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₹103 करोड़ हवाला व GST फ्रॉड का खुलासा: बरेली से 2 गिरफ्तार, छोटे कारीगरों की पहचान का दुरुपयोग कर खड़ा किया गया विशाल फर्जी नेटवर्क

₹103 करोड़ हवाला व GST फ्रॉड का खुलासा: बरेली से 2 गिरफ्तार, छोटे कारीगरों की पहचान का दुरुपयोग कर खड़ा किया गया विशाल फर्जी नेटवर्क

बिजनौर/बरेली।
उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले में पुलिस ने एक ऐसे संगठित आर्थिक अपराध नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है, जिसने न सिर्फ़ हवाला और GST चोरी जैसे गंभीर अपराधों को अंजाम दिया, बल्कि छोटे कारीगरों, दिहाड़ी मज़दूरों और सामान्य व्यापारियों की पहचान का दुरुपयोग कर पूरे तंत्र को खड़ा किया। इस मामले में अब तक ₹103 करोड़ से अधिक के संदिग्ध लेनदेन का खुलासा हुआ है और दो आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह नेटवर्क कहीं अधिक बड़ा हो सकता है और आने वाले दिनों में कई और नाम सामने आ सकते हैं।


मामला कैसे सामने आया: एक आयकर नोटिस से खुली परतें

इस पूरे मामले की शुरुआत बेहद साधारण लेकिन चौंकाने वाली घटना से हुई। केसरपुर गांव निवासी एक ज़री कारीगर शब्बू (बदला हुआ नाम) को आयकर विभाग से करीब ₹1.5 करोड़ के लेनदेन को लेकर नोटिस मिला। शब्बू के लिए यह नोटिस किसी सदमे से कम नहीं था, क्योंकि उसकी आय सीमित थी और उसने अपने जीवन में इतनी बड़ी रकम का लेनदेन कभी किया ही नहीं था।

नोटिस में उसके नाम से कई व्यापारिक फर्मों और बैंक खातों के ज़रिये बड़े पैमाने पर लेनदेन दिखाए गए थे। जब शब्बू ने यह स्पष्ट किया कि उसने न तो कोई फर्म खोली है और न ही ऐसे किसी खाते की जानकारी है, तब मामला स्थानीय पुलिस तक पहुंचा। यहीं से इस पूरे हवाला और GST फ्रॉड नेटवर्क की परतें खुलनी शुरू हुईं।


दो मुख्य आरोपी गिरफ्तार, FIR दर्ज

जांच के बाद पुलिस ने केसरपुर निवासी शाहिद अहमद (38 वर्ष) और बरेली के बारादरी थाना क्षेत्र स्थित कंकरटोला निवासी अमित गुप्ता (38 वर्ष) को गिरफ्तार किया। दोनों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है, जिनमें शामिल हैं:

  • धारा 318(4) – ठगी
  • धारा 338 – कीमती दस्तावेजों की जालसाजी
  • धारा 336(2) – जालसाजी
  • धारा 340(2) – जाली दस्तावेज का उपयोग

पुलिस ने आरोपियों के कब्ज़े से मोबाइल फोन और ₹3,000 नकद बरामद किए हैं। हालांकि बरामदगी मामूली है, लेकिन मोबाइल फोन से मिलने वाला डिजिटल डेटा जांच का अहम आधार माना जा रहा है।


ठगी का पूरा तरीका: कैसे खड़ा किया गया ₹103 करोड़ का नेटवर्क

पुलिस और जांच एजेंसियों के अनुसार आरोपियों ने बेहद योजनाबद्ध तरीके से ठगी का जाल बिछाया। इस नेटवर्क की कार्यप्रणाली कुछ इस प्रकार थी:

1. आधार और पैन का दुरुपयोग

आरोपी छोटे व्यापारियों, कारीगरों और दिहाड़ी मजदूरों को निशाना बनाते थे। कभी सरकारी योजना, कभी बैंक लोन, तो कभी GST रजिस्ट्रेशन के नाम पर उनसे आधार और पैन कार्ड की प्रतियां हासिल की जाती थीं।

2. बैंक खाते और म्यूल अकाउंट्स

इन दस्तावेजों का इस्तेमाल कर विभिन्न बैंकों में खाते खोले जाते थे। कई खातों का उपयोग केवल पैसों को इधर-उधर घुमाने के लिए किया जाता था, जिन्हें म्यूल अकाउंट्स कहा जाता है।

3. शेल कंपनियों की स्थापना

शिकायतकर्ता शब्बू के नाम पर सत्या साहेब ट्रेडर्स, महाकाल ट्रेडर्स समेत कई फर्जी फर्में बनाई गईं। इन कंपनियों का कोई वास्तविक व्यापार नहीं था, लेकिन कागज़ों में भारी टर्नओवर दिखाया गया।

4. फर्जी बिलिंग और GST चोरी

इन शेल कंपनियों के ज़रिये फर्जी इनवॉइस बनाए गए, जिनके माध्यम से GST इनपुट टैक्स क्रेडिट का दुरुपयोग किया गया। इससे सरकार को भारी राजस्व नुकसान हुआ।

5. हवाला लिंक की आशंका

पुलिस को शक है कि इन खातों से घुमाई गई रकम का इस्तेमाल हवाला के ज़रिये काले धन को सफेद करने में किया गया। हालांकि इसकी पुष्टि के लिए अभी विस्तृत जांच जारी है।


₹103 करोड़ का लेनदेन: एक साल में हुआ खेल

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि इन फर्जी फर्मों के ज़रिये केवल एक वर्ष में करीब ₹103 करोड़ का लेनदेन किया गया। यह रकम अलग-अलग खातों में कई चरणों में ट्रांसफर की गई, ताकि असली स्रोत और अंतिम लाभार्थी तक पहुंचना मुश्किल हो जाए।

जांच अधिकारियों के अनुसार, लेनदेन की यह जटिल श्रृंखला जानबूझकर बनाई गई थी ताकि सिस्टम को भ्रमित किया जा सके और टैक्स व जांच एजेंसियों की नज़र से बचा जा सके।


पुलिस और प्रशासन का बयान

एसपी (दक्षिण) अंशिका वर्मा ने मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह सिर्फ़ एक साधारण धोखाधड़ी नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक अपराध का मामला है। उन्होंने बताया कि:

  • काले धन को सफेद करने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
  • आरोपियों से रिमांड पर पूछताछ की जाएगी।
  • डिजिटल साक्ष्य, बैंक रिकॉर्ड और GST डेटा की गहन जांच की जा रही है।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोग, जिनमें अकाउंटेंट, फर्जी निदेशक और बिचौलिये शामिल हो सकते हैं, जल्द ही जांच के दायरे में आएंगे।


पीड़ितों की स्थिति: जिनकी पहचान बनी हथियार

इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिन लोगों के नाम पर यह सारा खेल हुआ, वे खुद पूरी तरह अनजान थे। छोटे कारीगर और मज़दूर, जिनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पहले ही संघर्षों से भरी होती है, अब कानूनी और कर संबंधी परेशानियों में फंस गए।

आयकर नोटिस, बैंक पूछताछ और पुलिस जांच ने इन लोगों के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में पीड़ितों को कानूनी सहायता और सरकारी संरक्षण की सख्त ज़रूरत होती है।


बड़ा परिप्रेक्ष्य: यूपी में बढ़ते GST घोटाले

यह मामला कोई अकेली घटना नहीं है। नवंबर में यूपी एसआईटी ने करीब ₹400 करोड़ के GST घोटाले का खुलासा किया था, जिसमें 144 शेल कंपनियां शामिल पाई गई थीं। उस मामले में भी फर्जी फर्मों, नकली इनवॉइस और म्यूल अकाउंट्स का इस्तेमाल किया गया था।

इन घटनाओं से साफ़ है कि GST प्रणाली के दुरुपयोग के लिए संगठित गिरोह सक्रिय हैं, जो कानून की तकनीकी खामियों और आम लोगों की जानकारी की कमी का फायदा उठा रहे हैं।


विशेषज्ञों की राय: सिस्टम को मजबूत करने की ज़रूरत

आर्थिक अपराध विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए केवल गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है। ज़रूरी है कि:

  • KYC प्रक्रिया को और सख़्त किया जाए।
  • बैंक और GST पोर्टल के बीच रियल-टाइम डेटा शेयरिंग हो।
  • आम लोगों को आधार-पैन की सुरक्षा को लेकर जागरूक किया जाए।
  • पीड़ितों के लिए त्वरित राहत और कानूनी सहायता तंत्र विकसित किया जाए।

आगे की जांच और संभावित खुलासे

फिलहाल दोनों आरोपियों को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया गया है। पुलिस रिमांड के दौरान उनसे नेटवर्क के अन्य सदस्यों, धन के अंतिम गंतव्य और हवाला लिंक के बारे में पूछताछ करेगी। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और GST इंटेलिजेंस जैसी एजेंसियों के भी इस मामले में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।


निष्कर्ष: एक चेतावनी और सबक

₹103 करोड़ का यह हवाला और GST फ्रॉड मामला न सिर्फ़ कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए चुनौती है, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी एक चेतावनी है। यह दिखाता है कि पहचान से जुड़ी जानकारी कितनी संवेदनशील है और उसका दुरुपयोग कितने बड़े पैमाने पर किया जा सकता है।

सरकार, एजेंसियों और समाज—तीनों को मिलकर ऐसे अपराधों के खिलाफ़ सख़्त और सतर्क रुख अपनाने की ज़रूरत है, ताकि मेहनतकश लोगों की पहचान किसी और के अपराध का हथियार न बन सके और आर्थिक व्यवस्था पर जनता का भरोसा बना रहे।