13 वर्षों से वेजीटेटिव स्टेट में पड़े बेटे की ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ पर सुप्रीम कोर्ट का मानवीय मंथन— हरीश राणा मामले में जीवन, गरिमा और करुणा के बीच न्यायिक संतुलन
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार केवल सांस लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सम्मानपूर्वक जीवन और गरिमामय मृत्यु की अवधारणा भी अंतर्निहित मानी गई है। इसी संवैधानिक दर्शन के आलोक में हाल ही में Supreme Court ने एक अत्यंत संवेदनशील और मानवीय मामले में गाजियाबाद निवासी 31 वर्षीय हरीश राणा के माता-पिता को 13 जनवरी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिए तलब किया है, ताकि उनके बेटे की निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) पर अंतिम निर्णय लिया जा सके।
यह मामला केवल एक व्यक्ति के जीवन-मरण का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह मानव गरिमा, चिकित्सा नैतिकता, संवैधानिक मूल्यों और परिवार की पीड़ा—इन सभी के बीच संतुलन स्थापित करने की न्यायिक कोशिश का प्रतीक है।
मामले की पृष्ठभूमि: एक हादसा, जो जीवनभर का कारावास बन गया
हरीश राणा का जीवन वर्ष 2013 में उस समय पूरी तरह बदल गया, जब वे एक दुर्घटना में चौथी मंजिल से गिर पड़े। इस भयावह हादसे में उन्हें गंभीर मस्तिष्क चोट (Severe Brain Injury) आई, जिसके बाद वे कोमा में चले गए। समय बीतने के साथ कोमा की स्थिति स्थायी वेजीटेटिव स्टेट (Persistent Vegetative State) में बदल गई।
पिछले 13 वर्षों से—
- हरीश न बोल सकते हैं
- न चल सकते हैं
- न ही किसी प्रकार की चेतन प्रतिक्रिया दे सकते हैं
- वे पूरी तरह लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर हैं
उनका जीवन केवल चिकित्सीय उपकरणों और देखभाल तक सीमित रह गया है।
एम्स की मेडिकल रिपोर्ट: आशा की लगभग समाप्ति
मामले में अदालत के निर्देश पर All India Institute of Medical Sciences (एम्स) द्वारा एक विस्तृत चिकित्सकीय जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। इस रिपोर्ट में स्पष्ट शब्दों में कहा गया—
- हरीश की स्थिति अपरिवर्तनीय (Irreversible) है
- उनके ठीक होने या चेतन अवस्था में लौटने की संभावना लगभग शून्य है
- चिकित्सा विज्ञान की वर्तमान स्थिति में कोई ऐसा उपचार उपलब्ध नहीं है, जिससे उनकी दशा में सुधार हो सके
इस रिपोर्ट ने अदालत के समक्ष यह कठोर वास्तविकता रख दी कि—
हरीश का जीवन अब केवल जैविक अस्तित्व (Biological Existence) तक सीमित है, न कि सचेत और गरिमामय जीवन तक।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ की टिप्पणी: “अब अंतिम फैसला लेने का समय”
इस मामले की सुनवाई के दौरान Justice J.B. Pardiwala की अध्यक्षता वाली पीठ ने अत्यंत भावुक लेकिन संतुलित टिप्पणी करते हुए कहा—
“अब अंतिम फैसला लेने का समय आ गया है। किसी व्यक्ति को इस तरह की पीड़ादायक स्थिति में अनंतकाल तक जीवित नहीं रखा जा सकता।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि—
- यह निर्णय यांत्रिक या केवल कानूनी नहीं होगा
- माता-पिता से व्यक्तिगत बातचीत के बाद
- उनकी भावनाओं, सहमति और मानसिक स्थिति को समझते हुए
- लाइफ सपोर्ट हटाने पर निर्णय लिया जाएगा
निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia): कानूनी अवधारणा
निष्क्रिय इच्छामृत्यु का अर्थ है—
- किसी रोगी को मारने की क्रिया नहीं, बल्कि
- ऐसे कृत्रिम चिकित्सा उपायों को हटाना, जो केवल जीवन को यांत्रिक रूप से बनाए हुए हों
इसमें—
- वेंटिलेटर
- फीडिंग ट्यूब
- अन्य जीवनरक्षक उपकरण
को हटाया जाता है, ताकि प्रकृति अपना स्वाभाविक क्रम पूरा कर सके।
भारतीय कानून में सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) अभी भी अपराध है, लेकिन निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ वैध माना है।
पूर्व न्यायिक मिसालें: जीवन से गरिमामय विदाई का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्ववर्ती निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि—
- यदि रोगी की स्थिति
- अपरिवर्तनीय हो
- और
- चिकित्सा रूप से निराशाजनक हो
- तथा
- परिवार की सूचित और स्वैच्छिक सहमति हो
तो निष्क्रिय इच्छामृत्यु को अनुमति दी जा सकती है।
अदालत ने यह भी कहा है कि—
“जीवन का अधिकार केवल अस्तित्व का अधिकार नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ जीने और मरने का अधिकार भी है।”
माता-पिता की पीड़ा: एक अनकहा संघर्ष
हरीश के माता-पिता पिछले 13 वर्षों से—
- बेटे को जीवित रखने के लिए
- आर्थिक
- शारीरिक
- मानसिक
हर स्तर पर संघर्ष कर रहे हैं।
उनके लिए यह स्थिति—
- आशा और निराशा के बीच झूलती रही
- हर दिन बेटे को उसी हालत में देखकर
- एक नया मानसिक आघात बन गई
अब जब चिकित्सा विज्ञान भी जवाब दे चुका है, तो उनके सामने सबसे कठिन प्रश्न खड़ा है—
क्या बेटे को केवल मशीनों के सहारे जीवित रखना वास्तव में उसका भला है?
अदालत द्वारा माता-पिता से व्यक्तिगत बातचीत क्यों आवश्यक?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—
- यह निर्णय केवल दस्तावेज़ों और रिपोर्टों के आधार पर नहीं लिया जाएगा
- माता-पिता की
- भावनात्मक स्थिति
- मानसिक सहमति
- और स्वेच्छा
को समझना अनिवार्य है।
अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि—
- कोई दबाव
- कोई मजबूरी
- या कोई जल्दबाज़ी
इस निर्णय के पीछे न हो।
नैतिक और संवैधानिक संतुलन
यह मामला दो महत्वपूर्ण मूल्यों के बीच संतुलन की मांग करता है—
1. जीवन की पवित्रता
2. मानवीय गरिमा और करुणा
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि—
- जीवन को केवल इसलिए बनाए रखना कि तकनीक ऐसा कर सकती है
- हमेशा नैतिक या मानवीय निर्णय नहीं होता
समाज के लिए संदेश
यह मामला समाज को यह सोचने पर मजबूर करता है कि—
- क्या हर सांस लेना ही जीवन है?
- या जीवन का अर्थ चेतना, गरिमा और संबंधों से भी जुड़ा है?
सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि—
- कानून संवेदनहीन नहीं है
- बल्कि वह मानवीय पीड़ा को समझने की क्षमता रखता है
चिकित्सा जगत पर प्रभाव
इस निर्णय से—
- डॉक्टरों
- अस्पतालों
- और मेडिकल बोर्ड्स
को यह मार्गदर्शन मिलेगा कि—
- निराशाजनक मामलों में
- नैतिक और कानूनी ढांचे के भीतर
- कैसे निर्णय लिया जाए।
भविष्य के मामलों के लिए नजीर
हरीश राणा का मामला—
- भविष्य में आने वाले
- वेजीटेटिव स्टेट
- और टर्मिनल इलनेस
से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल बनेगा।
यह फैसला यह स्पष्ट करेगा कि—
- निष्क्रिय इच्छामृत्यु कोई अपराध नहीं
- बल्कि अत्यंत सावधानी और करुणा से लिया गया निर्णय हो सकता है।
निष्कर्ष: करुणा के साथ न्याय
हरीश राणा का मामला भारतीय न्यायपालिका के समक्ष सबसे कठिन प्रश्नों में से एक को प्रस्तुत करता है—
क्या जीवन को केवल इसलिए खींचा जाना चाहिए क्योंकि तकनीक ऐसा कर सकती है, या कभी-कभी करुणा और गरिमा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा माता-पिता को व्यक्तिगत रूप से सुनने का निर्णय यह दर्शाता है कि—
- न्याय केवल कानून नहीं
- बल्कि संवेदना, मानवता और विवेक का भी नाम है।
13 जनवरी को होने वाली यह बातचीत केवल एक परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए यह तय करेगी कि हम जीवन और मृत्यु को किस दृष्टि से देखते हैं—केवल जैविक या मानवीय गरिमा के साथ।