“24% ब्याज दर ‘ज्यादा’ कहकर रद्द नहीं की जा सकती” — कॉन्ट्रैक्ट की स्वतंत्रता और बिज़नेस स्वायत्तता पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णायक फैसला (18 नवंबर 2025)
प्रस्तावना
भारतीय वाणिज्यिक (Commercial) और कॉन्ट्रैक्ट कानून का मूल सिद्धांत है —
“जो समझौता दोनों पक्षों ने स्वतंत्र इच्छा से किया है, उसे अदालतें सामान्यतः बदल नहीं सकतीं।”
लेकिन व्यवहार में अक्सर देखा गया है कि जब किसी बिज़नेस डील में उच्च ब्याज दर (High Interest Rate) तय होती है, तो विवाद होने पर अदालतों के सामने यह प्रश्न आ जाता है कि—
- क्या यह ब्याज दर “अत्यधिक” है?
- क्या इसे न्यायिक हस्तक्षेप से घटाया जा सकता है?
- क्या अदालतें यह तय कर सकती हैं कि व्यापारिक सौदे में क्या उचित है और क्या नहीं?
18 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने इन सभी सवालों पर स्पष्ट, सशक्त और व्यावसायिक दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा—
“यदि किसी बिज़नेस कॉन्ट्रैक्ट में दोनों पक्षों ने समझ-बूझकर 24% ब्याज दर पर सहमति दी है, तो केवल इसे ‘ज्यादा’ कहकर अदालतें उस शर्त को रद्द या संशोधित नहीं कर सकतीं।”
यह फैसला भारतीय व्यापारिक कानून में Contractual Freedom को नई मजबूती देता है।
मामले की पृष्ठभूमि (Background of the Case)
मामले में एक व्यावसायिक लेन-देन (Business Transaction) से जुड़ा विवाद था, जिसमें—
- एक पक्ष ने दूसरे पक्ष को धनराशि उधार दी
- दोनों के बीच लिखित समझौता (Contract) हुआ
- कॉन्ट्रैक्ट में 24% वार्षिक ब्याज दर स्पष्ट रूप से तय थी
जब भुगतान में चूक हुई, तो विवाद अदालत तक पहुँचा।
निचली अदालत और हाईकोर्ट ने यह कहते हुए ब्याज दर में हस्तक्षेप किया कि—
“24% ब्याज दर अत्यधिक (Excessive) है और इसे कम किया जाना चाहिए।”
यही आदेश सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का विषय बना।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट के सामने मूलतः ये प्रश्न थे—
- क्या अदालतें केवल “उच्च” होने के आधार पर कॉन्ट्रैक्ट की ब्याज दर को बदल सकती हैं?
- क्या बिज़नेस कॉन्ट्रैक्ट में न्यायालय की भूमिका ‘संशोधक’ (Editor) की हो सकती है?
- कॉन्ट्रैक्ट की स्वतंत्रता और न्यायिक विवेक के बीच सीमा कहाँ खींची जाए?
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट और निर्णायक दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा—
“व्यापारिक समझौतों में अदालतें संरक्षक (Guardian) नहीं, बल्कि सीमित निरीक्षक (Limited Supervisor) होती हैं।”
कोर्ट ने साफ किया कि—
- यदि कॉन्ट्रैक्ट:
- कानून के विरुद्ध नहीं है
- धोखाधड़ी, दबाव या ज़बरदस्ती से नहीं किया गया
- सार्वजनिक नीति (Public Policy) के खिलाफ नहीं है
तो अदालतें पक्षकारों की व्यावसायिक समझ को अपने विवेक से प्रतिस्थापित नहीं कर सकतीं।
24% ब्याज दर पर सुप्रीम कोर्ट की विशेष टिप्पणी
कोर्ट ने कहा—
“केवल यह तथ्य कि ब्याज दर 24% है, इसे स्वतः अवैध या अन्यायपूर्ण नहीं बनाता।”
कोर्ट का तर्क:
- बिज़नेस डील्स में:
- जोखिम (Risk) अधिक होता है
- पूंजी की लागत अलग-अलग होती है
- बाज़ार की परिस्थितियाँ भिन्न होती हैं
इसलिए—
जो दर एक व्यक्ति को ‘ज्यादा’ लग सकती है, वही किसी व्यापारिक सौदे में ‘उचित जोखिम मूल्य’ हो सकती है।
भारतीय कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872 के संदर्भ में फैसला
धारा 10 — वैध अनुबंध
कोर्ट ने दोहराया कि—
- स्वतंत्र सहमति
- वैध प्रतिफल
- सक्षम पक्षकार
होने पर अनुबंध वैध होता है।
धारा 23 — लोक नीति
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—
- उच्च ब्याज दर अपने आप में “लोक नीति के विरुद्ध” नहीं है
- जब तक वह:
- शोषणकारी
- अवैध
- या प्रतिबंधित कानूनों के विरुद्ध
न हो।
न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएँ
सुप्रीम कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा—
“अदालतें व्यापारिक सौदों के लिए ‘आर्थिक नैतिकता की प्रहरी’ नहीं बन सकतीं।”
यदि अदालतें हर सौदे में यह तय करने लगें कि—
- कितना ब्याज उचित है
- कौन-सी शर्त कठोर है
तो:
- बिज़नेस अनिश्चितता बढ़ेगी
- निवेशकों का भरोसा डगमगाएगा
- कॉन्ट्रैक्ट्स का मूल्य घटेगा
पूर्व निर्णयों से सामंजस्य
यह फैसला कई पुराने सिद्धांतों की पुष्टि करता है—
● Freedom of Contract
पक्षकार अपनी शर्तें स्वयं तय करने के लिए स्वतंत्र हैं।
● Commercial Wisdom
अदालतें व्यापारिक समझ को चुनौती नहीं देंगी।
● Sanctity of Contract
अनुबंध की पवित्रता (Sanctity) बनाए रखना न्यायपालिका का कर्तव्य है।
बिज़नेस जगत पर फैसले का प्रभाव
1. निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा
- स्पष्ट संदेश कि अदालतें:
- वैध बिज़नेस डील्स में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करेंगी
2. कॉन्ट्रैक्ट ड्राफ्टिंग को मजबूती
- पक्षकार अब:
- जोखिम आधारित ब्याज दर तय करने में अधिक आत्मविश्वास महसूस करेंगे
3. वाणिज्यिक विवादों में स्पष्टता
- हाईकोर्ट्स और निचली अदालतों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश
क्या यह फैसला हर मामले में लागू होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने सावधानीपूर्वक यह भी स्पष्ट किया कि—
यह फैसला असीमित छूट (Blanket Permission) नहीं देता।
अदालत हस्तक्षेप कर सकती है यदि:
- ब्याज दर:
- धोखाधड़ी से तय की गई हो
- कमजोर पक्ष का शोषण हो
- किसी विशेष कानून (जैसे सूदखोरी कानून) का उल्लंघन हो
आलोचनात्मक दृष्टि
कुछ आलोचक कहते हैं—
- इससे बड़े कारोबारी कमजोर पक्षों पर भारी शर्तें थोप सकते हैं
लेकिन सुप्रीम कोर्ट का उत्तर स्पष्ट है—
“न्यायिक संरक्षण और अनुबंधीय स्वतंत्रता के बीच संतुलन आवश्यक है, पर संरक्षण के नाम पर अनुबंध को नष्ट नहीं किया जा सकता।”
व्यापारिक नैतिकता बनाम संवैधानिक सीमाएँ
कोर्ट ने यह रेखा खींची कि—
- नैतिकता का मूल्यांकन बाज़ार और पक्षकार करेंगे
- अदालतें केवल यह देखेंगी कि:
- कानून टूटा है या नहीं
निष्कर्ष
18 नवंबर 2025 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला भारतीय वाणिज्यिक कानून में एक मील का पत्थर है।
यह स्पष्ट करता है कि—
- अदालतें बिज़नेस डील्स की शर्तें दोबारा नहीं लिखेंगी
- 24% ब्याज दर केवल “ज्यादा” होने के कारण अवैध नहीं
- अनुबंध की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है
“जहाँ समझदारी से सहमति हो, वहाँ न्यायालय की भूमिका सम्मान की होती है, संशोधन की नहीं।”