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हरियाणा की न्यायिक प्रथाओं पर उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी: जिला न्यायपालिका को मार्गदर्शन के लिए मुख्य न्यायाधीश को आदेश प्रेषित करने का निर्देश

हरियाणा की न्यायिक प्रथाओं पर उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी: जिला न्यायपालिका को मार्गदर्शन के लिए मुख्य न्यायाधीश को आदेश प्रेषित करने का निर्देश

प्रस्तावना

        भारतीय न्याय प्रणाली केवल कानून की पुस्तकों से संचालित नहीं होती, बल्कि न्यायिक अनुशासन, प्रशासनिक नियंत्रण और संवैधानिक संतुलन से भी संचालित होती है। जब किसी राज्य की जिला न्यायपालिका में ऐसी प्रथाएँ विकसित हो जाती हैं जो विधि की भावना या उच्च न्यायालय की व्याख्याओं से मेल नहीं खातीं, तब उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप केवल अधिकार नहीं बल्कि कर्तव्य बन जाता है।

       इसी क्रम में, हरियाणा में प्रचलित एक विशेष न्यायिक अभ्यास (practice) पर संज्ञान लेते हुए न्यायालय ने यह निर्देश दिया कि उसका आदेश मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के समक्ष रखा जाए, ताकि उसे जिला न्यायपालिका तक औपचारिक रूप से प्रसारित किया जा सके। यह आदेश केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र के लिए एक चेतावनी और मार्गदर्शन दोनों है।


वह ‘प्रथा’ क्या थी जिस पर न्यायालय ने संज्ञान लिया?

        हालाँकि न्यायालय ने अपने आदेश में किसी एक जिले या न्यायिक अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से लक्षित नहीं किया, परंतु यह स्पष्ट किया गया कि हरियाणा की कुछ निचली अदालतों में एक ऐसी प्रक्रिया अपनाई जा रही थी जो:

  • विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थी
  • उच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों से असंगत थी
  • अभियुक्तों या वादकारियों के अधिकारों को प्रभावित कर रही थी
  • न्यायिक विवेक के स्थान पर यांत्रिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दे रही थी

न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “प्रथा” यदि कानून के विपरीत हो, तो वह कभी भी वैध नहीं मानी जा सकती।


उच्च न्यायालय का निर्देश क्यों महत्वपूर्ण है?

      जब कोई उच्च न्यायालय यह कहता है कि उसका आदेश मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया जाए, तो यह केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि इसके पीछे गहरा प्रशासनिक और संवैधानिक उद्देश्य होता है।

मुख्य न्यायाधीश न केवल न्यायिक प्रमुख होते हैं, बल्कि उच्च न्यायालय के प्रशासनिक मुखिया भी होते हैं। उनके माध्यम से:

  • आदेश पूरे राज्य की जिला न्यायपालिका तक पहुँचता है
  • एकरूपता सुनिश्चित होती है
  • न्यायिक अधिकारियों को औपचारिक दिशा-निर्देश मिलते हैं
  • भविष्य में ऐसी प्रथाओं की पुनरावृत्ति रोकी जाती है

संविधान के अनुच्छेद 227 की भूमिका

     भारतीय संविधान का अनुच्छेद 227 उच्च न्यायालय को अपनी अधीनस्थ अदालतों पर अधीक्षण (Superintendence) की शक्ति देता है। यह शक्ति केवल अपील या पुनरीक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रशासनिक नियंत्रण भी सम्मिलित है।

इस अनुच्छेद का उद्देश्य है:

  • न्यायिक अनुशासन बनाए रखना
  • प्रक्रिया में एकरूपता लाना
  • न्यायिक विचलनों को समय रहते सुधारना
  • न्याय प्रणाली में विश्वास बनाए रखना

उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया यह निर्देश अनुच्छेद 227 की भावना का प्रत्यक्ष उदाहरण है।


जिला न्यायपालिका: न्याय का पहला दरवाज़ा

जिला न्यायालय आम नागरिक के लिए न्याय का पहला मंच होता है। यदि यहाँ प्रक्रिया में त्रुटि हो, तो उसका प्रभाव केवल एक मामले तक सीमित नहीं रहता, बल्कि:

  • न्याय में देरी होती है
  • अपीलों की संख्या बढ़ती है
  • उच्च न्यायालयों पर बोझ बढ़ता है
  • जनता का विश्वास कमजोर होता है

इसलिए उच्च न्यायालय यह सुनिश्चित करना चाहता है कि जिला स्तर पर न्यायिक प्रक्रिया कानून के अनुरूप, पारदर्शी और निष्पक्ष हो।


‘प्रथा’ बनाम ‘कानून’: कौन श्रेष्ठ?

भारतीय विधि व्यवस्था में यह सिद्धांत स्थापित है कि:

“Practice cannot override law.”

अर्थात कोई भी परंपरा, सुविधा या स्थानीय व्यवस्था कानून से ऊपर नहीं हो सकती।

यदि कोई न्यायिक प्रथा:

  • मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती हो
  • प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हो
  • उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों से विपरीत हो

तो उसे तुरंत समाप्त किया जाना आवश्यक है।


न्यायिक प्रशासन और जवाबदेही

न्यायालय के आदेश को मुख्य न्यायाधीश के माध्यम से प्रसारित करने का एक उद्देश्य यह भी है कि जिला न्यायपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

जब आदेश आधिकारिक रूप से सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को भेजा जाता है, तब:

  • प्रत्येक न्यायिक अधिकारी उससे अवगत होता है
  • अनुपालन की अपेक्षा की जाती है
  • भविष्य में किसी भी विचलन पर स्पष्टीकरण माँगा जा सकता है

यह व्यवस्था न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखती है।


हरियाणा की न्यायिक व्यवस्था के लिए संदेश

यह आदेश हरियाणा की न्यायपालिका को स्पष्ट संदेश देता है कि:

  • सुविधा के नाम पर कानून से समझौता स्वीकार्य नहीं
  • न्यायिक विवेक का प्रयोग यांत्रिक नहीं होना चाहिए
  • प्रत्येक आदेश विधि, तर्क और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित होना चाहिए

यह निर्णय न्यायिक संस्कृति को अधिक उत्तरदायी, संवेदनशील और विधिसम्मत बनाने की दिशा में एक कदम है।


आम नागरिक पर इसका प्रभाव

इस आदेश का सीधा लाभ आम नागरिक को मिलेगा, क्योंकि:

  • न्यायिक प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होगी
  • अनावश्यक देरी कम होगी
  • निर्णयों में एकरूपता आएगी
  • मनमानी प्रथाओं पर रोक लगेगी

इससे न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास और मजबूत होगा।


भविष्य की दिशा: न्यायिक सुधार की ओर कदम

यह आदेश संकेत देता है कि आने वाले समय में:

  • न्यायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सुधार होगा
  • SOP (Standard Operating Procedures) को सख्ती से लागू किया जाएगा
  • डिजिटल सर्कुलर प्रणाली को मजबूत किया जाएगा
  • जिला न्यायाधीशों की समीक्षा बैठकों में इन विषयों पर चर्चा होगी

न्यायिक स्वतंत्रता बनाम प्रशासनिक नियंत्रण

कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि ऐसे निर्देश न्यायिक स्वतंत्रता को प्रभावित करते हैं, परंतु वास्तविकता यह है कि:

  • न्यायिक स्वतंत्रता निर्णय में होती है, न कि विधि से विचलन में
  • प्रशासनिक नियंत्रण न्यायिक गुणवत्ता बनाए रखने के लिए आवश्यक है
  • अनुशासन न्यायपालिका की शक्ति को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत करता है

निष्कर्ष

     हरियाणा में प्रचलित एक न्यायिक प्रथा पर संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय का यह निर्देश कि उसका आदेश मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत कर जिला न्यायपालिका तक पहुँचाया जाए — भारतीय न्यायिक व्यवस्था की आत्मशुद्धि का उदाहरण है।

यह आदेश यह स्पष्ट करता है कि:

कानून से ऊपर कोई प्रथा नहीं,
न्याय से ऊपर कोई सुविधा नहीं,
और संविधान से ऊपर कोई परंपरा नहीं।

      यह निर्णय केवल हरियाणा के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की न्यायपालिका के लिए एक प्रेरणा है कि न्याय केवल दिया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि सही प्रक्रिया से दिया जाना चाहिए।