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होम गार्ड्स की स्वैच्छिक सेवा का नियमितीकरण: 10 वर्षों से अधिक निरंतर सेवा करने वाले होम गार्ड्स नियमितीकरण के पात्र — पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय

होम गार्ड्स की स्वैच्छिक सेवा का नियमितीकरण: 10 वर्षों से अधिक निरंतर सेवा करने वाले होम गार्ड्स नियमितीकरण के पात्र — पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय

         सेवा कानून (Service Law) के क्षेत्र में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने होम गार्ड्स (Home Guards) से संबंधित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि वे होम गार्ड्स, जिन्होंने बिना किसी रुकावट के और किसी अन्य रोजगार में संलग्न हुए बिना 10 वर्षों से अधिक समय तक निरंतर सेवा प्रदान की है, वे नियमितीकरण (Regularisation) के पात्र हैं, भले ही उनकी सेवा की प्रकृति प्रारंभ में “स्वैच्छिक” (Voluntary) कही गई हो।

      यह निर्णय न केवल हजारों होम गार्ड्स के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि यह राज्य की नीतियों, श्रम की गरिमा और संविधान के समानता व सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को भी सुदृढ़ करता है।


मामले की पृष्ठभूमि

        इस प्रकरण में याचिकाकर्ता वे होम गार्ड्स थे, जो वर्षों से राज्य प्रशासन, पुलिस विभाग, आपदा प्रबंधन, कानून-व्यवस्था, चुनाव ड्यूटी तथा अन्य शासकीय कार्यों में निरंतर सेवाएं दे रहे थे। यद्यपि उन्हें “स्वैच्छिक” कहा जाता था, परंतु व्यवहार में उनसे नियमित कर्मचारियों के समान कार्य लिया जाता था।

याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह था कि—

  • उन्होंने 10 वर्षों से अधिक समय तक लगातार सेवा दी है,
  • सेवा के दौरान उन्होंने कोई अन्य नौकरी या व्यवसाय नहीं किया,
  • उनकी सेवाएं राज्य के लिए निरंतर आवश्यक और अनिवार्य रहीं,
  • इसके बावजूद उन्हें नियमित कर्मचारी का दर्जा, वेतनमान और सेवा लाभ नहीं दिए गए।

       राज्य सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि होम गार्ड्स स्वैच्छिक बल हैं और उनकी नियुक्ति नियमित सरकारी सेवा के अंतर्गत नहीं आती, इसलिए नियमितीकरण का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता।


मुख्य विधिक प्रश्न

उच्च न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रमुख प्रश्न यह था—

क्या ऐसे होम गार्ड्स, जिन्होंने 10 वर्षों से अधिक समय तक बिना किसी रुकावट के और बिना अन्य रोजगार के निरंतर सेवा की है, केवल इस आधार पर नियमितीकरण से वंचित किए जा सकते हैं कि उनकी सेवा को “स्वैच्छिक” कहा गया है?


होम गार्ड्स की सेवा की वास्तविक प्रकृति

       न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि किसी सेवा को केवल नाम मात्र से “स्वैच्छिक” कहना पर्याप्त नहीं है। वास्तविकता यह देखी जानी चाहिए कि—

  • क्या सेवा निरंतर है?
  • क्या कार्य राज्य के नियमित कार्यों का हिस्सा है?
  • क्या सेवक राज्य के नियंत्रण और अनुशासन में कार्य कर रहा है?
  • क्या सेवा के बदले मानदेय/भत्ता दिया जा रहा है?

न्यायालय ने पाया कि होम गार्ड्स की सेवाएं आकस्मिक या अस्थायी नहीं थीं, बल्कि वे वर्षों से प्रशासनिक ढांचे का अभिन्न अंग बने हुए थे।


निरंतर सेवा और नियमितीकरण का सिद्धांत

उच्च न्यायालय ने यह दोहराया कि लंबे समय तक निरंतर सेवा लेना और फिर नियमितीकरण से इंकार करना, अनुचित श्रम व्यवहार (Unfair Labour Practice) के समान है।

यदि कोई व्यक्ति—

  • एक ही नियोक्ता के अधीन,
  • एक ही प्रकार का कार्य,
  • वर्षों तक निरंतर करता है,

तो केवल तकनीकी आधारों पर उसे नियमित कर्मचारी के दर्जे से वंचित नहीं किया जा सकता।


संवैधानिक दृष्टिकोण

न्यायालय ने इस मामले को भारत का संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) के आलोक में परखा।

न्यायालय ने कहा—

  • समान कार्य करने वालों के साथ असमान व्यवहार नहीं किया जा सकता,
  • वर्षों तक सेवा लेने के बाद नियमितीकरण से इनकार करना मनमाना है,
  • राज्य एक “मॉडल नियोक्ता” (Model Employer) होने के नाते श्रमिकों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने के लिए बाध्य है।

10 वर्षों की निरंतर सेवा का महत्व

न्यायालय ने विशेष रूप से इस तथ्य पर जोर दिया कि याचिकाकर्ताओं ने—

  • 10 वर्षों से अधिक समय तक
  • बिना किसी सेवा-विराम (Break)
  • बिना किसी अन्य नौकरी में संलग्न हुए

राज्य की सेवा की है। यह अवधि अपने आप में यह दर्शाती है कि उनकी सेवाएं अस्थायी या प्रयोगात्मक नहीं थीं, बल्कि स्थायी आवश्यकता का परिणाम थीं।


राज्य की दलीलों का खंडन

राज्य सरकार की इस दलील को कि “स्वैच्छिक सेवा में नियमितीकरण का कोई अधिकार नहीं होता”, न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि—

  • अधिकार सेवा की वास्तविक प्रकृति से उत्पन्न होते हैं,
  • न कि केवल नियुक्ति के नामकरण से।

यदि राज्य वर्षों तक स्वैच्छिक सेवा के नाम पर नियमित कार्य कराता है, तो वह बाद में उसी आधार पर जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।


न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए:

  1. दीर्घकालिक निरंतर सेवा की उपेक्षा नहीं की जा सकती
  2. स्वैच्छिक शब्द का दुरुपयोग कर श्रमिक अधिकारों को छीना नहीं जा सकता
  3. राज्य को सामाजिक न्याय और श्रम की गरिमा का सम्मान करना होगा
  4. नियमितीकरण से इंकार केवल तकनीकी आधार पर नहीं किया जा सकता

निर्णय का व्यापक प्रभाव

इस निर्णय के दूरगामी प्रभाव होंगे:

  • हजारों होम गार्ड्स को नियमितीकरण का मार्ग मिलेगा,
  • राज्य सरकारों को अपनी नीतियों की पुनः समीक्षा करनी पड़ेगी,
  • स्वैच्छिक/अस्थायी कर्मचारियों के शोषण पर अंकुश लगेगा,
  • सेवा कानून में समानता और निष्पक्षता को बल मिलेगा।

आलोचनात्मक दृष्टिकोण

कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि इससे राज्य के वित्तीय दायित्व बढ़ेंगे। किंतु न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वित्तीय बोझ संविधान और श्रम न्याय के सिद्धांतों से ऊपर नहीं हो सकता

राज्य यदि सेवा लेता है, तो उसे उसके अनुरूप अधिकार भी देने होंगे।


निष्कर्ष

         पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का यह निर्णय होम गार्ड्स के अधिकारों की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि—

जो होम गार्ड्स बिना किसी रुकावट के और बिना कोई अन्य नौकरी किए 10 वर्षों से अधिक समय तक निरंतर सेवा में कार्यरत हैं, वे नियमितीकरण के पूर्ण रूप से पात्र हैं।

       यह फैसला न केवल होम गार्ड्स को सम्मान, सुरक्षा और स्थायित्व प्रदान करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि राज्य “स्वैच्छिक सेवा” की आड़ में वर्षों तक श्रम लेने के बाद अपने दायित्वों से पीछे न हटे।

       इस प्रकार, यह निर्णय सेवा कानून, सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों की सशक्त पुष्टि करता है और भविष्य में श्रमिक-अधिकारों से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में कार्य करेगा।