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चालक की पहचान संदिग्ध, न TIP, न विश्वसनीय गवाह; दो एकड़ दूर से देखने का दावा अविश्वसनीय—पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

“चालक की पहचान संदिग्ध, न TIP, न विश्वसनीय गवाह; दो एकड़ दूर से देखने का दावा अविश्वसनीय—पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने S.304A IPC / S.106 BNS के तहत आरोपी को किया बाइज्ज़त बरी”

      तेज़ एवं लापरवाह ड्राइविंग (Rash and Negligent Driving) के आरोप से जुड़े मुकदमे भारतीय न्याय प्रणाली में अत्यंत सामान्य होते हैं, परंतु इन मामलों में दोषसिद्धि तभी संभव है, जब अभियोजन यह सुनिश्चित रूप से साबित करे कि दुर्घटना के समय वाहन कौन चला रहा था, और उसने लापरवाही बरती। इसी सिद्धांत को मजबूती प्रदान करते हुए, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि—

“जब चालक की पहचान ही संदेह से परे सिद्ध न हो, Test Identification Parade (TIP) न कराई गई हो, और कथित प्रत्यक्षदर्शी घटना से लगभग दो एकड़ दूर काम कर रहे हों, तो किसी भी अभियुक्त को धारा 304A IPC या धारा 106 BNS के अंतर्गत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”

        इस फैसले ने न केवल अभियोजन की जांच-पद्धति पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाया है, बल्कि यह भी स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामलों में अनुमान (Presumption) को प्रमाण (Proof) का स्थान नहीं दिया जा सकता।


1. केस की पृष्ठभूमि : दुर्घटना, FIR और आरोप

अभियोजन के अनुसार:

  • आरोपी एक ट्रैक्टर/वाहन चला रहा था।
  • वाहन तेज़ गति और लापरवाही से चलाया गया।
  • इससे एक व्यक्ति की मौत हो गई।
  • ग्रामीणों ने दुर्घटना के बाद आरोपी को वाहन के पास देखा।

FIR दर्ज हुई, और पुलिस ने आरोपी को S.304A IPC (अब BNS की धारा 106) के तहत आरोपित कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने अनुमान और परिस्थितियों के आधार पर उसे दोषी माना।

लेकिन आरोपी ने निर्णय को Punjab & Haryana High Court में चुनौती दी।


2. हाईकोर्ट में मुख्य मुद्दे

अपील में अदालत के सामने 3 मूल प्रश्न थे:

(i) क्या दुर्घटना के समय वाहन चला रहा व्यक्ति आरोपी ही था?

(ii) क्या गवाहों की गवाही विश्वसनीय है?

(iii) क्या अभियोजन ने लापरवाही साबित की?

इन तीनों प्रश्नों की जांच ने पूरे केस को उलट दिया।


3. Test Identification Parade (TIP) न कराना—अभियोजन के लिए सबसे बड़ा झटका

अदालत ने कहा कि जब:

  • गवाहों ने आरोपी को पहले कभी नहीं देखा था,
  • उन्होंने दुर्घटना को प्रत्यक्ष नहीं देखा,
  • उन्होंने चालक को दूर से देखने का दावा किया,

तो कानूनन यह आवश्यक था कि TIP कराई जाती, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि गवाह बाद में आरोपी की पहचान कर सकते हैं।

लेकिन पुलिस ने TIP कराने की ज़रूरत ही नहीं समझी।

अदालत की कठोर टिप्पणी:

“जब गवाह पहले कभी आरोपी से परिचित नहीं थे, और उनकी पहचान दुर्घटना के बाद की परिस्थितियों पर आधारित है, TIP का न कराया जाना अभियोजन की बड़ी विफलता है।”

सुप्रीम कोर्ट के फैसले Kanan v. State of Kerala और Tahilram Ishardas v. State of Punjab का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि:

  • TIP गवाह की विश्वसनीयता बढ़ाने का वैज्ञानिक तरीका है।
  • TIP का अभाव अभियोजन को संदेह के घेरे में डाल देता है।

4. दो एकड़ दूर से देखने का दावा—क्यों माना गया अविश्वसनीय?

मामले के दो कथित प्रत्यक्षदर्शी गवाहों ने दावा किया कि उन्होंने दुर्घटना को दो एकड़ दूर से देखा।

एक एकड़ = लगभग 4000 वर्गमीटर
दो एकड़ की दूरी से:

  • किसी वाहन के चालक को पहचानना लगभग असंभव,
  • चेहरे की पहचान तो बिल्कुल असंभव,
  • वाहन की गति का सही अनुमान भी कठिन।

अदालत ने कहा:

“मानवीय दृष्टि क्षमता के सामान्य मानक के अनुसार, दो एकड़ की दूरी से किसी विशेष व्यक्ति को वाहन चलाते पहचानना संभव नहीं। ऐसी गवाही स्वभावतः संदिग्ध है।”

इसके अतिरिक्त, दोनों गवाहों की गवाही में महत्वपूर्ण विरोधाभास भी सामने आए:

  • किस दिशा से वाहन आया,
  • किस समय दुर्घटना हुई,
  • वे खेत से कितनी दूरी पर थे,
  • उन्होंने पहले क्या देखा—ये सभी बातें मेल नहीं खातीं।

5. प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही क्यों अविश्वसनीय और संदेहपूर्ण मानी गई?

हाईकोर्ट ने विस्तार से बताया कि गवाहों की गवाही निम्न कारणों से स्वीकार्य नहीं हो सकती:

(i) दुर्घटना प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखी गई

गवाह घटनास्थल पर दुर्घटना होने के बाद पहुँचे।

(ii) गवाहों ने बताया कि वे अपने खेतों में व्यस्त थे

इससे यह प्रश्न पैदा हुआ कि:

  • क्या उन्होंने ध्वनि सुनी?
  • क्या उन्होंने वास्तविक टक्कर देखी?
  • या वे केवल दुर्घटना के बाद पहुँचे?

(iii) गवाह विरोधाभासी बयान दे रहे थे

किसी ने कहा वाहन रुका था,
किसी ने कहा वाहन भाग गया।

(iv) पुलिस ने स्वतंत्र गवाह नहीं तलाशे

घटना गांव में हुई थी,
जहाँ स्वाभाविक रूप से कई स्वतंत्र गवाह उपलब्ध होते हैं।
पुलिस किसी को कोर्ट नहीं लाई।


6. चालक की पहचान—आपराधिक मुकदमे का सबसे अनिवार्य तत्व

अदालत ने कहा:

जब आपराधिक आरोप लगे हों, सबसे पहला तत्व है—“कौन था अपराधी?”

लापरवाही (negligence) या तेज़ गति (rashness) साबित करने से पहले यह साबित करना अनिवार्य है कि:

  • वाहन चला कौन रहा था।
  • वही व्यक्ति दुर्घटना के लिए उत्तरदायी है।

लेकिन यहाँ:

  • वाहन मालिकाना का रिकॉर्ड अस्पष्ट,
  • वाहन कौन चला रहा था—कोई प्रमाण नहीं,
  • कोई फोटोग्राफिक पहचान नहीं,
  • कोई CCTV नहीं,
  • कोई स्वतंत्र गवाह नहीं।

अदालत ने कहा—

“यदि चालक की पहचान ही संदेहपूर्ण है, तो आगे किसी भी चर्चा का कोई अर्थ नहीं बचता। अभियोजन का पूरा केस स्वतः ढह जाता है।”


7. धारा 304A IPC / धारा 106 BNS के लिए कानूनी कसौटी

इन धाराओं के लिए अभियोजन को चार तत्व साबित करने पड़ते हैं:

  1. मृत्यु हुई।
  2. यह दुर्घटना वाहन से हुई।
  3. चालक ने लापरवाही बरती।
  4. दुर्घटना के समय वाहन चला रहा व्यक्ति आरोपी था।

यहाँ चौथा तत्व पूरी तरह असिद्ध रहा, और तीसरा भी संदेहपूर्ण था।

इसलिए अदालत ने कहा:

“अपराध सिद्ध नहीं हुआ।”


8. लापरवाही (Negligence) साबित करना अभियोजन की ज़िम्मेदारी

अदालत ने पाया कि:

  • कोई वैज्ञानिक रिपोर्ट नहीं,
  • न गति का विश्लेषण,
  • न skid marks की जाँच,
  • न वाहन की स्थिति की फोटो,
  • न FSL रिपोर्ट,
  • न इंजीनियरिंग विशेषज्ञ की राय।

केवल इतना कहना कि:

“वाहन तेज़ था”

कानून में लापरवाही साबित नहीं करता।
यह मात्र सामान्य आरोप है।


9. जाँच में गंभीर कमियाँ: कोर्ट की तीखी आलोचना

High Court ने कहा कि पुलिस ने:

1. वैज्ञानिक जांच नहीं की

2. TIP नहीं कराई

3. घटनास्थल का सही पंचायतनामा तैयार नहीं किया

4. आरोपी की पहचान को पुख्ता नहीं किया

5. स्वतंत्र गवाह शामिल नहीं किए

6. दस्तावेजी साक्ष्य ठीक से प्रस्तुत नहीं किए

इसके परिणामस्वरूप अभियोजन की विश्वसनीयता गंभीर रूप से कमजोर हो गई।


10. “संदेह का लाभ” (Benefit of Doubt) का सिद्धांत कैसे लागू हुआ?

आपाराधिक कानून में सिद्धांत है:

“यदि दो व्याख्याएं संभव हों—एक अभियुक्त के पक्ष में, एक विपक्ष में—तो वह व्याख्या अपनाई जाएगी जो उसके पक्ष में हो।”

यहाँ:

  • चालक की पहचान संदिग्ध,
  • गवाह अविश्वसनीय,
  • TIP नहीं,
  • वैज्ञानिक प्रमाण नहीं,
  • जाँच अपूर्ण।

इन सभी कारणों से अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ दिया।


11. Punjab & Haryana High Court का अंतिम निर्णय

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा—

✔ अभियोजन चालक की पहचान सिद्ध नहीं कर सका

✔ प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही भरोसे योग्य नहीं

✔ TIP का न होना गंभीर खामी

✔ दुर्घटना की परिस्थितियाँ स्पष्ट नहीं

✔ आपराधिक आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं

अतः—

“आरोपी को धारा 304A IPC और धारा 106 BNS दोनों के तहत पूर्णत: बरी किया जाता है।”


12. इस फैसले का व्यापक महत्व

यह फैसला कई कारणों से महत्वपूर्ण है:

1. तेज़ और लापरवाही ड्राइविंग मामलों में ‘पहचान’ को सर्वोच्च महत्व

अब पुलिस केवल “वाहन मालिक” के आधार पर गिरफ्तारी नहीं कर सकेगी।

2. जाँच-पड़ताल का स्तर सुधरेगा

TIP, वैज्ञानिक जांच, फोटोग्राफी, साइट प्लान अब अनिवार्य होंगे।

3. अभियोजन को प्रमाण के मानक का ध्यान रखना होगा

अपराध संदेह पर नहीं, प्रमाण पर आधारित होता है।

4. BNS की धारा 106 की न्यायिक व्याख्या स्पष्ट हुई

5. निर्दोष व्यक्ति को गलत दोषसिद्धि से बचाया गया

यह भारतीय दंड विधि का मूल उद्देश्य है।


13. निष्कर्ष

Punjab & Haryana High Court का यह निर्णय एक महत्वपूर्ण मिसाल है। कोर्ट ने सख्त शब्दों में यह संदेश दिया है कि:

  • चालक की पहचान के बिना,
  • TIP के बिना,
  • अविश्वसनीय गवाहों पर आधारित,
  • वैज्ञानिक जाँच के बगैर

किसी भी आरोपी को S.304A IPC या S.106 BNS के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

यह फैसला बताता है कि न्याय केवल सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि मज़बूत साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए।

अदालत ने इस केस में बिल्कुल वही किया—

“संदेह का लाभ अभियुक्त को”

और

“अनुमान का स्थान प्रमाण नहीं ले सकता”

के सिद्धांत का पालन करते हुए आरोपी को बाइज्ज़त बरी कर दिया।