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12 वर्षों से वेजिटेटिव स्टेट में युवक और पैसिव यूथेनेशिया का प्रश्न: AIIMS रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक सुनवाई

12 वर्षों से वेजिटेटिव स्टेट में युवक और पैसिव यूथेनेशिया का प्रश्न: AIIMS रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक सुनवाई

        भारतीय न्यायपालिका के समक्ष कई बार ऐसे प्रश्न आते हैं, जिनका उत्तर केवल कानून की पुस्तकों में नहीं, बल्कि मानव गरिमा, करुणा और नैतिकता के गहरे स्तर पर खोजा जाता है। ऐसा ही एक अत्यंत संवेदनशील मामला हाल ही में Supreme Court of India के समक्ष आया, जहां अदालत ने All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) की उस मेडिकल रिपोर्ट पर विचार किया, जो एक ऐसे युवक से संबंधित है, जो पिछले 12 वर्षों से वेजिटेटिव स्टेट में है।

        यह मामला केवल एक व्यक्ति के जीवन या मृत्यु तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21, चिकित्सा नैतिकता, परिवार की पीड़ा और “गरिमा के साथ मृत्यु” जैसे मूलभूत प्रश्नों को केंद्र में लाता है।


मामला: 12 वर्षों की असहनीय प्रतीक्षा

मामले के तथ्य अत्यंत मार्मिक हैं—

  • करीब 12 वर्ष पूर्व एक 32 वर्षीय युवक
  • एक इमारत से गिरने के कारण
  • गंभीर मस्तिष्क चोट (Severe Brain Injury) का शिकार हो गया

इस दुर्घटना के बाद—

  • युवक चेतना में कभी वापस नहीं आ सका
  • न वह बोल सकता है
  • न ही किसी बाहरी उत्तेजना पर प्रतिक्रिया देता है
  • उसे लगातार कृत्रिम चिकित्सा सहायता पर रखा गया है

चिकित्सकीय भाषा में उसे Persistent Vegetative State (PVS) में बताया गया है।

इन 12 वर्षों में—

  • परिवार ने उम्मीद नहीं छोड़ी
  • हर संभव इलाज कराया
  • लेकिन स्थिति में कोई सार्थक सुधार नहीं हुआ

अंततः परिजनों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।


अदालत के समक्ष मुख्य प्रश्न

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने मूल प्रश्न यह था—

क्या ऐसे व्यक्ति को, जिसकी चेतना लौटने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है, कृत्रिम उपचार के सहारे अनिश्चित काल तक जीवित रखना उचित है?
क्या यह जीवन की रक्षा है या अनावश्यक पीड़ा को लंबा खींचना?
क्या पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी जा सकती है?


पैसिव यूथेनेशिया: अवधारणा और कानूनी अर्थ

पैसिव यूथेनेशिया का अर्थ है—

  • किसी व्यक्ति की मृत्यु को सक्रिय रूप से उत्पन्न करना नहीं
  • बल्कि
    • जीवन रक्षक मशीनें
    • कृत्रिम पोषण
    • या ऐसे उपचार

को रोक देना, जो केवल शरीर को जीवित बनाए रखे हुए हों, जबकि चेतना और सुधार की कोई संभावना न हो।

यह अवधारणा भारत में—

  • सक्रिय यूथेनेशिया से अलग है
  • और सीमित परिस्थितियों में
  • न्यायिक स्वीकृति प्राप्त कर चुकी है।

अनुच्छेद 21 और “गरिमा के साथ मृत्यु”

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को—

  • जीवन
  • और व्यक्तिगत स्वतंत्रता

का अधिकार प्रदान करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि—

“जीवन का अधिकार केवल जैविक अस्तित्व नहीं, बल्कि गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।”

इसी क्रम में अदालत ने यह भी माना है कि—

  • गरिमा के साथ जीने का अधिकार
  • कुछ परिस्थितियों में
  • गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को भी समाहित करता है।

AIIMS की भूमिका: चिकित्सा विज्ञान का आधार

इस संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने—

  • भावनाओं पर नहीं
  • बल्कि
  • वैज्ञानिक और चिकित्सकीय तथ्यों पर

निर्भर रहने का मार्ग चुना।

अदालत के निर्देश पर AIIMS के वरिष्ठ डॉक्टरों की एक विशेषज्ञ समिति ने—

  • युवक की शारीरिक स्थिति
  • मस्तिष्क की कार्यप्रणाली
  • और संभावित रिकवरी

का विस्तृत मूल्यांकन किया।

AIIMS की रिपोर्ट का उद्देश्य था—

  • यह स्पष्ट करना कि
    • क्या युवक की स्थिति अपरिवर्तनीय (Irreversible) है
    • या भविष्य में किसी भी प्रकार की चेतना लौटने की संभावना शेष है।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई: संतुलन की तलाश

18 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने—

  • AIIMS की रिपोर्ट को ध्यानपूर्वक पढ़ा
  • और यह स्पष्ट किया कि
    • इस तरह के मामलों में जल्दबाजी नहीं की जा सकती

अदालत ने माना कि—

  • यह केवल कानूनी नहीं
  • बल्कि
  • गहरे मानवीय और नैतिक प्रश्नों से जुड़ा मामला है।

परिवार की पीड़ा: एक अनकहा सच

इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक पीड़ा—

  • युवक के परिवार ने झेली है।

12 वर्षों तक—

  • लगातार अस्पतालों के चक्कर
  • आर्थिक बोझ
  • भावनात्मक टूटन
  • और सामाजिक अनिश्चितता

ने परिवार को भीतर से तोड़ दिया।

परिवार का प्रश्न सरल है—

“क्या मशीनों के सहारे चल रही सांसों को ही जीवन कहा जा सकता है, जब चेतना, स्मृति और व्यक्तित्व समाप्त हो चुके हों?”


चिकित्सा नैतिकता और डॉक्टरों की दुविधा

डॉक्टरों के लिए भी यह स्थिति आसान नहीं होती—

  • एक ओर
    • जीवन बचाने का कर्तव्य
  • दूसरी ओर
    • यह समझ कि उपचार व्यर्थ हो चुका है

चिकित्सा नैतिकता कहती है कि—

  • यदि उपचार
    • रोगी को कोई लाभ नहीं दे रहा
    • और केवल पीड़ा बढ़ा रहा है

तो उसे Futile Treatment माना जा सकता है।

AIIMS जैसी संस्था की रिपोर्ट इसलिए निर्णायक बन जाती है।


पूर्व न्यायिक दृष्टांत

भारत में सुप्रीम कोर्ट पहले भी—

  • पैसिव यूथेनेशिया
  • और एंड-ऑफ-लाइफ केयर

पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कर चुका है।

अदालत ने यह सिद्धांत स्थापित किया है कि—

  • मरीज
  • या उसके परिजन
  • और डॉक्टर

सभी की सहमति और न्यायिक निगरानी में—

  • पैसिव यूथेनेशिया पर विचार किया जा सकता है।

समाज पर प्रभाव

यह मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। इसके व्यापक प्रभाव हैं—

  • हजारों ऐसे परिवार
  • जो वर्षों से
    • कोमा
    • वेजिटेटिव स्टेट
    • या गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थितियों

से जूझ रहे अपनों की देखभाल कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय—

  • भविष्य में
  • ऐसे मामलों के लिए
  • स्पष्ट दिशा प्रदान करेगा।

जीवन बनाम अस्तित्व: दार्शनिक प्रश्न

यह मामला हमें सोचने पर मजबूर करता है—

  • क्या जीवन केवल
    • दिल की धड़कन
    • और सांसों का चलना है?
  • या जीवन का अर्थ
    • चेतना
    • अनुभूति
    • और गरिमा से जुड़ा है?

कानून को इन दार्शनिक प्रश्नों का भी सामना करना पड़ता है।


आगे की प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट—

  • AIIMS की रिपोर्ट
  • परिवार की इच्छा
  • और संवैधानिक सिद्धांतों

के आधार पर—

  • अंतिम निर्णय लेगा कि
    • पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी जाए या नहीं।

यह फैसला—

  • न केवल इस युवक के लिए
  • बल्कि
  • भविष्य के सभी समान मामलों के लिए

एक महत्वपूर्ण न्यायिक मार्गदर्शन बनेगा।


निष्कर्ष

12 वर्षों से वेजिटेटिव स्टेट में पड़े युवक के मामले में AIIMS रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई यह दर्शाती है कि—

  • भारतीय न्यायपालिका
  • जीवन और मृत्यु जैसे संवेदनशील विषयों पर
  • अत्यंत सावधानी
  • करुणा
  • और संतुलन

के साथ निर्णय लेती है।

यह मामला हमें यह याद दिलाता है कि—

“कानून केवल नियमों का संकलन नहीं, बल्कि मानव गरिमा की रक्षा का माध्यम है।”

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय निस्संदेह—

  • भारतीय संवैधानिक कानून
  • चिकित्सा नैतिकता
  • और मानवीय मूल्यों

के संगम का एक ऐतिहासिक उदाहरण बनेगा, जो आने वाले वर्षों में “गरिमा के साथ मृत्यु” की अवधारणा को नई दिशा प्रदान करेगा।