन कानूनों में समय-समय पर संशोधन किए गए, फिर भी उनका मूल ढांचा औपनिवेशिक सोच से मुक्त नहीं हो सका।

इसी पृष्ठभूमि में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) का अधिनियमन केवल कानूनों का प्रतिस्थापन नहीं है, बल्कि यह भारतीय आपराधिक न्याय दर्शन में एक मौलिक परिवर्तन का संकेत देता है। यह परिवर्तन दंड-केंद्रित प्रणाली से न्याय, पीड़ित-केन्द्रिता और उत्तरदायित्व-आधारित व्यवस्था की ओर अग्रसर है।


BNS और BNSS : एक समग्र दृष्टि

सरल शब्दों में कहा जाए तो—

  • BNS यह निर्धारित करता है कि अपराध क्या है और उसकी सजा क्या होगी
  • BNSS यह बताता है कि उस अपराध की जांच, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया कैसे चलेगी

दोनों संहिताएँ एक-दूसरे की पूरक हैं और मिलकर भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था की रीढ़ बनाती हैं।


भाग – I

भारतीय न्याय संहिता (BNS) : अपराध और दंड की नई परिभाषा

1. BNS का मौलिक स्वरूप

भारतीय न्याय संहिता एक Substantive Law है। इसका मुख्य उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि समाज में कौन-से कृत्य अपराध माने जाएंगे और उनके लिए राज्य किस प्रकार का दंड देगा।

BNS ने IPC की 511 धाराओं को समेटकर लगभग 358 धाराओं में पुनर्गठित किया है। यह केवल संख्या में कमी नहीं है, बल्कि अनावश्यक, अप्रासंगिक और औपनिवेशिक अवधारणाओं को हटाकर कानून को अधिक स्पष्ट और तार्किक बनाया गया है।


2. औपनिवेशिक चिन्हों का उन्मूलन

IPC में “राजद्रोह”, “महामहिम की सरकार”, “ब्रिटिश क्राउन” जैसी अवधारणाएँ थीं, जो स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक ढांचे से मेल नहीं खाती थीं। BNS में—

  • राजद्रोह की पुरानी धारा को हटाकर
  • राष्ट्र की एकता, संप्रभुता और अखंडता के विरुद्ध अपराध की नई परिभाषा दी गई है

यह परिवर्तन राज्य-विरोध और सरकार-विरोध के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करता है।


3. नए अपराध और सामाजिक यथार्थ

BNS आधुनिक सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर कई नए अपराधों को सम्मिलित करता है, जैसे—

  • मॉब लिंचिंग : सामूहिक हिंसा को अलग और गंभीर अपराध के रूप में मान्यता
  • संगठित अपराध और आतंक से जुड़े आर्थिक अपराध
  • महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों की अधिक स्पष्ट और कठोर परिभाषाएँ

यह दर्शाता है कि कानून अब केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का दर्पण भी है।


4. दंड की नई अवधारणा : सुधार और पुनर्वास

BNS का सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक परिवर्तन है—
दंड का उद्देश्य केवल प्रतिशोध नहीं, बल्कि सुधार होना चाहिए।

इसी सोच के तहत—

  • सामुदायिक सेवा (Community Service) को दंड के रूप में शामिल किया गया
  • छोटे अपराधों में कारावास के स्थान पर सामाजिक उत्तरदायित्व पर जोर
  • अपराधी को समाज से काटने के बजाय समाज में सुधार के साथ पुनः जोड़ने का प्रयास

यह दृष्टिकोण भारतीय संविधान के मानवीय गरिमा और सुधारात्मक न्याय के सिद्धांत से मेल खाता है।


भाग – II

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) : प्रक्रिया के माध्यम से न्याय

1. BNSS का स्वरूप

BNSS एक Procedural Law है। यदि BNS “क्या” बताता है, तो BNSS “कैसे” बताता है।

यह संहिता—

  • पुलिस की शक्तियों और सीमाओं
  • अभियोजन प्रक्रिया
  • न्यायालय की कार्यवाही
  • अभियुक्त और पीड़ित के अधिकार

सभी को एक संतुलित ढांचे में स्थापित करती है।


2. Zero FIR : पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण

BNSS का एक अत्यंत क्रांतिकारी प्रावधान है Zero FIR

इसके अंतर्गत—

  • कोई भी व्यक्ति किसी भी थाने में FIR दर्ज करा सकता है
  • क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) अब बाधा नहीं रहेगा
  • विशेष रूप से महिलाओं और संवेदनशील मामलों में यह प्रावधान न्याय तक पहुंच को सरल बनाता है

यह परिवर्तन पुलिस-केंद्रित व्यवस्था से पीड़ित-केंद्रित व्यवस्था की ओर संकेत करता है।


3. तकनीक और डिजिटल न्याय

BNSS ने पहली बार प्रक्रिया में तकनीक को केंद्रीय स्थान दिया है—

  • FIR, बयान और साक्ष्य का डिजिटल रिकॉर्ड
  • तलाशी और गिरफ्तारी की वीडियो रिकॉर्डिंग
  • डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को विधिक मान्यता

इसका उद्देश्य पारदर्शिता, जवाबदेही और मनमानी पर रोक लगाना है।


4. समय-सीमा और न्याय में गति

BNSS की एक प्रमुख आलोचना यह रही है कि पुरानी प्रक्रिया में न्याय अत्यधिक विलंबित हो जाता था। इसे सुधारने के लिए—

  • जांच के लिए निश्चित समय-सीमा
  • चार्जशीट दाखिल करने की बाध्यता
  • मजिस्ट्रेट और सेशन कोर्ट की भूमिका में स्पष्टता

इससे “Justice Delayed is Justice Denied” की अवधारणा को व्यवहारिक रूप देने का प्रयास किया गया है।


5. गिरफ्तारी : अधिकार और संतुलन

BNSS ने गिरफ्तारी को अब अंतिम उपाय के रूप में प्रस्तुत किया है—

  • अनावश्यक गिरफ्तारी पर रोक
  • कारणों का लिखित रिकॉर्ड
  • अभियुक्त के मौलिक अधिकारों की रक्षा

यह पुलिस शक्ति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करता है।


भाग – III

BNS और BNSS का संयुक्त प्रभाव : न्याय की नई संरचना

BNS और BNSS को अलग-अलग समझना अधूरा होगा। वास्तविक परिवर्तन इन दोनों के संयुक्त संचालन से उत्पन्न होता है।

  • BNS अपराध को परिभाषित करता है
  • BNSS यह सुनिश्चित करता है कि उस पर कार्रवाई न्यायपूर्ण, पारदर्शी और समयबद्ध हो

यह व्यवस्था केवल अपराधी को दंडित करने तक सीमित नहीं, बल्कि—

  • पीड़ित को सम्मान
  • अभियुक्त को निष्पक्ष प्रक्रिया
  • समाज को सुरक्षा

प्रदान करने की दिशा में कार्य करती है।


आलोचनात्मक दृष्टि : चुनौतियाँ और संभावनाएँ

यद्यपि ये संहिताएँ प्रगतिशील हैं, फिर भी कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ बनी रहेंगी—

  • पुलिस और न्यायपालिका का प्रशिक्षण
  • तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता
  • ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में कार्यान्वयन

लेकिन यदि इन्हें संवैधानिक भावना के अनुरूप लागू किया जाए, तो यह सुधार भारतीय न्याय इतिहास में मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है।


निष्कर्ष : दंड से न्याय की ओर

भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता केवल नए कानून नहीं हैं। ये—

  • औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति
  • संविधान-केंद्रित न्याय
  • मानव गरिमा और उत्तरदायित्व

की ओर एक सशक्त कदम हैं।

संक्षेप में—

BNS अपराध को परिभाषित करता है,
BNSS न्याय को संभव बनाता है।

यदि इन्हें सही भावना, प्रशिक्षण और ईमानदारी से लागू किया गया, तो भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था वास्तव में न्याय के करीब पहुंचेगी, न कि केवल दंड के।