स्वतंत्र बिजली कनेक्शन भी है ‘जीवन के अधिकार’ का हिस्सा: राजस्थान हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय
प्रस्तावना: बिजली अब विलासिता नहीं, जीवन की अनिवार्यता
कभी बिजली को सुविधा (amenity) माना जाता था, पर आज यह जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। आधुनिक जीवन की हर गतिविधि—पानी की मोटर, शिक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल संचार, सुरक्षा—बिजली पर निर्भर है। ऐसे में यदि किसी परिवार को स्थायी रूप से स्वतंत्र विद्युत कनेक्शन से वंचित रखा जाता है, तो यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रश्न बन जाता है।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने इसी संवैधानिक दृष्टिकोण को स्वीकार करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है, जिसमें ग्रुप हाउसिंग सोसायटी में रहने वाले परिवारों को स्वतंत्र बिजली कनेक्शन न देना अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन माना गया।
मामले की पृष्ठभूमि: 10 वर्षों का अंधकार
याचिकाकर्ता परिवार जयपुर की वाटिका इंफोटेक सिटी स्थित एक ग्रुप हाउसिंग सोसायटी में रह रहे थे। बिल्डर को “सिंगल पॉइंट” विद्युत कनेक्शन दिया गया था, जिसका अर्थ है कि पूरी सोसायटी के लिए एक ही कनेक्शन, और फिर आंतरिक वितरण बिल्डर या सोसायटी प्रबंधन के माध्यम से।
समस्या तब उत्पन्न हुई जब:
- व्यक्तिगत फ्लैट मालिकों को स्वतंत्र कनेक्शन नहीं दिए गए
- बिल्डर पर निर्भरता बनी रही
- कई मूलभूत सुविधाएं प्रभावित हुईं
- लगभग 10 वर्षों तक निवासी स्वतंत्र कनेक्शन से वंचित रहे
यह स्थिति नागरिकों को निजी डेवलपर की इच्छा पर निर्भर बना रही थी — जो विधि शासन (Rule of Law) की भावना के विपरीत है।
मुख्य संवैधानिक प्रश्न
क्या बिजली जैसी मूलभूत सेवा तक सीधी और स्वतंत्र पहुंच से वंचित करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है?
न्यायालय ने इस प्रश्न का उत्तर हाँ में दिया।
अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या
अनुच्छेद 21 कहता है:
“किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त वंचित नहीं किया जाएगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने समय के साथ “जीवन” (Life) को केवल सांस लेने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे गरिमामय जीवन (Dignified Life) तक विस्तारित किया। इसमें शामिल माने गए अधिकार:
- स्वच्छ जल का अधिकार
- स्वास्थ्य सुविधाएं
- आवास
- स्वच्छ पर्यावरण
- शिक्षा तक पहुंच
राजस्थान हाईकोर्ट ने इसी विकसित न्यायशास्त्र को आगे बढ़ाते हुए माना कि बिजली भी गरिमामय जीवन का अभिन्न अंग है।
सिंगल पॉइंट कनेक्शन बनाम व्यक्तिगत अधिकार
डिस्कॉम का तर्क था कि बिल्डर ने पर्याप्त बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं कराया, इसलिए व्यक्तिगत कनेक्शन संभव नहीं।
कोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा:
- बिजली कंपनी का दायित्व बिल्डर की इच्छा पर निर्भर नहीं हो सकता
- नागरिकों का अधिकार किसी निजी संस्था की विफलता से बाधित नहीं हो सकता
- प्रशासनिक प्रावधान मौलिक अधिकारों पर हावी नहीं हो सकते
यह सिद्धांत महत्वपूर्ण है—निजी अनुबंध (Private Arrangement) संविधान से ऊपर नहीं हो सकते।
राज्य और डिस्कॉम की भूमिका
जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (JVVNL) एक सार्वजनिक उपयोगिता सेवा (Public Utility Service) है। ऐसी संस्थाओं पर संवैधानिक दायित्व होता है:
- भेदभाव रहित सेवा
- मनमानी से बचना (Article 14)
- नागरिकों के जीवन से जुड़ी सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कनेक्शन न देना “मनमाना” (Arbitrary) है।
न्यायालय का आदेश
न्यायमूर्ति इंद्रजीत सिंह और रवि चिरानिया की खंडपीठ ने निर्देश दिया:
- सभी पात्र याचिकाकर्ताओं को
- आवश्यक औपचारिकताएं पूर्ण करने पर
- दो महीने के भीतर स्वतंत्र विद्युत कनेक्शन दिए जाएं
यह आदेश केवल व्यक्तिगत राहत नहीं, बल्कि नीति-स्तरीय संकेत है।
यह निर्णय क्यों ऐतिहासिक है?
1. मौलिक अधिकार बनाम प्रशासनिक नियम
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई नियम नागरिक के जीवन के अधिकार से टकराता है, तो प्राथमिकता संविधान को मिलेगी।
2. बिल्डर-निर्भरता की समाप्ति
ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट्स में अक्सर बिल्डर बिजली-पानी पर नियंत्रण रखते हैं। यह निर्णय फ्लैट मालिकों को सशक्त करता है।
3. सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं की जवाबदेही
डिस्कॉम यह नहीं कह सकता कि “बिल्डर ने काम नहीं किया, इसलिए हम सेवा नहीं देंगे।”
बिजली और मानव गरिमा
बिना बिजली के:
- पानी की सप्लाई रुकती है
- बच्चे पढ़ाई नहीं कर पाते
- बुजुर्ग और मरीज प्रभावित होते हैं
- सुरक्षा खतरे में पड़ती है
अर्थात बिजली का अभाव सीधे जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
कानूनी सिद्धांत जो उभरकर सामने आए
| सिद्धांत | व्याख्या |
|---|---|
| गरिमामय जीवन | अनुच्छेद 21 का मूल तत्व |
| राज्य की सकारात्मक जिम्मेदारी | केवल हस्तक्षेप न करना पर्याप्त नहीं, सुविधा उपलब्ध कराना भी दायित्व |
| निजी प्रावधान बनाम मौलिक अधिकार | निजी अनुबंध संविधान से ऊपर नहीं |
| मनमानी का निषेध | अनुच्छेद 14 का उल्लंघन |
रियल एस्टेट क्षेत्र पर प्रभाव
यह फैसला बिल्डर्स के लिए संकेत है कि वे बुनियादी सेवाओं को नियंत्रण के साधन के रूप में उपयोग नहीं कर सकते। फ्लैट खरीदारों को:
- स्वतंत्र बिजली
- स्वतंत्र पानी
- सरकारी सेवाओं तक सीधी पहुंच
का अधिकार है।
भविष्य के मुकदमों में उपयोग
यह निर्णय निम्न मामलों में उद्धृत किया जा सकेगा:
- हाउसिंग सोसायटी विवाद
- बिल्डर द्वारा सुविधाओं की रोक
- डिस्कॉम द्वारा कनेक्शन से इनकार
- शहरी बुनियादी सेवाओं से संबंधित याचिकाएं
न्यायपालिका का मानवीय दृष्टिकोण
कोर्ट ने तकनीकी तर्कों के बजाय मानव गरिमा को प्राथमिकता दी। यही संवैधानिक न्यायशास्त्र की आत्मा है।
निष्कर्ष: बिजली अब संवैधानिक अधिकार की श्रेणी में
यह फैसला दर्शाता है कि न्यायपालिका बदलते समाज के अनुरूप संविधान की व्याख्या कर रही है। बिजली अब केवल सेवा नहीं—जीवन का आधार है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि:
किसी भी नागरिक को केवल प्रशासनिक प्रावधानों के आधार पर जीवन की आवश्यक सुविधा से वंचित नहीं किया जा सकता।
यह निर्णय शहरी भारत में रहने वाले लाखों फ्लैट मालिकों के लिए आशा की किरण है और प्रशासन को यह याद दिलाता है कि संवैधानिक दायित्व निजी व्यवस्थाओं से ऊपर है।