“राज्य को नहीं है न्यूनतम पात्रता घटाने का अधिकार” — NEET-UG (BDS) 2016–17 में राजस्थान सरकार का निर्णय अवैध सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला
भारतीय शिक्षा व्यवस्था, विशेष रूप से मेडिकल और डेंटल शिक्षा, लंबे समय से पारदर्शिता, समानता और योग्यता (Merit) के सिद्धांतों पर आधारित रही है। इन्हीं सिद्धांतों की रक्षा करते हुए Supreme Court ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि State of Rajasthan को NEET-UG परीक्षा के माध्यम से बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी (BDS) पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए न्यूनतम पात्रता प्रतिशत (Minimum Qualifying Percentile) को घटाने का कोई अधिकार नहीं था।
अदालत ने कहा कि शैक्षणिक सत्र 2016–17 के लिए राजस्थान सरकार द्वारा लिया गया यह निर्णय स्पष्ट रूप से अवैध (Manifestly Illegal) था और यह केंद्रीय कानूनों, विनियमों तथा राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश व्यवस्था के प्रतिकूल था।
यह फैसला न केवल हजारों छात्रों के हितों से जुड़ा है, बल्कि यह केंद्र–राज्य संबंधों, शैक्षणिक स्वायत्तता और मेडिकल शिक्षा में एकरूपता (Uniformity) के सिद्धांत को भी मजबूती देता है।
मामले की पृष्ठभूमि
वर्ष 2016–17 में NEET-UG को देशभर में मेडिकल और डेंटल पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए एकमात्र राष्ट्रीय परीक्षा के रूप में लागू किया गया था। इसका उद्देश्य था—
- योग्यता आधारित प्रवेश
- राज्यों के अलग-अलग मानदंडों को समाप्त करना
- छात्रों को समान अवसर प्रदान करना
हालांकि, NEET-UG के परिणाम आने के बाद राजस्थान सरकार ने यह तर्क देते हुए कि BDS सीटें खाली रह जाएंगी, न्यूनतम पात्रता प्रतिशत को कम करने का निर्णय लिया। इसके आधार पर कुछ ऐसे छात्रों को भी प्रवेश दिया गया, जो NEET द्वारा निर्धारित मूल मानकों को पूरा नहीं करते थे।
कानूनी विवाद का मूल प्रश्न
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि—
क्या कोई राज्य सरकार, NEET जैसी राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा में निर्धारित न्यूनतम पात्रता मानदंड को अपने स्तर पर घटा सकती है?
क्या यह अधिकार राज्य सरकार के पास है, या यह केवल केंद्र सरकार/संबंधित वैधानिक निकायों तक सीमित है?
सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट और सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देते हुए कहा—
“राज्य सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने स्तर पर NEET-UG जैसी राष्ट्रीय परीक्षा में न्यूनतम पात्रता प्रतिशत को कम करे। ऐसा करना कानून के विपरीत है और इसे किसी भी स्थिति में वैध नहीं ठहराया जा सकता।”
अदालत ने यह भी जोड़ा कि राजस्थान सरकार का यह निर्णय—
- केंद्रीय ढांचे (Federal Structure) के विरुद्ध है
- राष्ट्रीय मानकों (National Standards) को कमजोर करता है
- योग्य छात्रों के अधिकारों का हनन करता है
BDS और मेडिकल शिक्षा में केंद्रीय भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह रेखांकित किया कि—
- मेडिकल और डेंटल शिक्षा एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है
- इसमें गुणवत्ता से समझौता सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है
BDS जैसे पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए न्यूनतम पात्रता तय करना केवल प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि शैक्षणिक और सामाजिक जिम्मेदारी का विषय है।
राज्य बनाम केंद्र: अधिकार क्षेत्र का प्रश्न
अदालत ने स्पष्ट किया कि—
- NEET-UG एक केंद्रीयकृत प्रवेश प्रक्रिया है
- इसके नियम और मानदंड केंद्र सरकार और संबंधित वैधानिक निकायों द्वारा तय किए जाते हैं
- राज्य सरकारें इन मानदंडों को न तो बदल सकती हैं और न ही शिथिल कर सकती हैं
राजस्थान सरकार का यह तर्क कि सीटें खाली न रहें, अदालत ने अस्वीकार कर दिया।
सीट खाली रहने का तर्क क्यों अस्वीकार्य?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा—
- सीटों का खाली रहना योग्यता से समझौता करने का आधार नहीं हो सकता
- कम योग्यता वाले छात्रों को प्रवेश देना भविष्य में
- खराब शैक्षणिक स्तर
- अयोग्य चिकित्सक/दंत चिकित्सक
- और जनता के स्वास्थ्य के लिए खतरा
उत्पन्न कर सकता है।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा—
- योग्यता (Merit) को प्रशासनिक सुविधा पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए
- राज्यों द्वारा अलग-अलग मानदंड अपनाने से
- छात्रों में असमानता
- और शिक्षा प्रणाली में अव्यवस्था
पैदा होगी
2016–17 के छात्रों पर प्रभाव
इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि—
- जिन छात्रों को कम किए गए मानदंडों के आधार पर BDS में प्रवेश मिला था
- उनका प्रवेश कानूनी रूप से अस्थिर माना गया
हालांकि अदालत ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए यह भी देखा कि—
- मामला पुराना है
- छात्र अपने पाठ्यक्रम के अंतिम चरण में हो सकते हैं
इसलिए प्रत्येक मामले में न्यायसंगत संतुलन आवश्यक होगा।
भविष्य के लिए स्पष्ट संदेश
यह फैसला आने वाले वर्षों के लिए एक स्पष्ट न्यायिक मिसाल (Precedent) स्थापित करता है कि—
- कोई भी राज्य सरकार
- राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा के मानकों से
- एकतरफा छेड़छाड़ नहीं कर सकती
छात्रों और अभिभावकों के लिए संदेश
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय छात्रों को यह भरोसा देता है कि—
- उनकी मेहनत और योग्यता के साथ अन्याय नहीं होगा
- कोई भी राज्य सरकार मनमाने ढंग से नियम नहीं बदल सकती
शिक्षा व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव
इस फैसले से—
- मेडिकल और डेंटल शिक्षा में राष्ट्रीय एकरूपता मजबूत होगी
- राज्यों के मनमाने फैसलों पर रोक लगेगी
- शिक्षा प्रणाली में विश्वसनीयता और पारदर्शिता बढ़ेगी
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि—
“मेडिकल शिक्षा में योग्यता से समझौता नहीं किया जा सकता, चाहे कारण प्रशासनिक हो या राजनीतिक।”
राजस्थान सरकार द्वारा NEET-UG (BDS) 2016–17 में न्यूनतम पात्रता प्रतिशत घटाने का निर्णय न केवल अवैध था, बल्कि यह शिक्षा के बुनियादी सिद्धांतों के भी खिलाफ था।
यह निर्णय—
- संविधान के तहत शक्तियों के संतुलन को बनाए रखता है
- छात्रों के अधिकारों की रक्षा करता है
- और भारतीय चिकित्सा शिक्षा को सही दिशा में आगे ले जाता है
इस प्रकार, यह फैसला भारतीय न्यायपालिका द्वारा शिक्षा, योग्यता और सार्वजनिक हित की रक्षा का एक और सशक्त उदाहरण बनकर सामने आता है।