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बिजली चोरी मामलों में लोक अदालत का अधिकार क्षेत्र नहीं: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय | Lok Adalat & Electricity Theft Cases

बिजली चोरी मामलों में लोक अदालत का अधिकार क्षेत्र नहीं: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय | Lok Adalat & Electricity Theft Cases | 

          भारत में न्यायिक प्रणाली लगातार बढ़ते मुकदमों के बोझ से जूझ रही है। इस भार को कम करने तथा जनता को तेजी से न्याय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लोक अदालत जैसी वैकल्पिक विवाद समाधान संस्थाओं की स्थापना की गई। लोक अदालत सामान्यत: समझौते पर आधारित मंच है, जहाँ पक्षकार पारस्परिक सहमति से अपने विवादों का निपटारा करते हैं। परंतु प्रश्न यह उठता है कि—क्या लोक अदालत को हर प्रकार के मामलों को सुनने और निर्णय देने का अधिकार है? विशेषकर, बिजली चोरी (Electricity Theft) जैसे दंडनीय अपराधों को क्या लोक अदालत में निपटाया जा सकता है?

इसी प्रश्न पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि: लोक अदालत को स्थायी अधिकारिता (Permanent Jurisdiction) प्राप्त नहीं होती, और बिजली चोरी के मामलों में लोक अदालत का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।

      यह निर्णय न केवल न्यायिक सिद्धांतों को स्पष्ट करता है, बल्कि लोक अदालत की सीमाओं और वास्तविक उद्देश्य को भी रेखांकित करता है। यह लेख इसी निर्णय का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।


पृष्ठभूमि: मामला क्या था?

       मामले की परिस्थितियों में, बिजली वितरण निगम ने उपभोक्ता के खिलाफ बिजली चोरी, अवैध कनेक्शन तथा चोरी के माध्यम से उपयोग किए गए बिजली बिलों की वसूली के लिए कार्यवाही शुरू की। विवाद को बाद में लोक अदालत में भेज दिया गया, जहाँ कथित रूप से पक्षकारों के बीच “समझौता” होने के आधार पर निर्णय पारित किया गया।

परंतु उपभोक्ता पक्ष ने यह कहते हुए चुनौती दी कि—

अगर बिजली चोरी दंडनीय अपराध है, तो उसकी सुनवाई लोक अदालत में कैसे हो सकती है?

इसके अलावा, यह भी तर्क दिया गया कि:

  • लोक अदालत केवल उन्हीं मामलों का निर्णय कर सकती है जहाँ दोनों पक्षकार स्वेच्छा से समझौता करने पर सहमत हों।
  • बिजली चोरी का मामला विशेष अधिनियम (Electricity Act, 2003) के तहत दंडित अपराध है, इसलिए इसे केवल विशेष न्यायालय ही सुन सकता है।
  • लोक अदालत का कार्य “निर्णय देना” नहीं, बल्कि “समझौता करवाना” है।

इन्हीं विवादों और प्रश्नों पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने गहन विचार करते हुए अपना निर्णय दिया।


मुद्दा (Issues): न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न

  1. क्या लोक अदालत को बिजली चोरी के मामलों में सुनवाई और निर्णय देने का अधिकार है?
  2. क्या लोक अदालत को स्थायी अधिकारिता (Permanent Jurisdiction) प्राप्त है?
  3. क्या लोक अदालत दंडनीय अपराधों में निर्णय कर सकती है?
  4. क्या लोक अदालत विद्युत अधिनियम, 2003 के तहत आरोपित मामलों में सक्षम कोर्ट की तरह कार्य कर सकती है?

लोक अदालत का स्वरूप और अधिकारिता: न्यायालय का विश्लेषण

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि—

लोक अदालत कोई स्वतंत्र न्यायालय नहीं है।

लोक अदालत का स्वरूप निम्नानुसार है:

1. समझौते पर आधारित न्यायालय (Conciliatory Forum)

लोक अदालत का मुख्य उद्देश्य पक्षकारों के बीच समझौता करवाना है।

यह adjudicatory नहीं बल्कि consensual प्रक्रिया है।

2. कोई स्थायी अधिकारिता नहीं (No Permanent Jurisdiction)

लोक अदालत को किसी विशेष विषय, अपराध या विवाद पर स्थायी अधिकार नहीं होता।

वह केवल वही विवाद सुनती है जो—

  • अदालत द्वारा संदर्भित किए जाएँ, या
  • पक्षकार स्वयं आवेदन देकर प्रस्तुत करें, और
  • जो समझौते योग्य हों (Compoundable or Civil Nature)

3. दंडनीय अपराधों में लोक अदालत का कोई अधिकार नहीं

न्यायालय ने कहा—

बिजली चोरी एक अपराध (Offence) है, मात्र सिविल विवाद नहीं।

Electricity Act, 2003 की धारा 135, 138 आदि के तहत बिजली चोरी एक गंभीर दंडनीय अपराध है।

लोक अदालत—

  • अपराधों में सुनवाई नहीं कर सकती
  • दोषसिद्धि या दंड के संबंध में कोई आदेश नहीं दे सकती
  • आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) के अनुसार Trial Court का विकल्प नहीं हो सकती

 बिजली अधिनियम (Electricity Act, 2003) के तहत विशेष न्यायालय

Electricity Act, 2003 की धारा 153 के तहत स्पष्ट है—

राज्य सरकार “विशेष न्यायालय” (Special Courts) का गठन करेगी, जो बिजली चोरी मामलों की सुनवाई करेंगे।

इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं:

  • संसद की मंशा यह थी कि बिजली चोरी जैसे अपराधों की सुनवाई विशेष कौशल रखने वाले न्यायालय करें।
  • इस प्रकार के मामलों को सामान्य या वैकल्पिक मंचों पर नहीं भेजा जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा—

जब विशेष कानून द्वारा विशेष न्यायालय निर्धारित हो चुका है, तो लोक अदालत का हस्तक्षेप असंवैधानिक और अवैध है।


न्यायालय का महत्वपूर्ण अवलोकन (Key Observations)

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कुछ महत्वपूर्ण अवलोकन किए—

1. समझौता तभी मान्य है जब दोनों पक्ष स्वेच्छा से तैयार हों।

यदि दबाव, गलत जानकारी या अवैध मंच पर समझौता हो जाए, तो वह कानूनी मान्यता नहीं रखता

2. लोक अदालत के निर्णय को डिक्री माना जा सकता है, परंतु केवल सिविल विवादों में।

3. अपराधों में कोई समझौता नहीं हो सकता जब तक कानून स्वयं उसे Compoundable न करे।

बिजली चोरी Compoundable offence नहीं है।

4. लोक अदालत को कोई न्यायिक विवेचना (Judicial Determination) करने का अधिकार नहीं।

इसलिए:

  • साक्ष्य नहीं ले सकती
  • दोषनिर्धारण नहीं कर सकती
  • अपराध सिद्ध या असिद्ध घोषित नहीं कर सकती

हाईकोर्ट का फैसला: लोक अदालत का आदेश रद्द (Order Set Aside)

न्यायालय ने कहा—

लोक अदालत बिजली चोरी के मामले नहीं सुन सकती।

अतः लोक अदालत द्वारा पास किया गया समझौता/निर्णय:

  • असंवैधानिक,
  • कानून विरुद्ध,
  • अधिकार क्षेत्र से परे (Without Jurisdiction) घोषित किया गया।

नतीजतन, हाईकोर्ट ने लोक अदालत के आदेश को पूरी तरह से निरस्त (quash) कर दिया

इसके साथ ही मामले को उचित न्यायिक प्राधिकारी—यानी विशेष न्यायालय—को भेजने का आदेश दिया।


निर्णय का महत्व (Significance of Judgment)

यह निर्णय भारत की पूरी न्यायिक प्रणाली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इसके कई प्रभाव सामने आते हैं:


1. लोक अदालत की सीमाएँ स्पष्ट

लोक अदालत:

  • केवल सिविल और समझौताकीय मामलों तक सीमित रहेगी
  • अपराधों या दंडनीय कार्यवाहियों में हस्तक्षेप नहीं करेगी

यह Access to Justice और Rule of Law दोनों की रक्षा करता है।


2. बिजली चोरी से जुड़े मामलों में पारदर्शिता बढ़ेगी

बिजली चोरी देश में एक बड़ी समस्या है। कई बार इस तरह के मामले:

  • राजनीतिक प्रभाव
  • दबाव
  • गलत समझौते

के कारण खत्म कर दिए जाते थे।

अब हाईकोर्ट के अनुसार:

ऐसे मामलों का निपटारा केवल विशेष न्यायालय ही करेंगे।


3. कानूनी प्रक्रियाओं का अनुपालन होगा

Electricity Act, 2003 की मंशा और उद्देश्य की रक्षा होगी।
विशेष न्यायालय की प्रणाली मजबूत होगी।


4. लोक अदालत का दुरुपयोग रुकेगा

कई मामलों में बिजली कंपनियाँ भी ऐसे मंचों का उपयोग करके उपभोक्ताओं पर दबाव बनाती थीं।
अब ऐसा नहीं हो सकेगा।


लोक अदालत और बिजली चोरी: तुलनात्मक विश्लेषण

विषय लोक अदालत बिजली चोरी मामले
स्वरूप समझौता मंच दंडनीय अपराध
अधिकारिता सीमित, सिविल विशेष न्यायालय
निर्णय समझौते पर आधारित साक्ष्य व ट्रायल आधारित
प्रमाण आवश्यक नहीं पूर्ण ट्रायल आवश्यक
परिणाम Compromise Award Conviction/Acquittal
उद्देश्य शांतिपूर्ण समाधान कानून-व्यवस्था व दंड

स्पष्ट है कि दोनों पूरी तरह अलग प्रकृति के मंच और प्रक्रिया हैं।


लोक अदालत की कानूनी स्थिति: प्रासंगिक कानून

1. Legal Services Authorities Act, 1987
धारा 19, 20, 21 लोक अदालत की संरचना एवं अधिकार स्पष्ट करती है।

2. Electricity Act, 2003
धारा 135: बिजली चोरी
धारा 153: विशेष न्यायालय
धारा 151: संज्ञान
धारा 154: ट्रायल प्रक्रिया

इन दोनों कानूनों के बीच स्पष्ट विभाजन है—
जहाँ अपराध है, वहाँ लोक अदालत नहीं है।


निष्कर्ष (Conclusion)

       पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का यह निर्णय न केवल विधिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि न्यायिक सिद्धांतों की भी रक्षा करता है। लोक अदालत का मूल उद्देश्य अदालतों का बोझ कम करना और नागरिक विवादों का सौहार्दपूर्ण निपटारा करना है, न कि दंडनीय अपराधों में निर्णय देना।

बिजली चोरी एक गंभीर अपराध है और उसका निपटारा केवल विशेष न्यायालय ही कर सकते हैं।

इस निर्णय ने—

  • लोक अदालत की सीमाएँ
  • बिजली चोरी के अपराध की गंभीरता
  • अदालतों के अधिकार क्षेत्र

को स्पष्ट कर दिया है।

यह निर्णय कानून की उचित व्याख्या, न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता और न्यायिक संस्थाओं के अधिकारों की रक्षा करता है।