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“एलओसी के पार पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र को अब भी जम्मू-कश्मीर का हिस्सा मानकर कोई भी व्यापार ‘इंट्रा-स्टेट सप्लाई’: जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय”

“एलओसी के पार पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र को अब भी जम्मू-कश्मीर का हिस्सा मानकर कोई भी व्यापार ‘इंट्रा-स्टेट सप्लाई’: जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय”

        जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) के पार पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्रों—विशेष रूप से पीओके (PoK) और गिलगित-बाल्टिस्तान—को भारतीय कानूनों के संदर्भ में अब भी भारतीय क्षेत्र ही माना जाएगा। इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि यदि एलओसी के पार वस्तुओं का व्यापार किया जाता है, तो उसे ‘इंट्रा-स्टेट सप्लाई’ (Intra-State Supply) माना जाएगा, न कि ‘इंटरनेशनल ट्रेड’ अथवा ‘इंटर-स्टेट सप्लाई’। इस निर्णय का प्रत्यक्ष प्रभाव GST कानून, कस्टम ड्यूटी, इंट्रा-स्टेट कारोबार, तथा सीमा-पार व्यापार नीतियों पर पड़ने जा रहा है।

         यह निर्णय न केवल कराधान व्यवस्था के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारत के संवैधानिक रुख और भौगोलिक दावे को भी और अधिक सुदृढ़ करता है। भारत ने सदैव स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान के कब्जे में जो भूमि है, वह अवैध कब्जा है और वह भूमि भारत का अभिन्न हिस्सा है। हाईकोर्ट का यह आदेश इसी संवैधानिक एवं राजनीतिक रुख की न्यायिक पुन: पुष्टि करता है।


पृष्ठभूमि: एलओसी ट्रेड, राजनीतिक संवेदनशीलता और कर विवाद

          2008 में भारत और पाकिस्तान ने एक मानवीय एवं आर्थिक उद्देश्य से एलओसी ट्रेड (Cross-LoC Trade) शुरू किया था, जिसमें कश्मीर के विभाजित क्षेत्र के दोनों तरफ रहने वाले लोगों को सीमित वस्तुओं का विनिमय करने की अनुमति दी गई थी। इस व्यवस्था के तहत व्यापार उरी (बारामुला) और चाकन-दा-बाग (पुंछ) मार्गों से होता था।
एलओसी के पार व्यापार:

  • ड्यूटी-फ्री था
  • बार्टर सिस्टम (माल के बदले माल) पर आधारित था
  • ‘लोकल ट्रेड’ की श्रेणी में रखा गया था

         2019 में सुरक्षा कारणों से यह व्यापार स्थगित कर दिया गया था, लेकिन पुराने मामलों के कर विवाद अदालतों में लंबित रहे। इन्हीं में से एक केस में यह प्रश्न उठा कि—

क्या एलओसी के पार व्यापार को भारतीय कानून में “अंतरराष्ट्रीय व्यापार” माना जाएगा?

या

क्या यह जम्मू-कश्मीर राज्य के अंदर का व्यापार माना जाएगा (Intra-State Trade)?

यही विवाद जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट के समक्ष आया, जिसमें कोर्ट ने विस्तृत विश्लेषण के बाद महत्वपूर्ण निष्कर्ष दिया।


हाईकोर्ट के समक्ष प्रमुख प्रश्न

  1. क्या एलओसी के पार पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र को भारत ‘विदेश’ मानता है?
  2. क्या वहां किए गए व्यापार को “इंटर-स्टेट” या “इंट्रा-स्टेट सप्लाई” माना जाएगा?
  3. क्या ऐसे व्यापार पर IGST (Integrated GST) लगेगा या CGST + SGST?
  4. क्या यह व्यापार कस्टम एक्ट, विदेशी व्यापार नीति, आदि के दायरे में आएगा?

इन प्रश्नों के उत्तर भारत की संवैधानिक पोज़िशन, अंतरराष्ट्रीय कानून, राजस्व कानून, और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर तय किए गए।


हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ

1. पाकिस्तान के कब्जे वाला क्षेत्र (PoK) अब भी कानूनी रूप से भारत का हिस्सा है

कोर्ट ने कहा—

  • भारतीय संसद ने 1994 में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया था कि “PoK भारत का अभिन्न हिस्सा है और पाकिस्तान को उसे खाली करना होगा।”
  • संविधान का अनुच्छेद 1 एवं जम्मू-कश्मीर संविधान दोनों ही पूरे राज्य को भारत का अभिन्न हिस्सा मानते हैं।
  • एलओसी केवल एक सैन्य नियंत्रण रेखा है, अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं।

उच्च न्यायालय ने इस आधार पर कहा कि अवैध कब्जा क्षेत्र की संवैधानिक स्थिति को नहीं बदल सकता


2. एलओसी के पार हुआ व्यापार “इंट्रा-स्टेट सप्लाई” है

GST कानून के अनुसार—

  • इंट्रा-स्टेट सप्लाई = एक ही राज्य के भीतर आपूर्ति
  • इंटर-स्टेट सप्लाई = दो अलग राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों या विदेश के साथ सप्लाई

चूंकि PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान को कानूनी रूप से भारत का हिस्सा माना जाता है, इसलिए वहां हुई सप्लाई को भी जम्मू-कश्मीर के भीतर की सप्लाई माना जाएगा।

इसलिए:

  • IGST नहीं लगेगा
  • सिर्फ CGST + SGST लगेगा
  • यह “Domestic Trade” है, “International Trade” नहीं।

3. एलओसी के पार व्यापार विदेशी व्यापार कानूनों के दायरे में नहीं आता

कोर्ट ने कहा:

  • यह न ‘इम्पोर्ट’ है, न ‘एक्सपोर्ट’।
  • कस्टम कानूनों के तहत इसे “फॉरेन ट्रेड” नहीं माना जा सकता।
  • एलओसी बार्टर ट्रेड भारत की विशेष नीति पर आधारित है, न कि अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य पर।

4. केंद्र और राज्य सरकार की आधिकारिक नीतियाँ इसी पोज़िशन की पुष्टि करती हैं

भारत के:

  • विदेश मंत्रालय
  • गृह मंत्रालय
  • रिज़ॉल्यूशन ऑफ़ पार्लियामेंट
  • आधिकारिक मैप

सब स्पष्ट रूप से PoK को भारत का हिस्सा दिखाते हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत इन तथ्यों की अनदेखी नहीं कर सकती।


निर्णय का कानूनी महत्व

(A) GST कानून की व्याख्या में नई स्पष्टता

पहली बार किसी उच्च न्यायालय ने यह व्याख्या दी है कि:

PoK को ‘भारतीय क्षेत्र’ मानने से कर व्यवस्था भी उसी रुख को अपनाएगी।

इससे राज्यों के बीच कराधान विवाद खत्म होंगे।


(B) संवैधानिक स्थिति की न्यायिक पुनःपुष्टि

यह निर्णय भारत की निम्नलिखित संवैधानिक नीतियों को मजबूत करता है:

  • PoK भारत का ही हिस्सा है
  • एलओसी अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं
  • अवैध कब्जा स्वामित्व को नहीं बदलता

(C) राजनीतिक और रणनीतिक संकेत

न्यायालय का निर्णय कूटनीतिक संदेश भी देता है—

भारत अपने भूभाग के किसी भी हिस्से पर दावा छोड़ने को तैयार नहीं है।


(D) कर मामलों में लंबित पुराने केसों पर प्रभाव

  • GST अधिकारियों को IGST की मांग वापस लेनी पड़ेगी
  • व्यापारी राहत महसूस करेंगे
  • बार्टर ट्रेड करने वाले ट्रेडर्स के लिए स्पष्टता पैदा होगी

व्यावहारिक प्रभाव: व्यापारी और कर अधिकारियों पर असर

व्यापारियों पर प्रभाव

  • IGST की देनदारी समाप्त
  • इनवॉइसिंग आसान
  • घरेलू कर व्यवस्था लागू होगी

GST विभाग पर प्रभाव

  • पहले किए गए IGST के शो-कॉज नोटिस अमान्य हो जाएंगे
  • पिछले आकलनों में संशोधन आवश्यक होगा

कस्टम विभाग पर प्रभाव

  • एलओसी ट्रेड को विदेशी व्यापार नहीं मानकर अलग श्रेणी में रखा जाएगा

निर्णय की संभावित आलोचनाएँ

कुछ विशेषज्ञ यह तर्क दे सकते हैं कि:

  • एलओसी के पार जो लोग रहते हैं, वे पाकिस्तान की प्रशासनिक इकाई के तहत हैं, इसलिए व्यापार को घरेलू व्यापार कहना कठिन है।
  • सुरक्षा एजेंसियों का कहना रहा है कि यह व्यापार कई बार फंडिंग के लिए दुरुपयोग हुआ।

हालाँकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कर कानूनों का निर्धारण भावनाओं नहीं, संवैधानिक स्थिति के आधार पर होगा


भारत की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय कानून

भारत का दावा तीन स्तंभों पर आधारित है—

  1. कानूनी (Instrument of Accession 1947)
  2. संवैधानिक (अनुच्छेद 1 और संसद का प्रस्ताव)
  3. अंतरराष्ट्रीय नियम (अवैध कब्जा स्वामित्व को नहीं बदलता)

इसलिए PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान हमेशा से भारत का हिस्सा रहे हैं और रहेंगे।


अदालत का अंतिम निष्कर्ष (Conclusion)

जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा—

  • एलओसी के पार पूँछ और उरी मार्गों से होने वाला व्यापार भारत का घरेलू व्यापार है।
  • इसे इंट्रा-स्टेट सप्लाई माना जाएगा।
  • न कोई IGST देय होगा, न कस्टम ड्यूटी।
  • PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान भारत के अभिन्न अंग हैं, और अदालत इसे मान्यता देती है।

समापन: निर्णय का व्यापक महत्व

        यह फैसला केवल एक कर विवाद का समाधान नहीं है; यह राष्ट्रीय संप्रभुता, संवैधानिक सिद्धांतों, और राजनीतिक दृष्टिकोण की न्यायिक पुष्टि भी है।
आज जब PoK की स्थिति पर वैश्विक मंचों पर चर्चा होती है, यह निर्णय भारत के रुख को और मजबूत करता है कि—

“सीमा चाहे सैन्य कारणों से नियंत्रण रेखा में बदल गई हो,
परंतु जमीन आज भी भारत की है,
और कानून उसे भारत का हिस्सा मानकर ही व्यवहार करेगा।”

यह निर्णय कर प्रशासन, विदेशी नीति, न्यायिक सिद्धांतों, और संवैधानिक एकता का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।