“शत्रुतापूर्ण गवाह भी पूरी तरह अविश्वसनीय नहीं” — Dadu @ Ankush & Anr. बनाम State of Madhya Pradesh & Anr. में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने Dadu @ Ankush & Anr. बनाम State of Madhya Pradesh & Anr. मामले में साक्ष्य कानून की एक महत्वपूर्ण और व्यावहारिक व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया कि किसी गवाह को केवल ‘Hostile Witness’ (शत्रुतापूर्ण गवाह) घोषित कर देने मात्र से उसकी पूरी गवाही को स्वतः अस्वीकार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने दो टूक कहा कि गवाह की गवाही का वह हिस्सा जो अभियोजन या बचाव पक्ष के मामले से संगत, विश्वसनीय और परिस्थितियों से समर्थित हो—उसे स्वीकार किया जा सकता है। यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में साक्ष्य के मूल्यांकन को अधिक संतुलित, युक्तिसंगत और न्यायोचित बनाता है।
1. पृष्ठभूमि और विवाद का सार
इस प्रकरण में अभियोजन पक्ष ने कुछ गवाहों के बयान पर अपना मामला आधारित किया था। सुनवाई के दौरान एक प्रमुख गवाह अपने पूर्व कथनों से मुकर गया या अभियोजन के अपेक्षित संस्करण का पूर्ण समर्थन नहीं कर पाया, जिसके चलते उसे Hostile Witness घोषित किया गया। निचली अदालतों में इस तथ्य को लेकर मतभेद उभरे कि क्या ऐसे गवाह की संपूर्ण गवाही को त्याज्य मान लिया जाए, या फिर उसके उन अंशों को स्वीकार किया जाए जो सुसंगत और भरोसेमंद हों।
यहीं से विवाद सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा—जहाँ प्रश्न यह था कि क्या ‘hostility’ का ठप्पा लगते ही गवाही का मूल्य शून्य हो जाता है? या फिर साक्ष्य अधिनियम के सिद्धांतों के अनुरूप न्यायालय को सूक्ष्म परीक्षण करना चाहिए?
2. सुप्रीम कोर्ट का मुख्य निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
“किसी गवाह को शत्रुतापूर्ण घोषित किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि उसकी पूरी गवाही को बिना परीक्षण के खारिज कर दिया जाए। गवाही का वह हिस्सा जो विश्वसनीय हो, स्वतंत्र साक्ष्यों से पुष्ट हो, और तर्कसंगत प्रतीत हो—उसे स्वीकार किया जा सकता है।”
यह कथन भारतीय साक्ष्य अधिनियम की मूल भावना—सत्य की खोज—को केंद्र में रखता है।
3. ‘Hostile Witness’ की अवधारणा: एक विधिक परिप्रेक्ष्य
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में “Hostile Witness” शब्द का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, किंतु धारा 154 के अंतर्गत न्यायालय अभियोजन पक्ष को अपने ही गवाह से प्रतिपरीक्षा (cross-examination) की अनुमति दे सकता है, यदि गवाह प्रतिकूल आचरण करता है। इसका उद्देश्य यह नहीं कि गवाह की गवाही स्वतः अविश्वसनीय ठहराई जाए, बल्कि यह कि सत्य का उद्घाटन हो सके।
4. पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांतों की निरंतरता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में पूर्व के अनेक फैसलों की भावना को आगे बढ़ाया, जिनमें यह सिद्धांत स्थापित है कि:
- शत्रुतापूर्ण गवाह की गवाही पूरी तरह से अस्वीकार करने योग्य नहीं होती।
- न्यायालय को गवाही के स्वीकार्य अंशों को अलग कर देखना चाहिए।
- स्वतंत्र साक्ष्य, परिस्थितिजन्य साक्ष्य और दस्तावेज़ी प्रमाण यदि गवाही के किसी हिस्से का समर्थन करते हैं, तो वह हिस्सा मान्य हो सकता है।
यह निर्णय इसी न्यायिक परंपरा की पुष्टि करता है और निचली अदालतों को स्पष्ट मार्गदर्शन देता है।
5. साक्ष्य के मूल्यांकन का न्यायिक कर्तव्य
न्यायालय ने इस बात पर विशेष बल दिया कि न्यायाधीश का दायित्व मात्र लेबलिंग नहीं, बल्कि विश्लेषण है। गवाह के बयान में:
- क्या स्वाभाविकता है?
- क्या वह अन्य साक्ष्यों से मेल खाता है?
- क्या उसमें अंतर्विरोध गंभीर हैं या गौण?
इन प्रश्नों के उत्तर के आधार पर ही गवाही का मूल्यांकन होना चाहिए।
6. अभियोजन और बचाव—दोनों के लिए समान रूप से लागू
यह निर्णय केवल अभियोजन के हित में नहीं, बल्कि बचाव पक्ष के लिए भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। यदि कोई शत्रुतापूर्ण गवाह बचाव के पक्ष में कोई विश्वसनीय तथ्य स्थापित करता है, और वह अन्य साक्ष्यों से पुष्ट है, तो बचाव पक्ष उस अंश पर भरोसा कर सकता है।
7. व्यवहारिक यथार्थ और सामाजिक संदर्भ
भारतीय आपराधिक मुकदमों में गवाहों का शत्रुतापूर्ण होना एक आम समस्या है—जिसके कारणों में भय, दबाव, समझौता, सामाजिक रिश्ते या लंबी मुकदमेबाज़ी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह दृष्टिकोण यथार्थवादी है, क्योंकि यह स्वीकार करता है कि:
- सत्य कभी-कभी खंडित रूप में सामने आता है।
- न्यायालय का काम उन खंडों को जोड़कर सत्य की समग्र तस्वीर बनाना है।
8. ‘सत्य की खोज’ बनाम ‘तकनीकी अस्वीकृति’
न्यायालय ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश दिया कि तकनीकी आधारों पर न्याय से विमुख नहीं हुआ जा सकता। यदि गवाही का कोई हिस्सा सच के करीब ले जाता है, तो उसे केवल इसलिए नकार देना कि गवाह hostile है—न्याय के उद्देश्य के विपरीत होगा।
9. निचली अदालतों के लिए दिशानिर्देश
इस निर्णय से निचली अदालतों को यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि:
- Hostile घोषित करना अंत नहीं, शुरुआत है—विस्तृत मूल्यांकन की।
- गवाही को टुकड़ों में परखें, न कि समग्र रूप से त्याग दें।
- प्रत्येक स्वीकार्य अंश के लिए कारणों का उल्लेख करें।
10. अभियोजन की रणनीति पर प्रभाव
अब अभियोजन पक्ष के लिए यह आवश्यक होगा कि:
- Hostile गवाह की गवाही के संगत अंशों को अन्य साक्ष्यों से जोड़कर प्रस्तुत करे।
- केवल इस आधार पर मुकदमा न छोड़े कि गवाह पलट गया है।
11. बचाव पक्ष के लिए अवसर
बचाव पक्ष के लिए यह निर्णय एक अवसर भी है:
- यदि Hostile गवाह का कोई अंश अभियोजन की कहानी में संदेह पैदा करता है,
- या बचाव के संस्करण को बल देता है, तो उसे पूरी मजबूती से न्यायालय के समक्ष रखा जा सकता है।
12. आपराधिक न्याय प्रणाली पर दूरगामी प्रभाव
यह निर्णय:
- दोषसिद्धि और बरी—दोनों में संतुलन लाता है,
- न्यायालयों को यांत्रिक दृष्टिकोण से दूर करता है,
- और न्यायिक विवेक को सुदृढ़ करता है।
13. निष्कर्ष
Dadu @ Ankush & Anr. बनाम State of Madhya Pradesh & Anr. में सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय साक्ष्य कानून की व्याख्या में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह स्पष्ट करता है कि:
“गवाह की शत्रुता नहीं, उसकी गवाही की विश्वसनीयता निर्णायक है।”
यह फैसला भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक मानवीय, यथार्थवादी और न्यायोन्मुख बनाता है—जहाँ लक्ष्य केवल प्रक्रिया का पालन नहीं, बल्कि सत्य और न्याय की स्थापना है।