हरियाणा के टाउन-प्लानिंग प्राधिकरणों पर प्रभुत्व के दुरुपयोग के आरोप खारिज — CCI का बड़ा फैसला
भूमिका
भारत में प्रतिस्पर्धा कानून का उद्देश्य बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनाए रखना, उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना तथा आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (Competition Commission of India – CCI) को यह अधिकार दिया गया है कि वह बाजार में किसी भी इकाई द्वारा प्रभुत्व (Dominance) के दुरुपयोग की शिकायतों की जांच करे। हाल ही में CCI ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में हरियाणा के टाउन-प्लानिंग एवं शहरी विकास प्राधिकरणों के विरुद्ध दायर प्रभुत्व के दुरुपयोग से संबंधित कई शिकायतों को खारिज कर दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि ये प्राधिकरण व्यावसायिक नहीं बल्कि नियामक (Regulatory) क्षमता में कार्य कर रहे हैं, अतः उन पर प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के अंतर्गत प्रभुत्व के दुरुपयोग का आरोप लागू नहीं होता।
यह निर्णय न केवल रियल एस्टेट डेवलपर्स के लिए बल्कि सरकारी एवं अर्ध-सरकारी नियामक संस्थाओं की भूमिका को समझने के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
1. मामला क्या था?
इन मामलों में विभिन्न रियल एस्टेट डेवलपर्स ने यह आरोप लगाया कि हरियाणा के टाउन-प्लानिंग प्राधिकरणों—जैसे कि नगर एवं ग्राम आयोजना विभाग (Department of Town and Country Planning – DTCP) तथा संबंधित विकास प्राधिकरणों—ने अपनी स्थिति का दुरुपयोग करते हुए:
- लाइसेंस देने में अनुचित देरी की,
- अत्यधिक शुल्क और शर्तें लगाईं,
- नीति संबंधी निर्णयों का मनमाना प्रयोग किया,
- तथा डेवलपर्स के साथ असमान व्यवहार किया।
डेवलपर्स का यह भी तर्क था कि इन प्राधिकरणों के पास लाइसेंसिंग और अनुमोदन की प्रक्रिया में एकाधिकार है, जिससे वे प्रभुत्व की स्थिति में हैं और उसका दुरुपयोग कर रहे हैं।
2. प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के अंतर्गत “प्रभुत्व” की अवधारणा
प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 की धारा 4 के अनुसार, प्रभुत्व की स्थिति वह स्थिति है जिसमें कोई उद्यम संबंधित बाजार में प्रतिस्पर्धियों, उपभोक्ताओं या बाजार की शक्तियों से स्वतंत्र होकर कार्य कर सकता है।
लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि:
- संबंधित इकाई एक “उद्यम” (Enterprise) हो, और
- वह व्यावसायिक या आर्थिक गतिविधि में संलग्न हो।
यदि कोई संस्था केवल सार्वजनिक नीति लागू करने या नियमन (Regulation) का कार्य कर रही है, तो सामान्यतः उसे उद्यम की श्रेणी में नहीं रखा जाता।
3. CCI का प्रमुख निष्कर्ष
CCI ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि:
- हरियाणा के टाउन-प्लानिंग प्राधिकरण कानून द्वारा स्थापित निकाय हैं।
- इनका मुख्य कार्य शहरी नियोजन, भूमि उपयोग का नियंत्रण, विकास योजनाओं की स्वीकृति और सार्वजनिक हित में नियमन करना है।
- ये प्राधिकरण लाभ कमाने के उद्देश्य से व्यावसायिक गतिविधि नहीं करते, बल्कि सरकारी नीतियों को लागू करते हैं।
आयोग ने कहा कि जब कोई प्राधिकरण नियामक शक्ति का प्रयोग करता है, तब वह प्रतिस्पर्धा अधिनियम के तहत उद्यम नहीं माना जा सकता।
4. नियामक बनाम व्यावसायिक भूमिका
CCI ने अपने निर्णय में नियामक (Regulatory) और व्यावसायिक (Commercial) भूमिका के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया।
- नियामक भूमिका:
- कानून और नीतियों को लागू करना
- लाइसेंस देना
- सार्वजनिक हित की रक्षा
- शहरी विकास को संतुलित करना
- व्यावसायिक भूमिका:
- वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन
- लाभ कमाने के उद्देश्य से बाजार में भाग लेना
- प्रतिस्पर्धियों के साथ आर्थिक गतिविधि करना
आयोग के अनुसार, हरियाणा के टाउन-प्लानिंग प्राधिकरण पहली श्रेणी में आते हैं, न कि दूसरी में।
5. डेवलपर्स की दलीलों पर CCI का दृष्टिकोण
डेवलपर्स ने यह तर्क दिया कि:
- प्राधिकरणों की नीतियां रियल एस्टेट बाजार को प्रभावित करती हैं,
- लाइसेंस प्रक्रिया में उनकी स्थिति अत्यंत शक्तिशाली है,
- और वे मनमानी शर्तें थोपते हैं।
CCI ने माना कि नियामक निर्णयों से बाजार पर प्रभाव पड़ सकता है, लेकिन केवल इसी आधार पर उन्हें प्रतिस्पर्धा कानून के उल्लंघन के दायरे में नहीं लाया जा सकता।
यदि डेवलपर्स को किसी नीति या प्रशासनिक निर्णय से असंतोष है, तो:
- उपयुक्त उपाय संवैधानिक या प्रशासनिक कानून के तहत उपलब्ध हैं,
- जैसे कि उच्च न्यायालय में रिट याचिका या संबंधित वैधानिक अपील।
6. पूर्व न्यायिक दृष्टांतों का संदर्भ
CCI ने अपने आदेश में यह भी संकेत दिया कि पूर्व में भी कई मामलों में यह सिद्धांत अपनाया गया है कि:
- सरकारी या वैधानिक प्राधिकरण,
- जब विशुद्ध रूप से नियामक कार्य कर रहे हों,
- तब उन्हें प्रतिस्पर्धा अधिनियम के तहत प्रभुत्व के दुरुपयोग के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।
यह दृष्टिकोण भारतीय न्यायपालिका के कई निर्णयों और CCI के पूर्व आदेशों के अनुरूप है।
7. रियल एस्टेट सेक्टर पर प्रभाव
इस निर्णय का रियल एस्टेट उद्योग पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है:
- डेवलपर्स के लिए संदेश
- नियामक निर्णयों को सीधे CCI में चुनौती देना आसान नहीं होगा।
- उन्हें उचित मंच—जैसे उच्च न्यायालय या ट्रिब्यूनल—का चयन करना होगा।
- नियामक संस्थाओं को स्पष्टता
- यह फैसला उन्हें आश्वस्त करता है कि यदि वे कानून के दायरे में कार्य कर रहे हैं, तो प्रतिस्पर्धा कानून के तहत उन पर अनावश्यक दबाव नहीं बनेगा।
- नीति और प्रशासन में संतुलन
- नियामक संस्थाएं मनमानी नहीं कर सकतीं,
- लेकिन उनकी नीतिगत भूमिका को व्यावसायिक गतिविधि नहीं माना जाएगा।
8. प्रतिस्पर्धा कानून और शासन के बीच संतुलन
यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि:
- प्रतिस्पर्धा कानून का उद्देश्य शासन को बाधित करना नहीं,
- बल्कि बाजार में अनुचित व्यावसायिक व्यवहार को रोकना है।
यदि हर नियामक निर्णय को प्रभुत्व के दुरुपयोग के रूप में देखा जाए, तो:
- शासन प्रक्रिया बाधित हो जाएगी,
- और नीति निर्माण में अनावश्यक भय उत्पन्न होगा।
CCI ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए यह स्पष्ट किया कि नियमन और प्रतिस्पर्धा कानून को एक-दूसरे का पूरक होना चाहिए, विरोधी नहीं।
9. निष्कर्ष
हरियाणा के टाउन-प्लानिंग प्राधिकरणों के विरुद्ध दायर प्रभुत्व के दुरुपयोग की शिकायतों को खारिज करते हुए CCI ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराया है—नियामक कार्य करने वाली सरकारी संस्थाएं, जब तक वे व्यावसायिक गतिविधि में संलग्न न हों, प्रतिस्पर्धा अधिनियम के तहत “उद्यम” नहीं मानी जाएंगी।
यह फैसला:
- नियामक संस्थाओं की भूमिका को स्पष्ट करता है,
- डेवलपर्स और उद्योग जगत को सही कानूनी मंच चुनने का मार्गदर्शन देता है,
- और प्रतिस्पर्धा कानून के उद्देश्य को संतुलित रूप में आगे बढ़ाता है।
अंततः, यह निर्णय भारतीय प्रतिस्पर्धा न्यायशास्त्र में नियामक स्वतंत्रता और बाजार प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।