“धारा 138 NI Act के तहत अधिकार-क्षेत्र वही होगा जहाँ प्राप्तकर्ता का बैंक खाता है, न कि जहाँ वह चेक जमा करे”: फोरम शॉपिंग रोकने की विधायी मंशा को सुप्रीम कोर्ट ने पुनः पुष्ट किया
परिचय : धारा 138 अभियोजन में अधिकार-क्षेत्र का प्रश्न और न्यायालयों की दुविधा
भारतीय दंड व्यवस्था में Negotiable Instruments Act, 1881 की धारा 138 चेक dishonour के मामलों में अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान है। व्यापारिक लेनदेन में विश्वास बनाए रखने और चेक भुगतान तंत्र को विश्वसनीय बनाने के उद्देश्य से यह धारा लागू की गई थी।
धारा 138 के तहत मुकदमें दायर करते समय कौन-सा न्यायालय अधिकार-क्षेत्र रखता है, यानी territorial jurisdiction किसके पास है—इस प्रश्न पर लंबे समय तक भारतीय न्यायालयों में असमंजस की स्थिति रही।
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पुनः यह स्पष्ट किया कि—
“चेक dishonour के मामलों में अधिकार-क्षेत्र उसी न्यायालय को प्राप्त होगा जहाँ ‘प्राप्तकर्ता (Payee)’ का बैंक खाता है, न कि उस स्थान को जहाँ वह चेक को ‘जमा’ कराने का चुनाव करता है।”
यह निर्णय विधायिका द्वारा 2015 के संशोधन (Amendment) में निहित विधायी मंशा (Legislative Intent) को पुनः रेखांकित करता है तथा ‘‘Forum Shopping’’ जैसी दुरुपयोग प्रवृत्तियों पर स्पष्ट रोक लगाता है।
विधायी पृष्ठभूमि : 2015 संशोधन और धारा 142(2)
2015 में संसद ने Negotiable Instruments (Amendment) Act, 2015 पारित किया, जिसके माध्यम से Section 142(2) जोड़ा गया।
यह प्रावधान स्पष्ट करता है कि—
चेक dishonour के मामले में शिकायत उसी न्यायालय में दर्ज होगी—
(क) जहाँ ‘पेयee’ अपने बैंक खाते को ‘रखता है’ (maintains the account), यदि चेक पेयी को जारी किया गया है, या
(ख) जहाँ ‘ड्रॉअर’ का बैंक खाता है, यदि चेक किसी अन्य को जारी किया गया है।**
यह प्रावधान दो चीजें स्थापित करता है—
- Jurisdiction का निर्धारण Payee या Drawer के Bank Branch से जुड़ा है।
- चेक जमा करने के स्थान को अधिकार-क्षेत्र निश्चित करने के लिए प्रासंगिक नहीं माना गया।
विधायिका ने इस संशोधन के माध्यम से स्पष्ट संदेश दिया कि
✔ Payee कहीं भी चेक जमा करा सकता है,
✔ परंतु शिकायत केवल उसके ‘‘home branch’’ के अधिकार-क्षेत्र में ही दायर होगी।
विवाद : क्या पेयी चेक किसी भी शाखा में जमा कराकर अधिकार-क्षेत्र बदल सकता है?
वर्षों से चल रहे विवाद का व्यापक प्रश्न था—
“यदि पेयी का खाता दिल्ली में है, पर वह चेक बेंगलुरु की किसी शाखा में जमा कर दे, तो क्या वह बेंगलुरु की अदालत में 138 का मुकदमा दर्ज कर सकता है?”
कई न्यायालयों ने अलग-अलग व्याख्याएँ कीं, जिसके कारण भ्रम फैल गया। कुछ अदालतों ने कहा—
- पेयी द्वारा चुने गए जमा स्थान से jurisdiction निर्धारित होगा।
- कुछ ने कहा—नहीं, केवल मूल शाखा ही निर्णायक है।
इसी भ्रम को दूर करने के लिए मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा।
सुप्रीम कोर्ट का अवलोकन : पेयी के खाते का स्थान ही निर्णायक
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—
“2015 संशोधन में ‘maintains the account’ शब्द का उद्देश्य स्पष्ट है—अधिकार-क्षेत्र उस स्थान को मिलेगा जहाँ पेयी का मुख्य खाता है, न कि जहाँ वह सुविधानुसार चेक जमा करे।”
न्यायालय ने आगे कहा:
- चेक जमा करने का स्थान पेयी की सुविधा पर निर्भर हो सकता है।
- यदि जमा स्थान से jurisdiction तय होने लगे, तो पेयी किसी भी शहर से मुकदमा दायर कर सकता है।
- इससे Forum Shopping की प्रवृत्ति बढ़ेगी, जिसे legislature रोकना चाहता था।
अतः अदालत ने माना कि—
चेक जमा होने का स्थान ‘‘अधिकार-क्षेत्र निर्धारण’’ के लिए अप्रासंगिक है।
केवल पेयी के account-maintaining branch को महत्व मिलेगा
फोरम शॉपिंग—कानूनी प्रणाली के लिए एक गंभीर खतरा
न्यायपालिका ने बार-बार चेताया है कि litigants द्वारा सुविधाजनक कोर्ट को चुनना—
यानी Forum Shopping—
विधि-व्यवस्था को ग़लत दिशा में ले जाता है।
फोरम शॉपिंग के परिणाम:
- विपक्षी पक्ष पर अनुचित दबाव।
- कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग।
- न्यायालयों पर अनावश्यक भार।
- निष्पक्षता की छवि को आघात।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“Legislature intended to remove the mischief of forum shopping. Courts must interpret Section 142(2) in a manner that furthers this intent.”
अर्थ—
जब कानून की स्पष्ट मंशा फोरम शॉपिंग रोकने की है, तो अदालतें ऐसी व्याख्या नहीं कर सकतीं जो इस दुरुपयोग को बढ़ाए।
न्यायालय का विस्तृत विश्लेषण : ‘Depositing’ और ‘Maintaining’ में कानूनी अंतर
न्यायालय ने कहा कि—
1. ‘Maintaining the account’ एक स्थायी तत्व है।
पेयी अपनी खाता-शाखा चुनता है और वही उसका आधिकारिक लेनदेन स्थान माना जाता है।
2. ‘Depositing the cheque’ एक आकस्मिक क्रिया है।
पेयी कहीं भी यात्रा करते समय, या काम के दौरान, किसी भी शाखा में चेक जमा करा सकता है।
यदि केवल जमा स्थान अधिकार-क्षेत्र निर्धारण का आधार बन जाए—
- पेयी हर बार कोई भी शहर चुन सकता है,
- जिसे अदालत ने पूरी तरह अस्वीकार्य बताया।
न्यायालय ने कहा—
“Such an interpretation will defeat the very object of the 2015 Amendment.”
केस लॉ का समर्थन : पूर्व निर्णय और उनका प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के अनेक निर्णयों का हवाला दिया—
1. Dashrath Rupsingh Rathod v. State of Maharashtra (2014)
जहाँ कोर्ट ने पहले यह सिद्धांत दिया था कि jurisdiction drawer के खाते वाली शाखा में होगा।
2. 2015 Amendment
यह संशोधन उपरोक्त निर्णय के प्रभाव को legislatively overturn करने के लिए लाया गया।
3. Bridging the gap
2015 Amendment के बाद भी कुछ न्यायालयों ने ‘‘deposit location’’ को jurisdiction मान लिया था—जो पूरी तरह गलत व्याख्या थी।
अब सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम रूप से इस भ्रम को समाप्त कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण बिंदु (Key Takeaways)
अधिकार-क्षेत्र निर्धारण का प्राथमिक आधार पेयी के खाते की शाखा है।
चेक जमा करने का स्थान jurisdiction नहीं बदलता।
फोरम शॉपिंग पूर्णतः प्रतिबंधित है।
2015 Amendment में ‘maintains the account’ शब्द निर्णायक है।
न्यायालयों को विधायी मंशा के अनुरूप व्याख्या करनी चाहिए।
सुविधा या रणनीति के आधार पर शिकायत दर्ज करने की प्रवृत्ति अस्वीकार्य है।
इस निर्णय का व्यावहारिक प्रभाव
1. व्यापारिक और बैंकिंग लेनदेन में स्थिरता
अब व्यापारी और व्यवसायिक इकाइयाँ यह जान सकेंगी कि चेक dishonour का मुकदमा कहाँ दायर होगा।
2. मुकदमेबाजी में पारदर्शिता
पेयी किसी भी शहर में जाकर शिकायत दर्ज नहीं कर सकता।
3. विपक्षी (Drawer) पर अनावश्यक बोझ समाप्त
अब उसे बार-बार गलत forum में जाकर बहस नहीं करनी पड़ेगी।
4. न्यायालयों पर भार का उचित वितरण
एक ही शहर की अदालतें अनावश्यक रूप से बोझिल नहीं होंगी।
5. स्पष्ट और निश्चित कानून
सभी stakeholders—व्यापारी, बैंक, वकील, न्यायालय—अब अधिकार-क्षेत्र को लेकर पूर्णतः स्पष्ट होंगे।
कानूनी विवेचना : क्यों सही है यह निर्णय?
1. नैतिक दृष्टि से
फोरम शॉपिंग एक प्रकार की अनुचित रणनीति है जो न्याय को प्रभावित करती है।
2. विधायी दृष्टि से
2015 Amendment का उद्देश्य ही था—
✔ Forum shopping रोकना
✔ Clarity लाना
✔ Banking system को predictable बनाना
3. न्यायिक दृष्टि से
न्यायालय को ऐसे कानूनों की व्याख्या करनी चाहिए जो—
- अधिकारों की रक्षा करे
- दुरुपयोग रोके
- विवादों को सरल बनाए
यह निर्णय इन तीनों सिद्धांतों को पूरा करता है।
निष्कर्ष : फोरम शॉपिंग पर पूर्ण विराम
माननीय सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पूर्व की भ्रमित व्याख्याओं को समाप्त करता है और एक स्पष्ट, सुसंगत और न्यायसंगत सिद्धांत स्थापित करता है—
“Section 138 NI Act के मामलों में Complaint वहीं दायर होगी जहाँ Payee अपना खाता ‘रखता है’।
जमा करने के स्थान से Jurisdiction नहीं बदलेगा।”
यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि—
- कानून का उद्देश्य दुरुपयोग रोकना है,
- न्यायालय सुविधा नहीं बल्कि कानूनी सिद्धांत देखेगा,
- और territorial jurisdiction का प्रश्न अब पूर्णतः settled है।
इस निर्णय से न केवल चेक dishonour मामलों में प्रक्रिया स्पष्ट हुई है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्थिरता भी सुदृढ़ हुई है।