“Order 6 Rule 17 CPC – Amendment of Written Statement after 7 years – Clarification of Facts Already Pleaded – Punjab & Haryana High Court”
7 वर्षों बाद भी लिखित बयान में संशोधन स्वीकार — पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
भारतीय सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) का उद्देश्य न्याय के वास्तविक सिद्धांत—“Substantial Justice over Technicality”—को बढ़ावा देना है। इसी सिद्धांत पर आधारित पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया, जिसमें लिखित बयान (Written Statement) दायर होने के 7 वर्ष बाद भी संशोधन (Amendment) की अनुमति दी गई, क्योंकि प्रस्तावित संशोधन मात्र पहले से मौजूद तथ्यों की स्पष्टता (Clarification of Existing Pleadings) से संबंधित था।
यह निर्णय प्रक्रिया संबंधी कानूनों की व्याख्या में न्यायालय के उदार और न्यायोन्मुखी दृष्टिकोण का उत्कृष्ट प्रतीक है।
1. प्रस्तावना : Order 6 Rule 17 CPC का उद्देश्य
CPC की Order 6 Rule 17 में यह प्रावधान है कि—
“न्याय के लिए आवश्यक हो तो किसी भी पक्ष को अपने Pleadings में संशोधन करने की अनुमति दी जा सकती है।”
इस Rule का मूल उद्देश्य—
- विवाद के वास्तविक मुद्दे को स्पष्ट करना
- तथ्यात्मक व कानूनी विवादों का सही निर्धारण
- न्याय की निष्पक्ष डिलीवरी
- तकनीकी या ड्राफ्टिंग त्रुटियों के कारण किसी को नुकसान न होने देना
हालांकि, 2002 Amendment के बाद यह भी जोड़ा गया कि—
Trial Beginning के बाद amendment ordinarily स्वीकार नहीं होगा
जब तक कि पार्टी यह न दिखाए कि due diligence के बावजूद amendment earlier possible नहीं था।
लेकिन उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालयों ने स्पष्ट किया है—
✔ यदि amendment केवल स्पष्टीकरण (clarification) हेतु है
✔ कोई नया दावा/रक्षा (new cause of action) नहीं जोड़ा जा रहा
✔ कोई mala fide नहीं है
✔ Opposite party को prejudice नहीं होगा
तो अदालत इसे स्वीकार कर सकती है — चाहे देरी कितनी भी लंबी क्यों न हो।
2. मामले के तथ्य (Facts of the Case)
इस केस में—
- प्रतिवादी ने 7 वर्ष पहले अपना लिखित बयान दाखिल किया था
- बाद में पता चला कि कुछ तथ्य अस्पष्ट रह गए थे
- कोई नया defense नहीं जोड़ा जा रहा था
- केवल पहले से लिखे तथ्यों को स्पष्ट (clarify) करने की आवश्यकता थी
- Plaintiff को इस amendment से कोई surprise या prejudice नहीं होने वाला था
इसलिए प्रतिवादी ने Order 6 Rule 17 CPC के तहत आवेदन दाखिल किया।
Plaintiff का विरोध
Plaintiff ने कहा—
- 7 साल बाद amendment देना अनुचित है
- Due diligence नहीं दिखाई गई
- Trial आगे बढ़ चुका है
लेकिन अदालत ने यह तर्क स्वीकार नहीं किया।
3. न्यायालय का विश्लेषण (Court’s Analysis)
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक विस्तृत विवेचना की, जिसमें कई महत्वपूर्ण पहलू रखे गए—
A. Amendment merely clarifies existing facts
अदालत ने कहा—
प्रस्तावित संशोधन कोई नया defense नहीं जोड़ता
न ही यह case की nature बदलता है
यह केवल उन्हीं तथ्यों की clarity देता है जो पहले से pleadings में मौजूद थे
इसलिए इसे substantial amendment नहीं माना गया।
B. Delay alone cannot defeat justice
अदालत ने Supreme Court के कई निर्णयों का हवाला दिया—
1. Revajeetu Builders v. Narayanaswamy (2009)
Amendment should be allowed if it clarifies the real questions in controversy.
2. Baldev Singh v. Manohar Singh (2006)
Defendant के लिए amendment rule अधिक liberal तरीके से लागू होगा।
3. Rajkumar v. S. Natarajan (2014)
Delay by itself cannot be a ground to reject an amendment application.
C. Amendment in Written Statement is treated liberally
Supreme Court में यह settled law है कि—
- Written Statement में amendment को
- Plaint के amendment की तुलना में
ज़्यादा उदारता
से स्वीकार किया जाता है, क्योंकि
Plaintiff अपने case को बदल सकता है,
लेकिन Defendant का उद्देश्य आमतौर पर अपनी defense को स्पष्ट करना होता है।
इसके आधार पर High Court ने कहा—
mere delay ≠ rejection of amendment
D. No prejudice to the plaintiff
कोर्ट ने पाया—
- Amendment केस की nature नहीं बदलता
- Plaintiff को कोई विशेष नुकसान नहीं
- Opponent को नए सिरे से evidence नहीं देना होगा
- Entire trial में कोई बाधा नहीं आएगी
सबसे महत्वपूर्ण यह कि—
Amendment केवल clarity देता है, न कि नई कहानी।
E. Technicalities should not override substantial justice
अदालत ने कहा—
Civil Procedure is meant to advance justice, not to thwart it.
यदि संशोधन से विवाद का वास्तविक मुद्दा सामने आता है तो अदालत को इसे स्वीकार करना चाहिए।
4. अदालत का निर्णय (Final Order)
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने निर्देश दिया—
✔ Application under Order 6 Rule 17 CPC Allowed
✔ 7 years delay is not fatal
✔ Amendment needed for clarification
✔ No prejudice to opposite party
अदालत ने कहा—
“Where the amendment seeks to merely clarify the facts already pleaded and does not change the nature or structure of the defence, the same must be allowed even if moved after several years.”
5. निर्णय का महत्त्व (Significance of the Judgment)
यह निर्णय कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है—
(1) Pleading amendments must be justice-oriented
यह फैसला बताता है कि न्यायालय का रुख amendment applications के प्रति—
🔹 liberal
🔹 justice-centric
🔹 pragmatic
होना चाहिए।
(2) Long delay is not an absolute bar
यह साफ हुआ कि—
“Delay is a relevant factor, but not a decisive factor.”
(3) Written Statement में amendment का scope हमेशा wider होता है
Defendant trial को delay नहीं करना चाहता; वह केवल clarity लाना चाहता है।
यह न्यायालयों द्वारा बार-बार स्वीकार किया गया सिद्धांत है।
(4) Technicalities पर justice paramount
यह निर्णय reaffirm करता है—
🔸 Courts exist to resolve disputes
🔸 Not to punish litigants for procedural lapses
🔸 Particularly where no malafide intention is shown
(5) Future cases में महत्वपूर्ण मिसाल
यह फैसला उन litigants को राहत देगा—
- जिनके pleadings में drafting errors रह गई हों
- जिनको clarity देनी हो
- जहां amendment से case की nature प्रभावित न हो
6. निष्कर्ष (Conclusion)
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका की उदार, न्यायोन्मुखी और मानवोचित दृष्टिकोण को दर्शाता है।
7 वर्ष की लंबी देरी के बावजूद amendment को इसलिए स्वीकार किया गया क्योंकि—
- यह मात्र स्पष्टीकरण था
- कोई नया defense नहीं जोड़ा जा रहा था
- case की nature नहीं बदली
- plaintiff को कोई prejudice नहीं
यह फैसला यह संदेश देता है—
“Civil litigation must focus on truth and real issues, not on technical lapses.”
और यही CPC के उद्देश्य—न्याय, निष्पक्षता और सत्य—का वास्तविक अर्थ है।