34 वर्षों की सेवा के बाद भी अस्थायी? श्रम, गरिमा और राज्य की नैतिक जिम्मेदारी — जम्मू, कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
भारतीय श्रम न्यायशास्त्र में अस्थायी, दैनिक वेतनभोगी और संविदा कर्मचारियों की स्थिति लंबे समय से एक संवेदनशील और विवादास्पद विषय रही है। राज्य एक ओर इन्हें वर्षों–दशकों तक निरंतर कार्य में लगाए रखता है, और दूसरी ओर नियमितीकरण की मांग पर तकनीकी आपत्तियाँ उठाकर जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करता है। इसी प्रवृत्ति पर कड़ा प्रहार करते हुए जम्मू, कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने 34 वर्षों से कार्यरत एक दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के नियमितीकरण को बरकरार रखा और राज्य सरकार के विरोध को “grossly iniquitous” (घोर रूप से अन्यायपूर्ण) करार दिया।
यह फैसला केवल एक कर्मचारी को न्याय दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की नैतिकता, श्रमिक की गरिमा और संविधान में निहित सामाजिक–आर्थिक न्याय की अवधारणा को मजबूती देता है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता एक दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी था, जिसे राज्य के एक विभाग में लगभग 34 वर्ष पूर्व नियुक्त किया गया था। वह लगातार, बिना किसी बड़े अंतराल के, वही कार्य करता रहा जो नियमित कर्मचारियों से लिया जाता है। उसके कार्य, जिम्मेदारियाँ और योगदान कभी अस्थायी नहीं रहे, केवल उसका दर्जा अस्थायी बना रहा।
लंबे समय बाद, सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसके नियमितीकरण का आदेश पारित किया गया। किंतु राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए यह तर्क दिया कि—
- प्रारंभिक नियुक्ति नियमित प्रक्रिया के अनुसार नहीं थी,
- कर्मचारी दैनिक वेतन पर था, अतः उसे नियमितीकरण का स्वाभाविक अधिकार नहीं है,
- नीति और नियमों के अनुसार यह संभव नहीं है।
राज्य की इस आपत्ति ने एक बुनियादी प्रश्न खड़ा किया—क्या कोई व्यक्ति 34 वर्षों तक “अस्थायी” रह सकता है?
हाईकोर्ट का स्पष्ट और कठोर दृष्टिकोण
जम्मू, कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने राज्य के तर्कों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि—
- 34 वर्षों तक किसी व्यक्ति से सेवा लेना और फिर उसे यह कहना कि वह केवल “दैनिक वेतनभोगी” है, न केवल अन्यायपूर्ण बल्कि अमानवीय भी है।
- राज्य का यह रुख घोर असमानता और शोषण को दर्शाता है।
- इस प्रकार का विरोध “grossly iniquitous” है, अर्थात ऐसा अन्याय जो कानून और नैतिकता—दोनों की कसौटी पर अस्वीकार्य है।
अदालत ने यह भी कहा कि राज्य एक मॉडल नियोक्ता (Model Employer) होता है और उससे निजी नियोक्ताओं से भी अधिक न्यायपूर्ण, संवेदनशील और उत्तरदायी व्यवहार की अपेक्षा की जाती है।
दैनिक वेतनभोगी और संवैधानिक संरक्षण
हाईकोर्ट ने इस फैसले में संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) की व्यापक व्याख्या की। न्यायालय ने माना कि—
- समान कार्य करने वाले कर्मचारियों के साथ दशकों तक भेदभाव करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
- किसी व्यक्ति को जीवन भर असुरक्षा, अनिश्चितता और अस्थायित्व में रखना उसकी गरिमा के प्रतिकूल है।
- जीवन का अधिकार केवल जीविका तक सीमित नहीं, बल्कि सम्मानजनक रोजगार और सामाजिक सुरक्षा भी उसका हिस्सा है।
“तकनीकी आपत्तियाँ” बनाम वास्तविक न्याय
राज्य का प्रमुख तर्क यह था कि प्रारंभिक नियुक्ति नियमों के अनुसार नहीं थी। इस पर न्यायालय ने कहा—
- यदि नियुक्ति में कोई अनियमितता थी, तो उसका लाभ कर्मचारी नहीं, बल्कि राज्य ने लिया।
- कर्मचारी ने कभी धोखाधड़ी नहीं की; वह राज्य के आदेश पर कार्य करता रहा।
- दशकों बाद “तकनीकी खामियाँ” निकालकर कर्मचारी को उसके अधिकार से वंचित करना न्याय नहीं, बल्कि राज्य की विफलता को कर्मचारी पर थोपना है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य केवल नियमों का यांत्रिक पालन नहीं, बल्कि वास्तविक न्याय सुनिश्चित करना है।
‘मॉडल एम्प्लॉयर’ की अवधारणा
भारतीय न्यायपालिका ने बार–बार कहा है कि राज्य एक आदर्श नियोक्ता होना चाहिए। इसका अर्थ है—
- कर्मचारियों के साथ निष्पक्ष व्यवहार,
- शोषण से परहेज़,
- और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का पालन।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि जब राज्य स्वयं वर्षों तक दैनिक वेतन पर कर्मचारियों को रखता है, तो वह निजी क्षेत्र की सबसे खराब श्रम प्रथाओं से भी नीचे गिर जाता है। यह स्थिति कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के विपरीत है।
व्यापक सामाजिक प्रभाव
इस निर्णय का प्रभाव केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं है। इसके दूरगामी परिणाम हैं—
- हजारों दैनिक वेतनभोगियों को आशा
जो वर्षों से नियमितीकरण की प्रतीक्षा में हैं। - राज्य सरकारों के लिए चेतावनी
कि वे अस्थायी नियुक्तियों को स्थायी शोषण का माध्यम न बनाएं। - श्रम कानूनों की मानवीय व्याख्या
यह निर्णय बताता है कि न्याय केवल फाइलों और नियमों में नहीं, बल्कि मानव जीवन में उतरना चाहिए।
पूर्व न्यायिक दृष्टांतों से सामंजस्य
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्टों के उन निर्णयों की निरंतरता में है, जहाँ कहा गया है कि—
- लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों के साथ अन्याय नहीं किया जा सकता,
- अस्थायी शब्द का प्रयोग स्थायी शोषण के लिए नहीं हो सकता,
- न्यायालय “आँख मूँदकर” तकनीकी दलीलों को स्वीकार नहीं करेगा।
निष्कर्ष: सेवा अस्थायी थी, समर्पण नहीं
जम्मू, कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट का यह फैसला एक सशक्त संदेश देता है कि—
- 34 वर्षों की सेवा को अस्थायी नहीं कहा जा सकता,
- श्रम की गरिमा संविधान के केंद्र में है,
- और राज्य यदि स्वयं अन्याय करेगा, तो न्यायपालिका हस्तक्षेप करने से नहीं हिचकेगी।
यह निर्णय याद दिलाता है कि कल्याणकारी राज्य का मूल्यांकन उसके घोषणापत्रों से नहीं, बल्कि उसके सबसे कमजोर कर्मचारियों के साथ किए गए व्यवहार से होता है। जब एक दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी को दशकों बाद न्याय मिलता है, तो यह केवल उसकी जीत नहीं, बल्कि संविधान की भी जीत है।
अंततः, यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून का उद्देश्य सत्ता की सुविधा नहीं, बल्कि न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की रक्षा है—और यही किसी भी लोकतंत्र की असली पहचान है।