स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही की नई परिभाषा: पश्चिम बंगाल क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स आयोग को सशक्त करता सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
प्रस्तावना
भारत में स्वास्थ्य सेवाएँ केवल चिकित्सा विज्ञान का विषय नहीं हैं, बल्कि वे नागरिकों के जीवन, गरिमा और संवैधानिक अधिकारों से सीधे जुड़ी हुई हैं। अस्पतालों, नर्सिंग होम्स और क्लिनिकल प्रतिष्ठानों की कार्यप्रणाली, वहाँ कार्यरत स्टाफ की योग्यता तथा मरीजों को दी जाने वाली सेवाओं की गुणवत्ता—ये सभी पहलू सीधे तौर पर आम नागरिक के जीवन को प्रभावित करते हैं।
इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय, जिसमें उसने पश्चिम बंगाल क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स रेगुलेटरी कमीशन (WB Clinical Establishments Commission) की शक्तियों की पुष्टि की है, भारतीय स्वास्थ्य कानून के क्षेत्र में एक मील का पत्थर माना जा रहा है।
यह फैसला स्पष्ट करता है कि यह आयोग:
- स्वास्थ्य सेवाओं में सेवा की कमी (service deficiency) का आकलन कर सकता है,
- अस्पतालों और क्लिनिकों में कार्यरत डॉक्टरों व स्टाफ की योग्यता की जाँच कर सकता है,
- और पीड़ित मरीजों को मुआवज़ा (compensation) देने का आदेश भी दे सकता है—
भले ही चिकित्सकीय लापरवाही (medical negligence) की औपचारिक जाँच राज्य मेडिकल काउंसिल के अधिकार क्षेत्र में आती हो।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले की जड़ उस भ्रम में थी जो अक्सर स्वास्थ्य कानून के क्षेत्र में देखने को मिलता है—
क्या सेवा में कमी और चिकित्सकीय लापरवाही एक ही चीज़ हैं?
क्या किसी नियामक आयोग को मुआवज़ा देने का अधिकार है, या यह अधिकार केवल उपभोक्ता फोरम या मेडिकल काउंसिल तक सीमित है?
पश्चिम बंगाल में Clinical Establishments Act के तहत गठित आयोग को लेकर यह आपत्ति उठाई गई थी कि:
- आयोग चिकित्सकीय लापरवाही जैसे जटिल प्रश्नों पर विचार नहीं कर सकता,
- और न ही उसे मुआवज़ा देने का अधिकार है, क्योंकि यह काम राज्य मेडिकल काउंसिल या अदालतों का है।
इन्हीं प्रश्नों के उत्तर में मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट और निर्णायक दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद को सुलझाते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर को रेखांकित किया—
“सेवा में कमी” और “चिकित्सकीय लापरवाही” समान अवधारणाएँ नहीं हैं।
कोर्ट ने कहा कि:
- सेवा में कमी का अर्थ है—
अस्पताल या क्लिनिक द्वारा निर्धारित मानकों का पालन न करना,
पर्याप्त सुविधाएँ न देना,
अयोग्य या अप्रमाणित स्टाफ से कार्य कराना,
या मरीजों के अधिकारों का उल्लंघन करना। - जबकि चिकित्सकीय लापरवाही एक तकनीकी और पेशेवर प्रश्न है, जिसमें यह देखा जाता है कि डॉक्टर ने चिकित्सा विज्ञान के मानकों का उल्लंघन किया या नहीं।
WB Clinical Establishments Commission की शक्तियाँ
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पश्चिम बंगाल क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स आयोग की भूमिका केवल कागज़ी निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सक्रिय नियामक निकाय है।
1. सेवा में कमी का आकलन
आयोग यह जाँच कर सकता है कि:
- क्या अस्पताल में आवश्यक बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध थीं?
- क्या मरीज को समय पर उपचार दिया गया?
- क्या आपातकालीन स्थिति में उचित प्रतिक्रिया दी गई?
यह आकलन चिकित्सकीय निर्णय की शुद्धता से अलग है और सेवा की गुणवत्ता से जुड़ा हुआ है।
2. स्टाफ की योग्यता की जाँच
कोर्ट ने माना कि आयोग को यह देखने का अधिकार है कि:
- अस्पताल या क्लिनिक में कार्यरत डॉक्टर, नर्स या तकनीकी कर्मचारी आवश्यक योग्यता और पंजीकरण रखते हैं या नहीं।
- कहीं ऐसा तो नहीं कि मरीजों का इलाज अयोग्य या अप्रशिक्षित व्यक्तियों से कराया जा रहा है।
यह अधिकार मरीजों की सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक बताया गया।
3. मुआवज़ा देने का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि:
- यदि सेवा में कमी के कारण मरीज को नुकसान हुआ है,
- तो आयोग को मुआवज़ा देने का निर्देश देने से नहीं रोका जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मुआवज़ा:
- चिकित्सकीय लापरवाही के अंतिम निर्धारण से अलग हो सकता है,
- और यह नागरिक उपचार (civil remedy) की प्रकृति का है, न कि पेशेवर अनुशासनात्मक कार्रवाई का।
राज्य मेडिकल काउंसिल की भूमिका से कोई टकराव नहीं
एक महत्वपूर्ण तर्क यह दिया गया था कि यदि आयोग सेवा में कमी पर विचार करेगा, तो यह राज्य मेडिकल काउंसिल की शक्तियों में हस्तक्षेप होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा—
दोनों संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र अलग-अलग और पूरक हैं, टकराव वाले नहीं।
- राज्य मेडिकल काउंसिल:
चिकित्सकीय लापरवाही,
पेशेवर कदाचार,
डॉक्टर के पंजीकरण पर कार्रवाई - क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स आयोग:
सेवा की गुणवत्ता,
नियामक मानकों का पालन,
मरीजों को त्वरित राहत और मुआवज़ा
इस प्रकार, दोनों अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकते हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही का नया मॉडल
यह फैसला भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही (accountability) का एक नया मॉडल प्रस्तुत करता है।
अब अस्पताल यह नहीं कह सकते कि:
- “यह चिकित्सकीय मामला है, आयोग कुछ नहीं कर सकता।”
कोर्ट ने साफ कर दिया कि:
- मरीज एक उपभोक्ता भी है,
- और स्वास्थ्य सेवाएँ एक लोकहित से जुड़ी अनिवार्य सेवा हैं।
मरीजों के अधिकारों को मजबूती
इस निर्णय से मरीजों को कई स्तरों पर लाभ मिलेगा:
त्वरित राहत – लंबी अदालती प्रक्रिया के बिना आयोग के समक्ष शिकायत
सुलभ न्याय – तकनीकी मेडिकल बहसों में उलझे बिना सेवा की कमी पर निर्णय
निवारक प्रभाव – अस्पतालों को मानकों का पालन करने के लिए बाध्य करना
यह फैसला विशेष रूप से उन मरीजों के लिए महत्वपूर्ण है जो आर्थिक या सामाजिक कारणों से लंबी कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकते।
निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम्स पर प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद:
- निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम्स की नियामक निगरानी और सख़्त होगी।
- केवल अत्याधुनिक मशीनें और विज्ञापन पर्याप्त नहीं होंगे,
- बल्कि मानव संसाधन की गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही भी अनिवार्य होगी।
यह फैसला स्वास्थ्य क्षेत्र में “कॉर्पोरेट संस्कृति” के अनियंत्रित प्रभाव पर भी एक प्रकार का अंकुश लगाता है।
संवैधानिक दृष्टिकोण
कोर्ट ने इस पूरे मामले को अनुच्छेद 21 के आलोक में देखा—
जिसमें जीवन के अधिकार के अंतर्गत स्वास्थ्य का अधिकार भी निहित है।
यदि राज्य:
- अस्पतालों को नियंत्रित न करे,
- और मरीजों को प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र न दे,
तो यह संविधान की भावना के विपरीत होगा।
निष्कर्ष
WB Clinical Establishments Commission को सशक्त करने वाला सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय स्वास्थ्य कानून में एक निर्णायक मोड़ है।
यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि:
- सेवा में कमी को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता,
- मरीजों की पीड़ा केवल तकनीकी मेडिकल बहसों में दबाई नहीं जा सकती,
- और नियामक संस्थाएँ केवल दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय रक्षक हैं।
यह निर्णय न केवल पश्चिम बंगाल, बल्कि पूरे देश के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत प्रस्तुत करता है—
जहाँ स्वास्थ्य सेवाएँ मुनाफ़े का साधन नहीं, बल्कि मानव गरिमा की रक्षा का माध्यम हों।
सुप्रीम कोर्ट का यह संदेश स्पष्ट है:
स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही, अव्यवस्था और गैर-जवाबदेही के लिए अब कोई सुरक्षित आश्रय नहीं बचेगा।