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केवल ‘वर्क फ्रॉम होम’ से तय नहीं होती बाल अभिरक्षा –Poonam Wadhwa बनाम Ajay Wadhwa & Others में सुप्रीम कोर्ट की दूरदर्शी व्याख्या

केवल ‘वर्क फ्रॉम होम’ से तय नहीं होती बाल अभिरक्षा –Poonam Wadhwa बनाम Ajay Wadhwa & Others में सुप्रीम कोर्ट की दूरदर्शी व्याख्या

प्रस्तावना

         वैवाहिक विवादों में जब पति-पत्नी अलग हो जाते हैं, तब सबसे गंभीर प्रश्न यह होता है कि नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा किसे सौंपी जाए। यह प्रश्न केवल माता-पिता के अधिकारों से जुड़ा नहीं होता, बल्कि बच्चे के भविष्य, मानसिक संतुलन, भावनात्मक सुरक्षा और समग्र विकास से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित होता है।

         तकनीक के विकास और कोविड-19 के बाद वर्क फ्रॉम होम की बढ़ती प्रवृत्ति ने बाल अभिरक्षा विवादों में एक नया तर्क जोड़ दिया है—
“मैं घर से काम करता/करती हूँ, इसलिए बच्चा मेरे साथ अधिक सुरक्षित है।”

      इसी तर्क की न्यायिक समीक्षा Poonam Wadhwa बनाम Ajay Wadhwa & Others मामले में सुप्रीम कोर्ट ने की और एक अत्यंत महत्वपूर्ण व यथार्थपरक सिद्धांत स्थापित किया।


मामले की सामाजिक और कानूनी पृष्ठभूमि

        वर्तमान समय में परिवार की संरचना तेजी से बदल रही है। संयुक्त परिवारों का स्थान एकल परिवार ले रहे हैं, जहाँ माता-पिता दोनों कामकाजी होते हैं। ऐसे में तलाक या अलगाव की स्थिति में बच्चे की देखरेख का प्रश्न और भी जटिल हो जाता है।

इस मामले में—

  • पति-पत्नी के बीच गंभीर वैवाहिक मतभेद उत्पन्न हो गए
  • दोनों पक्ष नाबालिग बच्चे की कस्टडी चाहते थे
  • एक पक्ष ने यह आधार लिया कि वह वर्क फ्रॉम होम करता है, इसलिए बच्चा उसके साथ अधिक समय बिता सकेगा

यह तर्क निचली अदालतों में भी चर्चा का विषय बना और अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा।


सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचारणीय प्रश्न

न्यायालय के सामने मूल रूप से निम्नलिखित प्रश्न थे—

  1. क्या घर से काम करना अपने-आप में बच्चे की कस्टडी पाने का मजबूत आधार है?
  2. क्या बाहर जाकर नौकरी करने वाला माता-पिता बच्चे की देखभाल कम कर सकता है?
  3. आधुनिक कार्य-संस्कृति के संदर्भ में बाल कल्याण की कसौटी क्या होनी चाहिए?

न्यायालय की व्यावहारिक और संतुलित सोच

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अत्यंत संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। कोर्ट ने किसी भी प्रकार की अतिरंजना से बचते हुए जीवन की वास्तविकताओं को ध्यान में रखा।

1. वर्क फ्रॉम होम भी पूर्णकालिक कार्य है

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

“वर्क फ्रॉम होम का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति हर समय बच्चे के लिए उपलब्ध रहेगा।”

घर से काम करने वाले व्यक्ति को भी—

  • मीटिंग्स अटेंड करनी होती हैं
  • समयसीमा (Deadlines) पूरी करनी होती हैं
  • मानसिक एकाग्रता बनाए रखनी होती है

अतः यह मान लेना कि ऐसा व्यक्ति बच्चे को हर समय देख सकता है, व्यावहारिक सत्य के विपरीत है।


2. बाहर जाकर काम करना अभिभावकीय अक्षमता नहीं

न्यायालय ने इस सोच को भी खारिज किया कि—

जो माता-पिता बाहर जाकर नौकरी करता है, वह बच्चे के प्रति कम जिम्मेदार होता है।

कोर्ट ने कहा कि—

  • आजीविका कमाना माता-पिता का कर्तव्य है
  • आर्थिक स्थिरता बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए आवश्यक है
  • रोजगार के कारण कुछ समय के लिए बच्चे से दूर रहना स्वाभाविक है

यह किसी भी स्थिति में कस्टडी से वंचित करने का आधार नहीं बन सकता।


बाल कल्याण का सर्वोच्च सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने पुनः दोहराया कि—

बाल अभिरक्षा के मामलों में ‘Welfare of the Child’ ही सर्वोपरि मानदंड है।

इस सिद्धांत के अंतर्गत न्यायालय निम्न पहलुओं पर विचार करता है—

  • बच्चे की आयु
  • भावनात्मक जुड़ाव
  • शैक्षणिक वातावरण
  • नैतिक और सामाजिक संस्कार
  • मानसिक स्थिरता और सुरक्षा

कोर्ट ने कहा कि माता-पिता की सुविधा या कार्य-पद्धति इस सिद्धांत से ऊपर नहीं हो सकती।


भावनात्मक उपलब्धता बनाम भौतिक उपस्थिति

इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कोर्ट ने भावनात्मक उपलब्धता (Emotional Availability) और भौतिक उपस्थिति (Physical Presence) के बीच अंतर स्पष्ट किया।

केवल घर में मौजूद होना यह सिद्ध नहीं करता कि—

  • बच्चा भावनात्मक रूप से सुरक्षित है
  • माता-पिता बच्चे की मानसिक आवश्यकताओं को समझ पा रहा है

कभी-कभी बाहर काम करने वाला माता-पिता सीमित समय में भी बच्चे को बेहतर गुणवत्ता वाला समय दे सकता है।


लैंगिक समानता की दिशा में एक कदम

यह निर्णय पारंपरिक धारणाओं को तोड़ता है—

  • कि माँ ही स्वाभाविक अभिभावक होती है
  • कि पिता की भूमिका केवल आर्थिक होती है

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

बाल अभिरक्षा का प्रश्न लिंग नहीं, योग्यता और परिस्थिति पर आधारित होना चाहिए।

यह विचार संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) की भावना के अनुरूप है।


गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 के संदर्भ में निर्णय

न्यायालय ने इस मामले में यह भी स्पष्ट किया कि—

  • किसी भी वैधानिक प्रावधान में वर्क फ्रॉम होम को कस्टडी का विशेष आधार नहीं माना गया है
  • न्यायालय को समग्र परिस्थितियों का मूल्यांकन करना होता है

इस प्रकार यह फैसला विधिक प्रावधानों की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।


डिजिटल युग में परिवार कानून का विकास

यह निर्णय इस बात का संकेत है कि भारतीय न्यायपालिका—

  • बदलते सामाजिक ढाँचे
  • तकनीकी प्रगति
  • कार्य-संस्कृति में परिवर्तन

को समझते हुए कानून की व्याख्या कर रही है।

कोर्ट ने यह संदेश दिया कि कानून स्थिर नहीं है, बल्कि समय के साथ विकसित होता है।


भविष्य के मामलों पर प्रभाव

इस निर्णय का प्रभाव—

  • पारिवारिक न्यायालयों
  • उच्च न्यायालयों
  • कस्टडी से जुड़े अंतरिम आदेशों

पर स्पष्ट रूप से दिखाई देगा।

अब केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि—

“मैं घर से काम करता/करती हूँ, इसलिए कस्टडी मुझे मिले।”


समाज के लिए संदेश

यह फैसला समाज को भी एक महत्वपूर्ण संदेश देता है—

  • माता-पिता होना केवल समय देने का प्रश्न नहीं
  • बल्कि समझ, संवेदना और जिम्मेदारी का विषय है

बच्चे को दोनों माता-पिता के प्रेम और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, चाहे वे साथ रहें या अलग।


निष्कर्ष

       Poonam Wadhwa बनाम Ajay Wadhwa & Others का यह निर्णय भारतीय परिवार कानून में एक यथार्थवादी, संतुलित और बाल-केंद्रित दृष्टिकोण को स्थापित करता है।

इस फैसले से स्पष्ट होता है कि—

  • वर्क फ्रॉम होम कोई निर्णायक कारक नहीं
  • आजीविका कमाना दोष नहीं
  • बच्चे का सर्वांगीण कल्याण ही सर्वोच्च है

यह निर्णय न्यायिक विवेक, सामाजिक समझ और संवैधानिक मूल्यों का उत्कृष्ट उदाहरण है।